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एक धर्मनिरपेक्ष संत: गांधीवाद के इतिहास की समृद्ध अंतर्दृष्टि पेश करती है चंडी प्रसाद भट्ट की आत्मकथा

Sun, 24 Mar 2024 07:47 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 24 Mar 2024 07:47 AM IST
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सार
चंडी प्रसाद भट्ट की आत्मकथा, उनके अपने अनुभवों का वर्णन, सामाजिक और पर्यावरणीय इतिहास के साथ-साथ गांधीवाद के इतिहास की समृद्ध अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। मुझे विश्वास है कि इस आत्मकथा को व्यापक पाठक वर्ग प्राप्त होगा।
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Secular Saint Chandi Prasad Bhatt Autobiography, Social, Environmental and Gandhism history insights
उत्तराखंड के सीएम धामी के साथ पद्मभूषण चंडी प्रसाद भट्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक भारतीय, जिनकी मैं बेहद प्रशंसा करता हूं, वह हैं सामाजिक कार्यकर्ता और चिपको आंदोलन के प्रणेता चंडी प्रसाद भट्ट। जब मैं बीस साल का था, तब उनसे पहली मुलाकात ने मेरे जीवन पर काफी परिवर्तनकारी प्रभाव डाला। उसके बाद मैं उनसे कई बार मिला, हर मुलाकात में दुनिया और भारत के सामने मौजूद नैतिक, राजनीतिक एवं पर्यावरणीय चुनौतियों और उन्हें नियंत्रित करने के लिए क्या किया जा सकता है, इस बारे में नई अंतर्दृष्टियां मिलीं। कुछ वर्ष पहले चंडी प्रसाद भट्ट ने हिंदी में अपनी आत्मकथा प्रकाशित की थी। उसे अब अंग्रेजी में समीर बनर्जी ने जेंटल रेसिस्टेंस नाम से अनूदित किया है।



भट्ट का जन्म 1934 में हुआ, जब भारत अंग्रेजों का उपनिवेश ही था। शुरुआती अध्यायों में उनके बचपन की विविध यादें हैं, साथ ही उनकी बड़ी बहन (जिनसे उनका गहरा लगाव था), उनके शिक्षक, गांव के बुजुर्गों और मेहनतकश निचली जातियों के लोगों की मार्मिक छवियां हैं। एक बाह्मण होने के नाते युवा चंडी प्रसाद को उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी। हालांकि वह समृद्ध नहीं थे। जब वह मात्र एक साल के थे, उनके पिता का देहांत हो गया। परिवार गरीब था, हालांकि बेसहारा नहीं था। जैसा कि वह लिखते हैं, ‘बचपन में हम निरंतर अभाव में रहे, कुछ भी बहुत ज्यादा नहीं था, कभी भी पर्याप्त पैसा नहीं था, और हर वस्तु, जिसकी हमें जरूरत थी, अपर्याप्त लगती थी।’


घर का चूल्हा जलाने के लिए उस किशोर लड़के को खेत जोतनी और गायें चरानी पड़ती थीं। चंडी प्रसाद आकर्षक स्पष्टता के साथ बताते हैं कि कैसे वह एक उदासीन छात्र थे, जो बमुश्किल ही परीक्षाएं उत्तीर्ण कर पाते थे। विश्वविद्यालय में पढ़ाई का तो खैर कोई सवाल ही नहीं था! सौभाग्य से एक स्थानीय बस कंपनी में बुकिंग क्लर्क की नौकरी मिल गई, जिसमें वेतन के नाम पर मामूली रकम मिलती थी। वे बसें तीर्थयात्रियों को हिमालय के पवित्र तीर्थस्थलों तक ले जाती थीं और अपने काम के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों से मिलने से उनके सांस्कृतिक एवं भौगोलिक ब्रह्मांड का विस्तार हुआ।

वर्ष 1956 में प्रतिष्ठित गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता जयप्रकाश नारायण ने गढ़वाल के उस इलाके का दौरा किया, जहां भट्ट रहते थे। वह उनकी बातें सुनने गए थे; जैसा कि उन्होंने साठ साल बाद याद किया, जेपी के ‘शब्दों ने मुझे अंतरात्मा की गहराई तक छू लिया।’ भट्ट फिर एक स्थानीय सर्वोदय कार्यकर्ता मान सिंह रावत से मिले, जिन्होंने उनके साथ पहाड़ियों पर पदयात्रा की। जेपी के शब्दों और मान सिंह के उदाहरण ने भट्ट को गढ़वाल मोटर ओनर्स यूनियन की नौकरी छोड़कर पूरा समय सामाजिक कार्यों में समर्पित करने के लिए प्रेरित किया। 1960 के दशक में भट्ट ने श्रम सहकारी समितियों और महिला मंगल दलों (महिला कल्याण संघ) के गठन में सहयोगियों के साथ काम किया। 1960 के दशक के अंत तक उन्होंने गढ़वाल में एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काफी प्रतिष्ठा हासिल कर ली थी।

इस बीच भट्ट ने पहाड़ियों में व्यावसायिक वानिकी की लूट का गहन अध्ययन करना शुरू कर दिया था। जंगलों की तबाही को देखकर भट्ट ने खुद से सवाल किया : ‘क्या इस शोषणकारी उन्माद को रोका जा सकता है?’ उन्होंने सोचा कि यह हो सकता है, लेकिन केवल तभी, जब पहाड़ के लोग एक बार फिर अपने जंगलों पर नियंत्रण हासिल कर सकें, जो उनके अपने जीवनयापन और अस्तित्व के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। 1973 में भट्ट ने व्यावसायिक वानिकी के खिलाफ ग्रामीणों द्वारा पहले विरोध प्रदर्शन के आयोजन और नेतृत्व करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसे सामूहिक रूप से 'चिपको आंदोलन' के रूप में जाना जाता है।

चिपको आंदोलन के दौरान भट्ट की मुलाकात लखनऊ में एक वरिष्ठ नौकरशाह से हुई थी, जिनसे वह जंगलों पर राज्य के बजाय समुदाय के नियंत्रण पर जोर देने के लिए मिलने गए थे। यहां दर्शाया गया है कि एक सामाजिक कार्यकर्ता नौकरशाह के दफ्तर में अपने प्रवेश का वर्णन कैसे करता है : ‘मैंने उनका अभिवादन किया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। बार-बार नमस्कार करने और कोई उत्तर न मिलने पर मैं झिझकते हुए उनके सामने कुर्सी पर बैठ गया।’

कुछ देर बाद उन्होंने एक सिगरेट जलाई। धुआं छोड़ते हुए वह मेरी ओर मुड़े और पूछा, ‘यह सब क्या कर रहे हो?’ घूरते और कश लगाते हुए वह मुझ पर धुंआ फेंकते रहे। मैंने उन्हें अपनी बात बताने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनका दृष्टिकोण नौकरशाहों के अनुरूप ही प्रतीत होता था-यानी उनकी नजर में पहाड़ी किसान घृणित थे और उनकी छोटी इकाइयां राजनीति के शानदार शरीर पर फोड़े की तरह थीं, जिन्हें औकात में रखना उनका कर्तव्य था। इस चित्रण की तुलना भट्ट द्वारा प्रस्तुत दूसरे चित्रण से करें, जो समान रूप से ज्वलंत, लेकिन कहीं अधिक सशक्त है। यह चित्रण गौरा देवी के बारे में है, जो मार्च 1974 में रेनी गांव में हुए चिपको प्रदर्शन की नेता थीं, आज से ठीक पचास साल पहले। उन्होंने कभी स्कूल नहीं देखा था, और वह जल्दी ही विधवा हो गई थीं। वह अपनी जमीन के छोटे से टुकड़े पर जीवन यापन कर रही थीं।

फिर भी उन्हें 1965 में अपने गांव में महिला मंगल दल शुरू करने और नौ साल बाद उनका नेतृत्व करने के लिए समय और ऊर्जा मिली, जो शायद हिमालय के इतिहास में सभी चिपको विरोध-प्रदर्शनों में सबसे प्रतिष्ठित है। वर्ष 1991 में गौरा देवी की मृत्यु हो गई।  भट्ट लिखते हैं, असमानता और उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में हमारा मार्गदर्शन करने के लिए उनके सौम्य प्रतिरोध की केवल चमकदार और प्रेरणादायक शक्ति रह गई। उत्पीड़न से लड़ने की उनकी इच्छा उनके और उनकी साथी महिलाओं के जीवन की कठिनाइयों से उपजी थी, जो पीढ़ियों से गरीबी और व्यक्तिगत त्रासदी से निपटने की कोशिश कर रही थीं। भट्ट मुख्यतः एक जमीनी संगठनकर्ता हैं, फिर भी वह एक व्यावहारिक विचारक भी हैं, खासकर टिकाऊ आर्थिक प्रणाली के संबंध में।

1976 की शुरुआत में ही उन्होंने चेतावनी दी थी कि लापरवाह ढंग से किया गया सड़क निर्माण जोशीमठ शहर में घरों के ढहने में योगदान दे रहा था। चंडी प्रसाद भट्ट की आत्मकथा एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है। उनके अपने अनुभवों का वर्णन सामाजिक और पर्यावरणीय इतिहास के साथ-साथ गांधी के बाद गांधीवाद के इतिहास की समृद्ध अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। यह पुस्तक कुछ हद तक साहित्यिक महत्व का दस्तावेज भी है। मुझे विश्वास है कि इसे व्यापक पाठक वर्ग प्राप्त होगा, जिसका यह हकदार है।

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