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आसमान पीला क्यों नहीं होता: रंग नीला है, तो सुबह-शाम लाल क्यों दिखता है? विज्ञान की दुनिया में मिलेगा जवाब

Tue, 11 Feb 2025 05:22 AM IST
ज्योति भास्कर डेनियल फ्रीडमैन
डेनियल फ्रीडमैन Published by: ज्योति भास्कर Updated Tue, 11 Feb 2025 05:22 AM IST
सार

सूर्य की नीली रोशनी वायुमंडल से गुजरते समय सबसे अधिक बिखरती है। यदि प्रकीर्णन न होता, तो आकाश अंधकारमय हो जाता। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आसमान में लालिमा इसलिए होती है, क्योंकि जब सूर्य क्षितिज के पास होता है, तो उसका प्रकाश पृथ्वी की सतह तक पहुंचने के लिए वायुमंडल के बहुत अधिक भाग से होकर गुजरता है।
 

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Science behind sky colour why not yellow If it is blue then why red in morning and evening know The answer
दिलचस्प है आकाश के रंगों का विज्ञान - फोटो : एएनआई
आसमान नीला ही क्यों है, पीला क्यों नहीं? अगर नीला है, तो सुबह-शाम में लाल क्यों दिखता है? प्रश्न सामान्य है, पर इसे सुलझाने के लिए विज्ञान की दुनिया में जाना होगा। आप जो कुछ भी देखते हैं, उसके रंग अलग-अलग तरीकों से बनते हैं। उनमें से कुछ रंगों की व्याख्या भौतिकी से तो अन्य की व्याख्या रसायन विज्ञान से की जाती है।


आकाश इसलिए नीला दिखता है
हम लोग जिस नाइट्रोजन और ऑक्सीजन में सांस ले रहे हैं, वे बहुत ही छोटे अणुओं से बनती हैं। प्रत्येक अणु केवल 0.4 नैनोमीटर या एक इंच का 16 अरबवां हिस्सा है। आपके बालों की एक लट की चौड़ाई के बराबर होने में ढाई लाख नाइट्रोजन अणुओं की जरूरत होगी। यह छोटी उछलती गेंद की तरह होता है। सूर्य का प्रकाश वायुमंडल में इन महीन नाइट्रोजन व ऑक्सीजन अणुओं से गुजरता है। संक्षेप में, आकाश इसलिए नीला दिखता है, क्योंकि अन्य रंगों की तुलना में सूर्य के प्रकाश का नीला भाग वायुमंडल में अणुओं से टकराने की अधिक संभावना रखता है।
Science behind sky colour why not yellow If it is blue then why red in morning and evening know The answer
आसमान के रंगों का विज्ञान डेनियल फ्रीडमैन ने समझाया - फोटो : अमर उजाला / एजेंसी
1870 में ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी जॉन विलियम स्ट्रट ने की व्याख्या
अब नाइट्रोजन व ऑक्सीजन के अणुओं को टेनिस बॉल और प्रकाश की कंचों के ढेर के रूप में कल्पना करें। टेनिस बॉल जब कंचे के ऊपर गिरती है, तो लगता है कि बॉल कंचे को खा रही है और फिर उगल देती है। इस प्रक्रिया को भौतिकशास्त्री प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं। करीब 1870 में ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी जॉन विलियम स्ट्रट, जिन्हें लॉर्ड रेले के नाम से जाना जाता है, ने पहली बार इसे स्पष्ट किया कि आकाश नीला क्यों है?

ऐसा नहीं होने पर आकाश अंधकारमय हो जाता
सूर्य की नीली रोशनी वायुमंडल से गुजरते समय सबसे अधिक बिखरती है। इसे रेले प्रकीर्णन भी कहते हैं। वायुमंडल में अन्य गैसें भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं, जैसे वैश्विक जलवायु पर कार्बन डाइऑक्साइड या मीथेन का प्रभाव। लेकिन इनका आसमान के रंग पर बहुत ही कम प्रभाव पड़ता है। यदि प्रकीर्णन न होता, तो आकाश अंधकारमय हो जाता, जैसा चंद्रमा पर है, जहां वायुमंडल नहीं है।

इसलिए नहीं दिखता नीला और हरा प्रकाश
रेले प्रकीर्णन के अनुसार, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आसमान में लालिमा इसलिए होती है, क्योंकि जब सूर्य क्षितिज के पास होता है, तो उसका प्रकाश पृथ्वी की सतह तक पहुंचने के लिए वायुमंडल के बहुत अधिक भाग से होकर गुजरता है, जबकि वह सीधे ऊपर होता है। नीला और हरा प्रकाश इतनी अच्छी तरह से बिखरा होता है कि उसे आसानी से नहीं देखा जा सकता। जबकि आकाश लाल और नारंगी प्रकाश से रंगा हुआ होता है। रंगों के विज्ञान को समझना और खुद को अभिव्यक्त करना मनुष्यों के इतिहास में काफी अहम रहा है। अगली सुबह जब आप शर्ट पहनें, तो उसके रंग के चयन का ध्यान रखें।
(द कन्वर्सेशन से)
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