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परिदृश्य: अमेरिका में कट्टरपंथियों का ठिकाना, फिर भी नहीं वहां के आदर्शों की परवाह
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सार
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अमेरिका।
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अमर उजाला
विस्तार
कुछ दिनों पहले न्यूयॉर्क में सुचित्रा सेन चलचित्र उत्सव का आयोजन हुआ। इसका आयोजन न्यूयॉर्क में रह रहे अनिवासी बांग्लादेशियों ने किया था। इससे कुछ ही दिनों पहले न्यूयॉर्क में बांग्ला पुस्तक मेला और साहित्य अनुष्ठान आयोजित हुए थे। इनके आयोजक भी अनिवासी बांग्लादेशी थे। इससे ऐसा लगता है कि अमेरिका में रहने वाले सभी बंगाली शायद प्रगतिशील हैं, सभी शायद साहित्य या संस्कृति प्रेमी हैं। क्या सच में ऐसा है?बेशक ढाका और न्यूयॉर्क में बहुत अंतर है। अमेरिका और बांग्लादेश में जो अंतर है, ढाका और न्यूयॉर्क में वही अंतर है। अमेरिका चूंकि बांग्लादेश की तुलना में अत्यधिक विकसित और सभ्य देश है, इस कारण बड़ी संख्या में बांग्लादेशी अमेरिका की स्थायी नागरिकता पाने के लिए अमेरिका जाते हैं। कट्टर मुस्लिम भी, जो हमेशा धर्म के नशे में चूर रहते हैं, ईसाइयों-यहूदियों से घृणा करते हैं, उन्हें गाली देते हैं, मौका मिलने पर वे भी अमेरिका जाने का जुगाड़ बिठाते हैं। वे अगर चाहें, तो आराम से अरब देशों में बस सकते हैं, पर वे ऐसा नहीं करते।
बांग्लादेशियों को भी अमेरिका बहुत आकर्षित करता है। अमेरिका की नागरिकता मिलने पर उनका जीवन धन्य हो जाए। स्थायी निवास के लिए उन्हें ईसाइयों, यहूदियों और नास्तिकों का देश अमेरिका ही पसंद है। बहुत लोग तो जोखिम उठाकर भी पश्चिमी देशों में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं। रात के अंधेरे में नाव से भूमध्यसागर पार कर यूरोप पहुंचते हैं। नाव के डूब जाने से बहुतों की जान भी जाती है। इसके बावजूद नाव से समुद्र पार करने की जोखिम भरी कोशिशों पर विराम नहीं लगता। अरब देश में हज करने जाने, अरब देशों की पोशाक पहनने, अरब देशों की भाषा और आचार-व्यवहार का अनुसरण करने और अरब लोगों को महामानव समझने के बावजूद बांग्लादेश के लोग अरब देशों में बसने की उत्सुकता नहीं दिखाते। इसके बजाय अरब देशों में श्रमिक का काम करने गए लोग जितनी जल्दी संभव हो सके, घर लौट आने के बारे में सोचते हैं। और अरब देशों में लोगों के घरों में काम करने वाली बांग्लादेशी महिलाएं अपनी जान बचाने के लिए घर लौट आती हैं, या फिर लाश बनकर लौटती हैं।
अमेरिका बांग्लादेशियों को आकर्षित करता है, तो उसकी वजह है। अमेरिका में नौकरी करने, व्यापार करने, स्वतंत्रता से चलने-फिरने, अपने धर्म का पालन करने, बच्चों को स्कूलों में मुफ्त में पढ़ाने की सुविधा है। वहां रुपये-पैसे न रहने पर फूड पैकेट मिलता है, मुफ्त में इलाज, दवा, आया आदि की सुविधा है। सर्वोपरि, अमेरिका में मानवाधिकार पर बहुत अधिक जोर दिया जाता है, जबकि बांग्लादेश में मानवाधिकार की किसी को परवाह ही नहीं है। इसके बावजूद अमेरिका में रहने वाले ये लोग अमेरिकी आदर्शों को थोड़ा भी नहीं मानते। अमेरिका इन्हें उदार नहीं बना पाता। अमेरिका में रहते हुए भी ये बांग्लादेशी बने रहते हैं। भोजन की खोज इन्हें हलाल मीट की दुकान पर ले जाती है। अमेरिका में आने के बावजूद ये बांग्लादेश का पहनावा नहीं छोड़ते। महिलाएं बुर्का और नकाब नहीं छोड़तीं। अमेरिका में रहते हुए भी ये धार्मिक कट्टरता को बरकरार रखते हैं। ये मानते हैं कि उनका धर्म दुनिया में सबसे श्रेष्ठ धर्म है। वहां रहकर भी ये लोग मानते हैं कि ट्विन टावर्स को ध्वस्त कर देने वाले आतंकवादियों ने बहुत बड़ा काम किया था। इनमें से कुछ तो यह सपना तक देखते हैं कि पश्चिम के तमाम देश मुस्लिमों से भर गए हैं और यह पृथ्वी सिर्फ मुस्लिमों के लिए है।
बांग्लादेशियों की नई पीढ़ी में अमेरिका जाने की इच्छा प्रबल है। यही नहीं, ये लोग अपने देश से बाहर यह बताने में भी कतराते हैं कि उनके माता-पिता बांग्लादेशी हैं। दूसरी ओर, अपने घर में कट्टरवादियों द्वारा लगातार ब्रेनवॉश किए जाने के कारण कुछ लोग अपने धर्म को श्रेष्ठ समझने लगते हैं। इस तरह के भटके हुए लोग दूसरे देशों के मुस्लिमों को अपना समझने की गलती कर डालते हैं। हालांकि दूसरी तरफ यह भी सच है कि अमेरिका में पैदा हुई पीढ़ी के अनेक बच्चे बांग्ला में बातचीत करते हैं, बांग्ला गीत गाते हैं। हालांकि यह इस पर निर्भर करता है कि इन बच्चों के माता-पिता घर में बांग्ला संस्कृति को कितना प्रोत्साहित करते हैं।
अनिवासी बांग्लादेशियों ने अमेरिका के विभिन्न शहरों में छोटे-छोटे बांग्लादेश बना लिए हैं। पश्चिम उनके जीवन-यापन और सोच-विचार में किसी प्रकार का बदलाव नहीं ला पाया है। अमेरिका में रह रहे बांग्लादेशी अब भी जात-पांत, अंधविश्वास और कठोर पुरुषतंत्री सोच में जकड़ा हुआ है। इनके अपने देश में नारी विरोध का जो इतिहास है, उसे ये बांग्लादेशी बंगाल की खाड़ी के किनारे से अटलांटिक और प्रशांत महासागर के किनारे तक ढोकर ले आए हैं। अनिवासी नागरिक शायद ऐसे ही होते हैं। जिस मिट्टी से वे आते हैं, आजीवन उसी मिट्टी से जुड़े रहते हैं। विदेशी संस्कृति से वे वस्तुत: उतना ही ग्रहण करते हैं, जितना उनके रोजगार के लिए जरूरी होता है। लेकिन सोच-विचार की दरिद्रता से मुक्ति पाने के लिए जिस दर्शन की जरूरत होती है, उसे वे कभी जान-सीख-अपना नहीं सकते। वे आजीवन सिर्फ उसी पर चर्चा करते हैं, जो अपने देश से सीखकर आए होते हैं।
मैं यह नहीं कह रही कि न्यूयॉर्क में बांग्ला साहित्य और संस्कृति के कर्णधारों ने सिर्फ मुझे ही प्रतिबंधित किया। हो सकता है, और भी लेखकों-कवियों-संस्कृतिकर्मियों को उन्होंने प्रतिबंधित किया हो, और भविष्य में भी करते रहेंगे। और वहां आमंत्रित कवियों-लेखकों ने न तो इस प्रतिबंध के विरोध में कुछ कहा, न भविष्य में कुछ कहेंगे। धारा के विरुद्ध चलने वाले या अलग विचार रखने वालों की उपेक्षा करते हुए बांग्ला पुस्तक मेला इसी तरह सालोंसाल आयोजित होते रहेंगे। इसी कारण मैं कहती हूं कि बांग्लादेश और अमेरिका में भले ही फर्क हो, लेकिन इन जगहों में रहने वाले बांग्लादेशियों में आपको कोई अंतर नहीं दिखेगा। जिस तरह ढाका में होने वाले पुस्तक मेले में मेरा प्रवेश प्रतिबंधित है, ठीक उसी तरह न्यूयॉर्क में होने वाले पुस्तक मेले में भी मुझे प्रतिबंधित किया जाता है। सात समुद्र पार बस जाने के बावजूद संकुचित बंगाली संकुचित ही रह जाता है।