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पूत कपूत तो ठुकना पिता को ही है!

Thu, 03 Apr 2014 06:38 PM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Thu, 03 Apr 2014 06:38 PM IST
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satire on Spoiled child

हमारे यहां यही होता है कि औलाद गलती करता है और सुननी बाप को पड़ती है। बेटा अगर मुर्गी चुराकर ले गया है, तो उसे पकड़ना तो आपके बस की बात नहीं है न! इसी वक्त के लिए कुदरत ने एक अदद बाप दिया है कि आप अपना तात्कालिक गुस्सा उस पर जाकर निकाल दें। मुर्गी तो वापस आने से रही, आपका पुरुषत्व जरूर लौट आएगा।

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वैसे भी ऐसी ऊटपटांग हरकत करने वालों के बाप डेढ़ पसली के ही तो होते हैं। बेटे से ज्यादा जमाने के सताए होते हैं और हर समय यों बैठे रहते हैं, जैसे जुए में हारे हुए पांडव हों। ऐसे बाप वैसे भी जान छोड़ने के लिए उधार ही बैठे रहते हैं कि बेटे से तो मुक्ति मिल जाएगी।
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जरा सोचिए उस शख्स के बारे में, जिसके घर का नुकसान उत्पाती बालक ने किया है। वह जानता है कि क्षतिपूर्ति तो ये कहां से करेंगे, मगर फिर भी इस बात की कोशिश जरूर की जाती है कि बात-बात में बात इतनी बढ़ जाए कि दोषी पिता को धुनक तो दें ही! पिट रहा पिता भी मानता है कि यदि वह ऐसी संतान पैदा नहीं करता, तो यों सरेआम धुलता तो नहीं।
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उसे याद आता है कि बचपन में एक बार बगीचे से आम चुराने का रसभरा विचार उसके मन में आया था। लेकिन पिता की फ्री-स्टाइल पिटाई के डर से वह इस अपराध भावना से जल्दी ही मुक्त हो गया था। शायद यही बीज रहा होगा, उसके डीएनए में कि आज बेटे के शरीर में अपराध का पेड़ बन चुका है।


प्रथम अपराध से पूर्व ही पिता अगर चिरंजीव को ठोक-पीट देता है, तो पिता के पिटने के अवसर नगण्य हो जाते हैं। ठीक ही कहा है किसी मुख्यमंत्री ने कि बेटा गलती करे, तो बाप की ठुकाई करनी चाहिए। उजड्ड बेटे को तो जब बाप ही हाथ नहीं लगा सकता, तो मोहल्लेवाले सिवा बाप को धोने के अपना गुस्सा कहां उतारने जाएं। यह अलग बात है कि कई बार सूद समेत बेटा यह कर्ज भी उतार जाता है और आपको अस्पताल में भर्ती करवा देता है। हां, अनाथ के अपराध करने पर सख्त रोक जरूरी है, वरना ठुकाई के लिए पिता कहां से आएगा!

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