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(बे)पटरी-पटरी आंदोलन चले...

Thu, 10 Oct 2013 06:21 PM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Thu, 10 Oct 2013 06:21 PM IST
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satire on rail movement

रेल की पटरियों पर अगर आंदोलन बोया जाए, तो आरक्षण की फसल लहलहाने लगती है। अब मुझे समझ में आ रहा है कि लोग अपने आसपास रेल की मांग क्यों करते हैं। अगर आंदोलन के लिए मन हो रहा है, तो आप रेल ही रोकेंगे न! और अगर आपके आसपास दो-चार सौ किलोमीटर तक कोई रेल पटरी ही न हो, तो आप धरना कहां देंगे, खासतौर पर जब आप जातिगत आरक्षण का आंदोलन चलाना चाहते हों? आरक्षण अगर चाहिए, तो रेल की पटरियों पर चलकर ही आप तक पहुंचेगा। आने को तो सड़क रास्ते से भी आ सकता है, मगर उसमें ज्यादा वक्त लगता है। पटरी पर आपने अपने उपस्थ धर दिए, तो समझ लीजिए, मांगें मंजूर होने में देर नहीं है।

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अगर आप बढ़ रही महंगाई के खिलाफ आंदोलन करना चाहते हैं, तो रेल की पटरी पर बैठने का आपको हक नहीं है। हां, बगैर टिकट इन पटरियों पर चल रही रेलों में सवार होकर दिल्ली जरूर पहुंच सकते हैं। रेल की पटरियों से आरक्षण तेजी से आता है। यह भी कह सकते हैं कि आरक्षण की मांग के लिए रेल की पटरियां आरक्षित हैं। इसीलिए आपने देखा ही होगा कि रेल बजट में कितना शोर होता है कि हमारे इलाके में रेल चाहिए। आना-जाना भी कोई रेल से करता है भला। गांववाले वैसे भी बाहर कम निकलते हैं और जो कुछ निकलते भी हैं, तो उनके पास अपने गाड़ी-घोड़े होते हैं। रेल की उपयोगिता इसी बात से तय होती है कि साल भर में कितनी बार रोकी गई।
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रोकने के लिए सड़क भी रोक सकते हैं, मगर उसमें वह बात नहीं आती। एक ट्रेन रोक लें, तो दस बसें, बीस ट्रक, चालीस कारें तो आसानी से हो जाती हैं। अब आप ही सोचिए कि इतनी जहमत सड़क पर क्यों उठाई जाए। फिर एक ट्रेन का रुकना यानी कई-कई ट्रेनों का इधर-उधर हो जाना है। सड़क पर खतरा यह भी है कि ट्रक, बस या कार वाले भी कहीं दो-दो हाथ करने न उतर आएं। सड़क में तो यह भी खतरा होता है कि आपकी जान-पहचान वाले भी फंस सकते हैं और उनका लिहाज करते हुए सड़क खोलना पड़ सकता है। मगर रेल में अपना सगा तो कोई होता नहीं है।
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फिर पटरी आंदोलन का बड़ा फायदा यह भी होता है कि सरकार डंडे नहीं फटकारती और आपके खिलाफ केस भी नहीं करती। जब कोई आंदोलन इतना निरापद हो, तो कोई क्यों पटरी छोड़कर कहीं और जाएगा।

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