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ट्रक भर जेवर, ट्रक भर नोट

Wed, 10 Jul 2013 10:37 PM IST
सहीराम
सहीराम Updated Wed, 10 Jul 2013 10:37 PM IST
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satire amar ujala

देश की प्रगति को लेकर अब किसी तरह का कोई शुबहा नहीं रहना चाहिए जनाब। देखिए, ट्रक भर जेवर मिल रहे हैं और ट्रक भरकर नोट भी। जो जेवर पहले संदूक में जरा-सी जगह पाते थे, वे आज ट्रकों में नहीं समा रहे। पहले किसी के पास जेवर थोड़े ज्यादा हो जाते थे, तो उन्हें हांडी में रखकर जमीन में गाड़ दिया जाता था, जो बाद में किसी सौभाग्यशाली को मिलता था। फिर जब थोड़ी समृद्धि बढ़ी, तो लोग बैंकों के लॉकर में जेवर रखने लगे।

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तिजोरियां तो नगर सेठ रखते थे या फिर फिल्मी सेठ। पर अब जेवर ट्रकों में लदे घूमते हैं। लावारिस हालत में। सास-बहू सीरियलों में घर की महिलाएं किचन में भी कांजीवरम की भारी-भरकम साड़ियां और घड़ी-घड़ी सोने के जेवर पहने जब रोटियां बेलते या सब्जी पकाते दिखती थीं, तो आश्चर्य होता था। अब ट्रक भर जेवरों पर भी नहीं होता।
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और नोट भी अब तिजोरियों में नहीं अंटते। पहले जब ये नेताओं की तिजोरियों में नहीं अंटते थे, तो उनके गद्दों और तकियों में सुरक्षित शरण पाते थे, जैसे सुखराम जी के यहां मिले थे। फिर जब वे बड़ी-बड़ी रिश्वतें लेने लगे, तो सूटकेस में पहुंचने लगे, जैसे नरसिंह राव जी के यहां सूटकेस पहुंचने की बात चली थी। लुटेरे बैंक भी लूटते थे, तो थैलों में भरकर ही नोट ले जा पाते थे। नोटों की बोरियां तो सिर्फ कहावतों में होती थी। इधर एटीएम वगैरह की लूट में अगर लूटनेवाले ज्यादा ही कर्मठ निकलते थे, तो एटीएम मशीन उठा ले जाते थे, पर उनमें नोट कितने निकलते थे, पता नहीं। दिल्ली में पिछले दिनों जो सबसे बड़ी लूट हुई बताई गई, उसमें बैंक की वैन को लूटा गया। उस वैन से लूटे गए नोट भी ट्रक भर तो नहीं निकले होंगे।
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पर अब देख लो जी, देश ने कितनी प्रगति कर ली है। पहले चुनाव वगैरह के समय में शराब भी ट्रक भर नहीं लुटाई जाती थी। साड़ियां और धोतियां भी ट्रक भर दान नहीं की जाती थी। अब चुनाव के समय कारों की डिक्कियों में नोटों की गड्डी जरूर मिलती हैं, पर वे भी ट्रक भरकर नहीं होती। पहले लोग जेवर के नाम पर एक अंगूठी पहनकर इतराने लगते थे। और नोटों का मामला तो ऐसा था जी कि जिसका पर्स भरा हो, वह शहंशाह होता था। लेकिन अब जेवरों और नोटों के ट्रक भरे हैं और उनका नामलेवा भी कोई नहीं, दावेदार नहीं। ऐसे छोड़ दिया, जैसे कभी दिलदार टाइप के लोग चवन्नी, अठन्नी छोड़कर चल देते थे।

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