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समरसिद्धा

Sat, 16 Aug 2014 09:17 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
कल्लोल चक्रवर्ती Updated Sat, 16 Aug 2014 09:17 PM IST
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samarsiddha book review

दीप नैयर का उपन्यास 'समरसिद्धा’, आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व के भारत के बहाने तत्कालीन दो राज्यों- दक्षिण कोसल और मेकल-की कहानी कहता है। दक्षिण कोसल में आर्यों का निवास है, जिसकी राजधानी श्रीपुर है, जबकि उसके पड़ोसी राज्य मेकल में अनार्य बसते हैं, जिसकी राजधानी अमरकंटक है। ऊपरी तौर पर उपन्यास की कहानी इन दो राज्यों की आपसी लड़ाई पर केंद्रित है। दक्षिण कोसल का राजा रुद्रसेन अपनी शक्ति के घमंड में चूर है और विस्तारवादी नीति के तहत जब-तब मेकल पर हमला करता है। मेकल का युवा राजा नील समझदार है, जो आर्यों की श्रेष्ठता का राज जानने छद्मवेश में श्रीपुर पहुंचता है।

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पर मूलतः यह किताब दक्षिण कोसल पर केंद्रित है। श्री का अर्थ है समृद्धि। श्रीपुर (अब सिरपुर) की खुदाई से अब ऐतिहासिक महत्व की जो चीजें निकली हैं, वे इसे हड़प्पा की तुलना में अधिक विकसित नगर साबित भी करती हैं। संदीप नैयर इसी 'आधुनिक' श्रीपुर की कहानी कहते हैं, जहां अमोदिनी जैसी नगरवधू की रंगशाला है, तो राजकुमारी पल्लवी के स्वयंवर के विराट आयोजन में तमाम राज्यों के लोग जुटते हैं। दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण यह कि आदित्य शास्त्री जैसा प्रकांड पंडित नीच जाति के गुंजन को शास्त्र की शिक्षा देता है। पर जो समाज जाति और वर्ण के खांचे में बंटा हुआ है, वह इस समृद्धि को ज्यादा दिनों तक हजम नहीं कर पाता।
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इस उपन्यास की कहानी वैसे तो ठीक ढंग से ही चलती है, पर कथानायिका शत्वरी एक दिन अपने पति दामोदर को अमोदिनी के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख घर क्या छोड़ देती है, वहीं से शत्रुता और षडयंत्र की शुरुआत हो जाती है। गुंजन और शत्वरी के निर्दोष संबंधों को समाज पाप का सिर्फ नाम नहीं देता, बल्कि इस मामले को राजधानी तक ले जाता है। इसका भीषण नतीजा शत्वरी के मां-बाप की आत्महत्याओं और गुंजन के साथ शत्वरी के रात के अंधेरे में निकल जाने के रूप में सामने आता है। इस उपन्यास का उद्देश्य अगर एक उन्नत समाज के भीतर पलते जाति-वर्ण की विषबेल की पड़ताल करना है, तो लेखक उसमें सफल है। नीची जाति से जोड़े जाने पर व्यवस्था के खिलाफ लड़ने का संकल्प लेने वाली सिर्फ शत्वरी नहीं है, बल्कि कदम-कदम पर ऐसे पात्रों और ऐसी परिस्थितियों से हमारा सामना होता है, जिनसे पता चलता है कि दक्षिण कोसल की समृद्धि से इतर एक विराट वर्ग का असंतोष कभी भी स्थितियों को गंभीर बना सकता है। उससे भी आश्चर्यजनक यह कि अपनी सामरिक और सांस्कृतिक विरासत पर इठलाता दक्षिण कोसल समाज के हाशिये पर जी रहे अपने ही लोगों के क्षोभ और विरोध से अनजान है। मेकल को शत्रु समझने वाला दक्षिण कोसल यह नहीं भांप पाता कि अपने लोगों का गुस्सा ज्यादा खतरनाक हो सकता है।
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दक्षिण कोसल की स्थितियों का यह चित्रण आज के हमारे समय-समाज का भी रूपक है-इस उत्तर आधुनिक दौर में हमारे अपने नीति-नियंता भी पूरे देश को, और उसकी चिंताओं-शिकायतों को कितना समझ पाते हैं! उपन्यास की भाषा-शैली भी प्रभावित करती है। पर मुश्किल यह है कि जिस वक्त जाति और वर्ण की व्यवस्था पर चोट करने का समय आता है, ठीक उसी समय यह उपन्यास जासूसी उपन्यासों जैसे ट्रीटमेंट और फिल्मों की भावुक फॉर्मूलेबाजी में ऐसा डूबता है कि अंत तक उबर नहीं पाता। गुंजन की चिता की राख अपने शरीर पर मलते हुए शत्वरी का कसम खाना, राजा की सेना को मूर्च्छित करने के लिए शत्वरी का रसायन तैयार करना (और उससे उसके बेटे का ही नुकसान होना) और उपन्यास के आखिर में शत्वरी का अलौकिक यंत्र हासिल करना-ये सब इसी फिल्मी फॉर्मूलेबाजी के कुछ नमूने हैं। सवाल यह भी है कि समरसिद्धा जैसे उपन्यास लिखने का उद्देश्य क्या है? क्या इसके पीछे उस श्रीपुर के समृद्ध इतिहास को उकेरने की इच्छा है, जो खुद लेखक की भी जन्मभूमि (रायपुर) है? या इसके जरिये यह बताने की कोशिश की गई है कि जिस सभ्यता को इतना श्रेष्ठ बताया जा रहा है, वह भीतर से कितनी खोखली थी?


इतिहास को उपन्यास का आधार बनाने के अपने खतरे हैं। तब तो और भी, जब इतिहास को इंटरनेट में टटोला जाए। इसी का नतीजा है कि यह किताब न तो आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व की ऐतिहासिक गाथा बन पाई है, न ही यादगार उपन्यास साबित हो पाया है।

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