सऊदी लड़की को सलाम
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वह रियो ओलंपिक के अद्भुत दृश्यों में से था। करीमन अबुलजुदायल ओलंपिक के 100 मीटर दौड़ में हिस्सा ले रही थीं। लेकिन वह उस स्पर्धा में भाग ले रहीं दूसरी धाविकाओं से अलग दिख रही थीं। करीमन ने सिर पर हिजाब डाल रखा था, और उसका पूरा शरीर काले कपड़े में ढका था। जबकि दौड़ते हुए शरीर में कपड़े जितने कम हो, उतना ही अच्छा रहता है। पिछले ओलंपिक में सारा अख्तर नाम की सऊदी लड़की ने 800 मीटर की दौड़ में हिस्सा लिया था। सारा ने भी अपना पूरा शरीर ढककर प्रतियोगिता में हिस्सेदारी की थी। सारा के बाद ही इस ओलंपिक में करीमन ने हिस्सा लिया। करीमन ने हालांकि फाइनल में दौड़ पाने का हक खो दिया, लेकिन उन्होंने ओलंपिक में हिस्सा लिया, यही काफी है।
ऑस्ट्रेलियाई धाविका कैथी फ्रीमैन भी पूरा शरीर ढककर स्पर्धा में हिस्सा लेती थीं। हालांकि ऐसा वह धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने के लिए नहीं करती थीं। जबकि करीमन का मजहब उन्हें सिर से पैर तक ढके रहने की सीख देता है। सऊदी अरब में लड़कियों को इसी तरह जीना पड़ता है। उन्हें घर से बाहर जाते हुए बुर्के में निकलना पड़ता है। सिर्फ आंखों और हाथों को बुर्के से मुक्त रखा जाता है। ओलंपिक में अब तक हमने सारा और करीमन के अलावा भी सऊदी अरब की एक-दो लड़कियों को देखा है। सारा अख्तर अमेरिका में रहती हैं, वह वहीं पैदा हुईं। अमेरिका में उसे बुर्के से मुक्ति मिली हुई है। लेकिन सऊदी सरकार ने नियम बना रखा है कि दूसरे देशों में रहने वाली सऊदी लड़कियों को ओलंपिक में भाग लेते हुए अपना शरीर ढकना होगा। यही नहीं, वेबसाइट पर अपनी कम कपड़ों वाली तस्वीरों को भी डिलीट कर देना होगा! कैसा विचित्र देश है सऊदी अरब! ऐसा एक देश अपनी पूरी ठसक के साथ दुनिया के मानचित्र में बना हुआ है, यह सोचकर भी मुझे घृणा होती है।
पहले सऊदी अरब ओलंपिक में अपने यहां की लड़कियों को नहीं जाने देता था। वर्ष 2012 में उसने यह रोक हटा दी। रोक हटने के बाद से सऊदी लड़कियां ओलंपिक स्पर्धाओं में दिखने लगी हैं। करीमन जब दौड़ लगा रही थीं, तब उसकी शर्ट थोड़ी खिसक गई थी, जिससे उनके पेट का एक हिस्सा दिखने लगा था। इससे यह आशंका भी पैदा हो गई है कि करीमन के खिलाफ कहीं फतवा न जारी कर दिया जाए। कहीं उन्हें पत्थरों से मार-मारकर हत्या कर देने की सजा न सुनाई जाए। ऐसी आशंकाएं निराधार भी नहीं हैं। जिन सऊदी लड़कियों के साथ बलात्कार होता है, उन्हें जेल में रखा ही जाता है, उन पर कोड़े भी बरसाए जाते हैं।
सऊदी अरब महिलाओं के लिए तो एक भयंकर देश है ही, उदारवादियों के लिए भी वहां रहना आसान नहीं। वहां के एक ऐसे ही उदारवादी राइफ वादावी की पत्नी इंसाफ हैदर आज अपने बच्चों के साथ कनाडा में रहती हैं। दरअसल इंसाफ हैदर शर्ट-पैंट पहनती हैं। अधिकार सचेतन महिलाएं सऊदी अरब से बाहर निकलते ही सबसे पहले अपना बुर्का उतार फेंकती हैं। हैदर इंसाफ से मेरी कई बार बातें हुई हैं। उससे लगता है कि अगर सऊदी लड़कियों-महिलाओं के लिए बाहर निकलने का संयोग बने, तो कम ही वहां रहना पसंद करेंगी, जहां औरतों को रत्ती भर भी आजादी नहीं है। सऊदी अरब के भीतर कराए गए सर्वेक्षणों से पता चलता है कि वहां की औरतें औरतों के गाड़ी चलाने के खिलाफ हैं, वहां की ज्यादातर महिलाएं पुरुष अभिभावक के अधीन जीवन गुजारने को राजी हैं। ऐसे सर्वेक्षणों की सत्यता पर संदेह है।
सऊदी अरब का ओलंपिक में प्रतिनिधित्व करने वाली सभी लड़कियों की ट्रेनिंग अमेरिका में हुई है। जाहिर है कि वहां किसी लड़की ने अपना पूरा शरीर ढककर ट्रेनिंग नहीं ली होगी। सिर्फ सऊदी अरब के डर से वहां की लड़कियों ने पैंट-टॉप पर हिजाब डाल लिया होगा। कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है कि सऊदी अरब जैसे एक पुरातनपंथी और नारी-विरोधी देश को तमाम दूसरे देश इतना महत्व क्यों देते हैं। दुनिया के ताकतवर देश सऊदी अरब से संपर्क रखते हैं, इसी कारण वह देश दुस्साहसपूर्वक स्त्री-विरोधी कदम और कानून बरकरार रखता है। शरिया कानून के कारण वहां की औरतें समानाधिकार से वंचित हैं। औरतें अपने रिश्तेदारों के अलावा किसी के साथ बाहर नहीं निकल सकती, यहां तक कि बातचीत भी नहीं कर सकती। यानी वहां स्त्री-पुरुषों के बीच दोस्ती पर प्रतिबंध है। पकड़े जाने पर मौत की सजा तय है। जिस देश में प्रेम पर प्रतिबंध लगा हुआ हो, वह देश कितना बर्बर होगा, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। सऊदी अरब दुनिया का एकमात्र देश है, जहां औरतों के गाड़ी चलाने पर प्रतिबंध है। लैंगिक विषमता के मोर्चे पर दुनिया के 145 देशों में सऊदी अरब 134 वें नंबर पर है।
ऐसे एक भयंकर नारी-विरोधी देश से निकलकर करीमन ने ओलंपिक के मैदान में दौड़ लगाई। पूरी दुनिया ने करीमन को दौड़ते देखा। करीमन इस पृथ्वी की बेटी है, और उसे भी दौड़ने का अधिकार है। वह प्रतियोगिता में हार गईं, लेकिन दौड़ने के अपने अधिकार का उपयोग किया, यही क्या कम है! अपनी तीखी आलोचनाओं को देखते हुए ही सऊदी अरब संभवतः औरतों पर लगे अंकुश में कुछ-कुछ ढील दे रहा है। अब शायद वहां की महिलाएं कुछ-कुछ मामलों में वोट दे पाएंगी। यदि सऊदी महिलाओं को वोट देने और राजनीति में भाग लेने का अधिकार मिले, तो चीजें बदल सकती हैं। इस्लाम के शुरुआती युग में औरतों को जितने अधिकार हासिल थे, वे भी मिल जाएं, तो काफी हैं। अरब में इस्लाम के आविर्भाव से पहले औरतों की कितनी आजादी थी, यह खदीजा की कहानी पढ़ने से पता चलती है। आज सऊदी की कोई औरत खदीजा की तरह व्यापार करने और अपनी पसंद की शादी करने की बात सोच तक नहीं सकती। लेकिन उम्मीद करने में हर्ज क्या है कि एक दिन सऊदी अरब भी बदलेगा। तब करीमन जैसों को हिजाब बांधकर ओलंपिक के मैदान में उतरना नहीं पड़ेगा। उस सऊदी अरब में राइफ बादाभी जैसी उदार महिलाओं की संख्या बढ़ेगी। वह दिन अगर दूर हो, तब भी हर्ज नहीं है, लेकिन वह बदलाव कभी आए तो सही।