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संकट में किस तरह सहारा देगा ग्रामीण भारत, बता रहे हैं जयंतीलाल भंडारी

Fri, 25 Sep 2020 06:33 AM IST
जयंतीलाल भंडारी जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Published by: जयंतीलाल भंडारी Updated Fri, 25 Sep 2020 06:33 AM IST
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Rural India and farmers to help in future crisis
कृषि क्षेत्र - फोटो : PTI

कोरोना महामारी और लॉकडाउन की चुनौतियों के बीच सरकार ने देश में किसानों की आय बढ़ाने और कृषि व ग्रामीण विकास के लिए जिस तरह व्यय बढ़ाए हैं, उनसे ग्रामीण भारत के लाभान्वित होने की उम्मीद है। वर्ष 2020-21 में खरीफ सीजन में खाद्यान्न का रिकॉर्ड 14.4 करोड़ टन से अधिक उत्पादन होने की संभावना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए सुकून भरा परिदृश्य है। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ग्रामीण भारत उबारने वाला सहारा दिखाई दे रह है। गौरतलब है कि कोविड-19 की मुश्किलों से राहत दिलाने के लिए देश में कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए घोषित की गई विभिन्न योजनाओं के तहत पिछले दिनों बड़े पैमाने पर किए गए व्यय का असर अब ग्रामीण भारत में कमोबेश दिखाई देने लगा है। रबी की बंपर पैदावार के बाद फसल के लिए किसान को लाभप्रद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिला है। सरकार द्वारा मनरेगा के तहत अधिक रोजगार के लिए अधिक आवंटन के अलावा किसानों को दी गई पीएम किसान सम्मान निधि, गरीब के जन-धन खाते में नकद रुपया डाले जाने एवं पीएम गरीब कल्याण रोजगार अभियान जैसे कदमों से किसान के पास बड़ी धनराशि पहुंची है। 


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अब खरीफ की फसल की अच्छी बुआई और अच्छे मानसून ने ग्रामीण उपभोक्ताओं की आय और उनके खर्च में वृद्धि की नई संभावनाएं जगा दी हैं। उल्लेखनीय है कि विगत 21 सितंबर को सरकार ने आगामी रबी फसल के तहत छह रबी फसलों-गेहूं, चना, मसूर आदि का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया है। गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 50 रुपये बढ़ाकर 1,975 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है। ग्रामीण बाजारों में उर्वरक, बीज, कृषि रसायन, कृषि उपकरणों के साथ-साथ उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में भी अब तेजी से वृद्धि दिखाई दे रही है। इसमें कोई दो मत नहीं कि कोविड-19 की मुश्किलों के बीच ग्रामीण भारत में लोगों को रोजगार देकर उनकी आमदनी बढ़ाने में मनरेगा की प्रभावी भूमिका रही है। मनरेगा ने न केवल गांवों में परंपरागत रूप से काम कर रहे लोगों को रोजगार दिया, बल्कि शहर से गांव लौटे प्रवासी श्रमिकों को भी रोजगार दिया है। मनरेगा के तहत काम मांगने वाले लोगों की संख्या हाल के दौर में बढ़ती गई है। 

उल्लेखनीय है कि मनरेगा पर मौजूदा वित्त वर्ष के बजट में 61,500 करोड़ रुपये रखे गए थे। फिर कोविड-19 की चुनौती के कारण इसमें 40,000 करोड़ रुपये का इजाफा किया गया। पिछले पांच महीने में मनरेगा की कुल आवंटित राशि में से करीब 60 फीसदी से अधिक खर्च हो चुकी है। कोविड-19 और लॉकडाउन की वजह से अपने गांव लौटकर आए लाखों ग्रामीणों के लिए रोजगार सुनिश्चित करने हेतु विगत जून में 50,000 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ शुरू किए गए गरीब कल्याण रोजगार अभियान से भी ग्रामीण भारत के उपभोक्ताओं की आय बढ़ी है। कुल छह राज्यों के 116 जिलों में चलाए जा रहे इस अभियान के तहत रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा रहे हैं और लोगों की आमदनी बढ़ाई जा रही है। यहां यह उल्लेखनीय है कि हाल ही में संसद से पारित किए गए कृषि सुधार से संबंधित तीन विधेयक खासकर छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत बनाने में कारगर भूमिका निभाएंगे। 

हालांकि यह भी सही है कि इन विधेयकों में कुछ चीजें अस्पष्ट होने के कारण किसानों में भ्रम है। इसके अलावा किसान रेल भी कृषि एवं ग्रामीण विकास को नया आयाम देते हुए दिखाई देगी। हालांकि अभी ग्रामीण क्षेत्र में सुधार के लिए ऐसे और उपाय अपनाने होंगे, जिनसे किसानों की आय में और बढ़ोतरी हो। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्र में लघु और कुटीर उद्योग को पुनर्जीवित करना होगा। उन्हें आसान तरीके से कर्ज देना सुनिश्चित करना होगा। खराब होने वाले कृषि उत्पादों के लिए लॉजिस्टिक्स सुदृढ़ करने की भी जरूरत है, जिससे कि किसानों को बेहतर मुनाफा दिया जा सके। हम उमीद करें कि कोविड-19 के बीच सरकार द्वारा ग्रामीण भारत के लिए कार्यान्वित की जा रही विभिन्न योजनाओं और ग्रामीण राहत पैकेज से ग्रामीण इलाके में मांग और बाजार की चमक और बढ़ेगी तथा ग्रामीण भारत देश की अर्थव्यवस्था को सहारा देते हुए दिखाई देगा।


 
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