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एक किताब पर बवाल

मरिआना बाबर, वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार Updated Thu, 16 Jan 2020 06:22 PM IST
मरिआना बाबर, वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार
मरिआना बाबर, वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार - फोटो : a
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पाकिस्तान में इस पर बहस हो रही है कि स्कूलों में शुरुआती पांच साल तक बच्चों की पढ़ाई उनकी मातृभाषा में होनी चाहिए। मैं हमेशा इसके पक्ष में रही हूं और मुझे उम्मीद है कि एक दिन पूरे मुल्क में इस पर अमल होगा। ज्यादातर बच्चे उर्दू या अंग्रेजी नहीं बोलते। मिसाल के तौर पर, एक पख्तून बच्चा स्कूल जाने से पहले सिर्फ पश्तो भाषा जानता है, क्योंकि उसके घर में वही बोली जाती है। ऐसे में, कल्पना कीजिए कि ऐसा बच्चा स्कूल जाने पर जब पहली बार उर्दू या अंग्रेजी सुनता है, तब वह कैसा महसूस करता है। वह इन भाषाओं को समझ ही नहीं सकता और खुद को नाकाबिल पाता है। किसी बच्चे के लिए यह बहुत दुखद अनुभव होता है, जिसकी उम्मीद कम से कम वह स्कूल के अपने शुरुआती दिनों में तो नहीं ही करता। इसके विपरीत जब वही बच्चा कक्षा में शिक्षक को अपनी मातृभाषा में बोलते हुए पाता है, तब सब कुछ उसके लिए बेहद आसान हो जाता है। वैसे में, अगले पांच साल में उसके लिए उर्दू या अंग्रेजी सीखना मुश्किल काम नहीं होता।
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यह संयोग ही है कि पाकिस्तान में उर्दू और अंग्रेजी पर बहस मुल्क के एक नामचीन लेखक मोहम्मद हनीफ की किताब ए केस ऑफ एक्सप्लोडिंग मैंगोज के सिलसिले में शुरू हुई है। मोहम्मद हनीफ पाकिस्तान से बाहर भी एक जाना-पहचाना नाम हैं। मुल्क के पूर्व सैन्य तानाशाह जनरल जियाउल हक और दूसरे सेनाधिकारियों का मजाक उड़ाती इस किताब का हाल ही में उर्दू में अनुवाद हुआ है। यह किताब इस अफवाह पर केंद्रित है कि जनरल जिया को आम का एक क्रेट उपहार में दिया गया था, जिसमें बम था, और उसी के कारण उस विमान के परखच्चे उड़ गए, जिसमें जिया और उनके सहयोगी सवार थे। एक दशक से भी पहले हनीफ की यह किताब जब अंग्रेजी में छपी थी, तब इसकी काफी तारीफ हुई थी। दुनिया भर में इस किताब की चर्चा हुई थी और लंबे समय तक यह बुकर प्राइज की सूची में थी। तब से हनीफ ने पाकिस्तान और खासकर सैन्य मामलों की नुक्ताचीनी के मामले में खुद को एक प्रतिष्ठित लेखक के तौर पर स्थापित कर लिया है।

मोहम्मद हनीफ कहते हैं कि जब इस किताब के छपने का मामला आया, तब पाकिस्तान के प्रकाशकों ने अपने हाथ खड़े कर दिए, क्योंकि सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ होने के कारण वे इसे नहीं छापना चाहते थे। आखिरकार वह किताब भारत में छपी। वह कहते हैं, 'लेकिन जब यह किताब छपकर पाकिस्तान में आई, तब सबसे बड़ी हैरत की बात यह थी कि कहीं कुछ नहीं हुआ। न ही मेरे खिलाफ कोई मुकदमा हुआ, न ही किताब पर प्रतिबंध लगा। इसके बजाय सभी जगह इसके बेहतरीन रिव्यू छपे और अनेक स्कूलों और कॉलेजों में इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। तब मैंने सोचा कि इस तरह के लेखन से उन्हीं को तकलीफ होती है,  जो उपन्यास नहीं पढ़ते।' पर हनीफ के इस उपन्यास का उर्दू अनुवाद छपते ही देर से ही सही, लेकिन वह हुआ, जिसके बारे में सोचा नहीं गया था। यह साफ है कि मुल्क के सैन्य तंत्र ने अंग्रेजी में  यह किताब नहीं पढ़ी थी। ऐसे में, अब जाकर किताब के उर्दू अनुवाद में वह जनरल जिया के शासन पर किए गए व्यंग्य और लतीफों को समझ पा रहा है। अलबत्ता उर्दू में आई हनीफ की यह किताब, जिसे पुस्तक मेलों में काफी प्रचार मिला और बड़ी संख्या में लोगों ने जिसे पढ़ा और पसंद किया, सीधे-सीधे सेना के लिए चुनौती है।

हनीफ कहते हैं कि सुरक्षा कर्मचारियों ने कराची में उसके प्रकाशक से और लाहौर व इस्लामाबाद की दुकानों से किताब की तमाम प्रतियां जब्त कर ली हैं। यही नहीं, लेखक और बीबीसी के इस पूर्व पत्रकार के खिलाफ पिछले महीने जियाउल हक के बेटे ने मानहानि का मुकदमा भी दायर किया है। हनीफ के मुताबिक, सोमवार को कुछ लोग मकतब-ए-दानयाल पब्लिशिंग हाउस में आए। 'वे खुद को आईएसआई के एजेंट बता रहे थे। लेकिन वे अपनी पहचान का कोई दस्तावेज नहीं दिखा पाए, जिससे इसकी तसदीक हो कि वे सचमुच आईएसआई के लोग हैं। वे किताब की तमाम कॉपियां अपने साथ ले गए। उन्होंने प्रकाशन कंपनी के मैनेजर को धमकियां दीं, मेरे बारे में जानकारियां मांगीं और जाते-जाते यह भी कहा कि वे जल्दी ही उन दुकानों की सूची लेकर आएंगे, जहां इस किताब की कॉपियां भेजी गई हैं। ऐसा लगता है कि वे उन लोगों को डराना चाहते हैं, जो अब भी यह किताब पढ़ना चाहते हैं,'हनीफ ने बीबीसी उर्दू को बताया।

जाने-माने लेखक और राजनीतिक विश्लेषक जाहिद हुसैन कहते हैं कि सीधे-सीधे सेंसरशिप या फिर दबाव के जरिये किया गया दमन मुल्क को तरक्की और बेहतरी के रास्ते से दूर ले जाएगा। 'लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने से सत्ता के बाहर की ताकतों को राजनीति को प्रभावित करने का मौका मिल जाएगा। वे बुनियादी अधिकारों को बाधित करना चाहते ही हैं। ज्यादा चिंतित करने वाली बात यह है कि यह सब कुछ लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई एक सरकार की नाक के नीचे हो रहा है।'

बहुत लोग इससे सहमत हैं कि पाकिस्तान में इन दिनों तानाशाही का बोलबाला है। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आजाद नहीं हैं। बेशक हनीफ की किताब पर प्रतिबंध नहीं लगा है, लेकिन लेस्ली हेज्लटन की द फर्स्ट मुस्लिम और आफ्टर द प्रॉफेट पर सरकार ने प्रतिबंध लगाया है। ऐसे ही शुजा नवाज की द बैट्ल फॉर पाकिस्तान : द बिटर यूएस फ्रेंडशिप ऐंड ए टफ नेबरहुड पर प्रतिबंध तो नहीं लगा है, पर सेना ने इस किताब को लांच करने की अनुमति नहीं दी। शुजा नवाज भी इस पर हैरान हैं, क्योंकि उन्होंने पहले ही इस किताब की प्रति सेना मुख्यालय को भेजी थी। इस किताब में कई वरिष्ठ अमेरिकी और पाकिस्तानी सेनाधिकारियों के इंटरव्यू हैं।

पाकिस्तान जैसे मुल्क में यह स्थिति बहुत दुखद है, क्योंकि निरक्षरों की बड़ी संख्या होने के कारण यहां पढ़ने की आदत तेजी से खत्म हो रही है। ऐसे में,  मु्ल्क का सैन्य प्रतिष्ठान अगर किताबों पर प्रतिबंध लगाता है या उनकी लांचिंग रोकता है, तो भविष्य की पीढ़ियों से किताब लिखने की उम्मीद भला हम किस तरह करेंगे?
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