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अनगढ़ आदिम राग वसंत
परिचय दास
Updated Fri, 15 Feb 2013 12:08 AM IST
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वसंत पंचमी वसंत की आरंभिकी है। वसंत में नवस्फुरण है, नवोन्मेष। भारतीय वर्ष का अंत और आरंभ, दोनों वसंत में ही होते हैं। इससे भारतीय मनीषा की रंग-संरचना, काल की अवधारणा और दृष्टि बोध का पता चलता है। वसंत प्रेम का ऐसा कुंभ है, जहां हम सजीवन स्नान करते रहते हैं।
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माघ शुक्ल पंचमी से ऐसी रसवती धारा चलती है, जिसमें संगीत, साहित्य, कलाएं अवगाहन करती रहती हैं। सरस्वती के हेतु से पंचमी से अद्भुत दृश्यावलियां दिखती हैं: प्रेम की विद्या की लिपियों की। इसीलिए इस दिन को अबूझ मुहूर्त वाला भी माना जाता है, यानी सब कुछ शुभ व मांगलिक।
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वसंत कविता और कला का घर है। प्रत्येक पुष्प, प्रत्येक पत्ती कविता-पाठ करती है, यदि आप सुनें तो। हमारी आभा का सर्वोत्तम प्राण केंद्र वसंत है। किसके यहां दुख नहीं है, किंतु वसंत दुख को ठेलकर एक गहन प्राकृतिक राग देता है। यह जीवन और कला को संयुक्त करता हैः आंतरिक मनोभावों में आत्मीय उल्लास! हम जीना सीखें, इंद्रिय व वैयक्तिकता का द्वार खोलें, सबको अपना बनाएं, सबका दुख-दर्द, हर्ष-विषाद अपना बनाएं, तब जाकर कविता, चित्रकला साहित्य।
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केवल कवि की कल्पना में ही वसंत रमणीय नहीं है, सचमुच में वसंत के आगमन से प्रकृति रम्य व नयन चारू लगती है। पर्यावरण व पारिस्थितिकी भी सम हो जाते हैं। शीत व ग्रीष्म का मध्यमार्ग। स्थल में स्थल-पद्म व जल में जल-पद्म प्रस्फुटित होते हैं। मलय-समीर मंद-मंद चाल से प्रवाहित होता है। कुसुमों के सौरभ से वन-उपवन सभी आमोदित हो उठते हैं।
महानगरों के लोग यदि ध्यान दें, तो चंद्रमा की दुग्ध स्निग्ध ज्योत्सना, पक्षियों के कल कूजन, कोयल की कूक, सुमनों का सौरभ, अशोक की सुषमा सभी इस समय आह्लादकारी लगते हैं! वसंत काल के गुण काषाय, मधुर तथा रुक्ष हैं। हेमंत काल में श्लेष्मा उपचित होती है, वसंत काल आने पर वह प्रकोपित हो उठती है। इस समय वायु एक तरह से प्रशमित हो जाती है।
हरित संहिता में लिखा है- वसंत के समय प्रमुदित कोकिलों की कूक से अरण्य, उद्यान गूंज उठते हैं, वन-उपवन तथा पर्वत श्रेणियां फूलों के सुवास से सुवासित हो उठती हैं। संगीत दामोदर के अनुसार छह राग व छत्तीस रागिणियां हैं। इन रागों के मध्य वसंत एक राग है। श्री राग, वसंत, भैरव, पंचम, मेघराग तथा वृहन्नाट-ये छह राग पुरुषवाद वाच्य हैं। कहते हैं कि वसंत पंचमी को वसंत राग सुनना अभीष्ट को पाना है।
वसंत पंचमी से सरस्वती का वृहत हेतु है। सरस्वती के आठ अंग हैः लक्ष्मी, मेधा, धरा, पुष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा व धृति। निराला ने भी जब वर दे, वीणा वादिनि वर दे लिखा होगा, उसके पहले उनके संस्कार में सरस्वती का दशाक्षर मंत्र रहा होगा- वद् वद् वाग्वादिनि वाहिन वल्लभा। मेघा, प्रज्ञा, प्रभा, विद्या, घी, धृति, स्मृति, बुद्धि, विद्यैश्वर्य- ये सब इनके पीठ देवता हैं। भारतीय परंपरा में पंचशक्तियां मानी जाती हैं- राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा, सरस्वती। जो वाक् अधिष्ठात्री और शास्त्रज्ञान दायिनी व कृष्ण केष्ठोद्भव हैं, उनका नाम सरस्वती है।
वसंत ऋतु पुराकाल से आज तक मनुष्य को सम्मोहित करती रही है। वसंत की प्राकृतिक छटा को इस रूप में समझें कि वह बाहरी यथार्थ व हमारे अंतस का अद्भुत सम्मिश्रण है। इस छटा को बचाना है। यदि वसंत हमारे भीतर के राग का रूपक है, तो उसे पृथ्वी पर सुरक्षित रखना हमारा उत्तर आधुनिक कर्तव्य। वन समाप्त हो रहे हैं, प्रतिवर्ष लाखों कारें कचरा बनती जा रही हैं, समशीतोष्ण व उष्ण जलवायु के जंगल नष्ट हो रहे हैं, औद्योगिक धुएं व एसिड से मनुष्य व वसंत पर खतरा है।
चिड़ियां गायब हो रही हैं। रैचेल कार्सन ने साइलेंट स्प्रिंग (खामोश वसंत) में लिखा है कि इस चराचर में कोई चिड़िया नहीं गा रही है। आदमी व उसके खाने की आदतों के संबंध में कीटाणु नाशकों ने आतंक की स्थिति पैदा कर दी है। मनुष्य का आवेग, संकोच, संवेदनशीलता, दृश्यमयी भाषा वसंत को बाहर व अपने भीतर बचाए रखेगी। वसंत का अर्थ हैः अपने संपूर्ण अस्तित्व का सृजनात्मक राग। इस अनगढ़ आदिम ऊष्मामय राग को गाते हुए हम विलक्षण सौंदर्य का अनुभव कर सकते हैं। कामू ने एक बार कहा था, मैं प्रेम करता हूं, इसलिए बगावत करता हूं।
वसंत ऋतु हमारी आत्मा की उदासीनता को धोकर मस्ती भरी भाषा का अविष्कार करती है। वह कल्पनाशीलता, पुनर्नवीकरण, प्रेम, सम्मोहन का जादू रचती है। उसमें एक लालित्य है। वसंत ऋतु में पत्र-पुष्प, खान-पान, गीत-संगीत, वस्त्र-विन्यासः सब में एक नई ज्यामिति होती है। होली के गीत प्रारंभ हो जाते हैं। होली के गीतों में मादकता, ऐंद्रिकता, मस्ती, उल्लास किसानों के जीवन के विविध प्रसंग आदि आते हैं। इन गीतों में संबंधों की अनेक वर्जनाएं टूट जाती हैं।
वसंत युवता का प्रतीक है। एक दूसरे के प्रति सघन अनुभूति प्रदर्शित करने की ऋतु का नाम वसंत है। आज जब कि कला की दुनिया उद्योग और धन में बदलती जा रही है, तो वसंत में मौन की भाषा और रंग के रस की तलाश है। प्रसन्न धरती और उसकी अनेक भव्यताओं के लिए हमारी उत्कट चाहत व तीव्र लालसा वसंत है।
उत्तर आधुनिक, औद्योगिक, महानगरीय समय को देखते हुए वसंत ऋतु हमसे प्रश्न करती है। वह जानना चाहती है कि मनुष्य से मनुष्य, मनुष्य से समाज का एलिएनेशन (विलगीकरण) कहां तक जाएगा? आकाश, तारे, वृक्ष, धरती के गीत, नदी के सहस्रशीर्ष स्नान से हमारे संबंध अजनबी की तरह होंगे?
क्या हमारी नई विचार प्रणाली ने कुंभ के स्नान को मात्र पारंपरिक व अतार्किक रूप में निरूपित करना शुरू कर दिया है? अपने दोष न ढकें, पर अपनी पृथ्वी व विचार के सौंदर्यशास्त्र को प्रगाढ़ता से रखें। वसंत ऋतु भारतीय धरती को फिर अपने द्वारा रचित स्वयं की दृष्टि से देखने की मांग करती है।