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बढ़ती उम्मीदों का ब्रिक्स
चिंतामणि महापात्र
Updated Sun, 16 Oct 2016 05:29 PM IST
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ब्रिक्स
ब्रिक्स के विचार की परिकल्पना वर्ष 2001 में की गई थी, जो 2006 में ब्रिक के रूप में सामने आई और 2010 में जब इस समूह में दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ, तो यह ब्रिक्स बन गया। अभी-अभी ब्रिक्स का आठवां शिखर सम्मेलन गोवा में संपन्न हुआ है। विकसित एवं विकासशील देशों के नेता अगर गौर से ब्रिक्स के विकास पर नजर रख रहे हैं, तो इसका सीधा-सा कारण है कि इस अनौपचारिक संगठन का कोई सचिवालय या कार्यालय नहीं है, इसके बावजूद वैश्विक आबादी का लगभग आधा, वैश्विक जीडीपी के एक चौथाई हिस्से और तीन परमाणु हथियार संपन्न देश, दुनिया की दो सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, एक उभरती हुई महाशक्ति, एक उभरती हुई नई वैश्विक ताकत और पुरानी महाशक्ति के पुनरुत्थान का यह गवाह है।
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औद्योगिक देशों को थोड़ी-सी आशंका है कि ब्रिक्स के सदस्य देशों द्वारा नए विकास बैंक की स्थापना और ब्रिक्स देशों के मतबूत प्रतिनिधित्व एवं नेतृत्व द्वारा एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड डेवलपमेंट बैंक की स्थापना से विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की भूमिका को संभवतः चुनौती मिल सकती है, जिनमें पारंपरिक रूप से पश्चिमी औद्योगिक देशों का वर्चस्व रहा है। दूसरी ओर, दुनिया के असंख्य विकासशील देश ब्रिक्स और इसके नए वित्तीय संस्थानों को अपने बुनियादी ढांचों और अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए वित्तीय सहयोग के एक वैकल्पिक स्रोत के रूप में देख रहे हैं और उन्हें उन शर्तों की भी चिंता नहीं है, जो विश्व बैंक या आईएमएफ की सहायता के साथ अनिवार्य रूप से सामने आती है।
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लेकिन गोवा शिखर सम्मेलन का नतीजा जहां पश्चिमी उन्नत देशों को संभवतः खुश करने वाला है, वहीं विकासशील देशों के लिए थोड़ा निराशाजनक है। गोवा सम्मेलन का आयोजन ध्रुवीकरण की उस पृष्ठभूमि में हुआ है, जिसमें एक तरफ अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी हैं, तो दूसरी तरफ रूस एवं चीन हैं। अमेरिका और उसके सहयोगियों को इस तथ्य से खुशी हो सकती है कि रूस एवं ब्राजील की अर्थव्यवस्थाओं को भारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, दक्षिण अफ्रीकी अर्थव्यवस्था गति नहीं पकड़ पाई है, चीन की विकास दर सुस्त है और बेशक भारत की अर्थव्यवस्था चमकीली है, लेकिन उसकी अपनी मुश्किलें भी हैं।
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इसके अलावा कई पश्चिमी देशों में इस बात को लेकर भी चिंता उभर रही है कि ब्रिक्स का उभार मौजूदा एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था की जगह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था कायम करने को लेकर है, जिसमें ब्रिक्स एक मजबूत ध्रुव बनता दिख रहा है।परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत के प्रवेश का चीन द्वारा विरोध करने और संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों का समर्थन करने से भारत की बेचैनी काफी बढ़ गई है। दूसरी तरफ चीन भारत द्वारा अमेरिका से रक्षा सौदे करने और दक्षिण चीन सागर पर नई दिल्ली के नजरिये को लेकर परेशान है। इसके अलावा पाकिस्तान के प्रति रूस के नए रुख से भारत भी चिंतित है।
इस सम्मेलन में विकासशील देशों ने ब्रिक्स के प्रति बहुत कम उत्साह दिखाया, क्योंकि न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) और एआईआईबी पर बातें तो बहुत हुईं, लेकिन उस दिशा में काम बहुत कम हुआ है। इन बैंकों के संचालन प्रक्रिया के तरीके और मानक भी अब तक निर्धारित नहीं हुए हैं। अभी हाल ही में एनडीबी और एआईआईबी के बीच वैश्विक वित्तीय एवं मौद्रिक मुद्दों से निपटने के लिए सहमति बनी है, जिससे इन दोनों संस्थानों की विश्वसनीयता पर संदेह होता है कि ये विश्व बैंक और आईएमएफ का विकल्प बनेंगे।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि ब्रिक्स के सदस्य देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हैं और रहेंगे, लेकिन यह केवल सैद्धांतिक रूप से होगा। इस बात की संभावना ज्यादा है कि सभी ब्रिक्स सदस्य अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर अपनी नीति बनाएंगे। उदाहरण के लिए, चीन ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों और आतंकी संगठनों पर अंकुश लगाने से भारत के प्रयासों को समर्थन नहीं दिया।
बेशक भारत और रूस के बीच पर्याप्त रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, लेकिन ऐसे समय में, जब भारत ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ युद्ध छेड़ा हुआ है, मास्को द्वारा पाकिस्तान कार्ड खेलने से उपजी भारत की चिंता का समाधान नहीं किया गया है। हालांकि आतंकवादियों से रूस को भी समस्याएं हैं, लेकिन पाकिस्तान के साथ आतंकवाद- विरोधी सैन्य अभ्यास तथा पाकिस्तान को सैन्य सामग्री बेचने का प्रस्ताव के पीछे उसके अपने हितों का संरक्षण है।
तो क्या इसका मतलब यह है कि वैश्विक मामलों में ब्रिक्स का प्रयोग सिर्फ एक अल्पकालिक घटना के तौर पर होगा? निश्चित रूप से नहीं। ब्रिक्स बचा रहेगा और सहयोग की दिशा में अपनी गति से आगे बढ़ेगा। लेकिन यह कभी न तो पश्चिम या अमेरिका विरोधी बनेगा और न ही विश्व बैंक तथा आईएमएफ का विकल्प बनेगा। यहां तक कि यह महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक संयुक्त आवाज और आपसी सहयोग बढ़ाने वाले राष्ट्रों का एक महत्वपूर्ण समूह के रूप में भी नहीं विकसित हो रहा।
ब्रिक्स देशों के बीच आपस में बहुत कम व्यापार होता है। परस्पर निवेश भी कोई खास नहीं है। जब तक आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में परस्पर सहयोग नहीं होगा, महाद्वीपों में फैले राष्ट्रों के व्यावहारिक समूह के रूप में ब्रिक्स को बनाए रखना मुश्किल होगा। शांति और संघर्ष जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के जरिये इन्हें एक समूह के रूप में बांधे रखना संभव नहीं होगा। आर्थिक क्षमता, प्राकतिक संसाधन और यहां तक कि सैन्य क्षमता में भी सदस्य देशों के बीच असमानता का उपयोग जिम्मेदारी बांटने और सहयोग बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। सिर्फ एक ही उम्मीद ब्रिक्स से की जा सकती है कि यह क्षेत्रीय शक्तियों का एक विश्वसनीय संगठन बन सकता है, जो वैश्विक मामलों में रचनात्मक भूमिका निभा सकता है।