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महिलाओं को हक मिले तो बात बने

Mon, 17 Aug 2020 08:29 AM IST
संजीव कुमार झा क्षमा शर्मा
क्षमा शर्मा Published by: संजीव कुमार झा Updated Mon, 17 Aug 2020 08:29 AM IST
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rights of women in india,Supreme court verdict on Hindu women inheritance rights
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया, जिसमें कहा गया कि लड़कियां जन्म से ही पैतृक संपत्ति में बराबर की हकदार होंगी। दरअसल नौ सितंबर, 2005 को शीर्ष अदालत ने अपने एक फैसले में कहा था कि यदि लड़कियों के पिता की मृत्यु इस तिथि से पहले हो गई हो, तो वे पैतृक संपत्ति में हकदार नहीं होंगी। फिर एक फैसले में उसने कहा कि नहीं, लड़कियों को ये अधिकार मिलने चाहिए। बाद में एक अन्य मुकदमे के सिलसिले में दिसंबर, 2018 में इसे तीन न्यायाधीशों की बड़ी बेंच को भेजा गया। अब सर्वोच्च न्यायालय ने पहले के फैसलों को रद्द करते हुए कहा कि लड़कियों को पैतृक संपत्ति में हर हाल में हक मिलना चाहिए। यानी कि पैतृक संपत्ति में यह अधिकार स्त्रियों को 1956 से ही मिलेगा। सर्वोच्च न्यायालय के ही वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन स्त्री विषयों के विशेषज्ञ हैं।


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उनका कहना है कि इस फैसले को लागू करना इतना आसान भी नहीं है। मसलन, वर्ष 1956 से अब तक केंद्र सरकार ने ही लाखों किलोमीटर जमीन विभिन्न योजनाओं के तहत अधिग्रहीत की होगी। उन जमीनों का मुआवजा लेने वालों ने न केवल रकम खर्च की होगी, बल्कि हो सकता है कि वे दुनिया में ही न हों। फिर उन जमीनों पर न जाने कितने मकान, कितनी इमारतें बनी होंगी। उनके मालिक भी बदलते रहे होंगे। हो सकता है कि एक मुकदमे के लिए सौ लोगों को पार्टी बनाना पड़े। किस-किस की रजिस्ट्री कैंसिल की जाएगी? ऐसे मुकदमों को लड़ने के लिए एक क्या, कई उम्र कम पड़ जाएगी।

सिर्फ शब्दों से तो जायदाद मिलती नहीं। हो सकता है कि फिर से इस पर विचार करना पड़े। फिर जो बहनें अपने भाइयों से संपत्ति में अधिकार मांगेंगी और न मिले, तो मुकदमा करेंगी, तो क्या उनसे भाइयों के संबंध वही रहेंगे? अक्सर जमीन-जायदाद के मामले में भाई-भाई के दुश्मन होते देखे गए हैं।

कई लोग यह भी कह रहे हैं कि पैतृक संपत्ति में अगर लड़कियों को बराबर का हिस्सा मिलेगा, तो माता-पिता किसके हिस्से में आएंगे? उनकी देखभाल कौन करेगा? या कई मामलों में लड़कों की तरह लड़कियां भी उनकी संपत्ति पर काबिज होकर उन्हें घर से निकाल देंगी। ऐसे मामले इन दिनों बेतहाशा बढ़ गए हैं। बढ़ते वृद्धाश्रम और घर से निकाले जाते बुजुर्ग इसके गवाह भी हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह टिप्पणी भी की है कि बेटियां हमेशा बेटियां रहती हैं, जबकि बेटे बहुओं के आने तक ही बेटे रहते हैं।

लेकिन जो लड़की किसी की बहू बनती है, वह किसी की बेटी ही होती है। तो ऐसा क्यों है कि बहू बनते ही लड़की बदल जाती है? बहुत से मामलों में लड़के अगर अपने माता-पिता की देखभाल करना भी चाहें, तो उन पर घर टूटने का खतरा मंडराता रहता है। यही नहीं, कई मामलों में बहुओं पर ससुराल वाले यह दबाव भी डालते हैं कि दहेज तो लाओ ही, संपत्ति का हिस्सा भी लाकर दो।

यह अधिकार कहीं ससुराल वालों का नया हथियार तो नहीं बन जाएगा? ऐसे में यदि लड़कियां अपने अधिकार के लिए मायके वालों पर मुकदमा करेंगी, तो मायके वाले उनका साथ नहीं देंगे और ससुराल वालों का तंग करना भी कम नहीं होगा, वैसे में, वे लड़कियां क्या करेंगी? बड़ी बात यह है कि लड़कियां मायके से दुश्मनी मोल लेना भी नहीं चाहतीं। उन्हें लगता है कि कल अगर कोई विपत्ति आई, तो वे किसके पास मदद मांगने जाएंगी? इसीलिए वे अपनी संपत्ति के अधिकार मांगती भी नहीं हैं। ऐसा कोई सर्वे होना चाहिए, जिससे पता चल सके कि 1956 से अब तक कितनी लड़कियों को जायदाद में हिस्सा मिला।

समाज के ताने-बाने में जो चीजें पिरोई हुई हैं, वे आसानी से नहीं बदलतीं। कानून अधिकार तो देता है, पर उसे मानना लोगों का काम होता है। यदि कानून से दुनिया बदलती होती, तो 498 ए जैसे कठोर कानून के बाद दहेज खत्म हो गया होता। लोग इसी को ढाल बनाकर कहते हैं कि लड़कियों का जो हिस्सा था, वह तो हम दहेज के रूप में पहले ही दे चुके, अब संपत्ति में भी अधिकार दें, तो हमारे लड़के कहां जाएंगे? इसके अलावा देश के अल्पसंख्यक और आदिवासी समुदायअपने रिवाजों से चलते हैं। वहां क्या बदलेगा?

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