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मुद्दा: निकोबार में सही पहल, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के दबदबे को और बढ़ाएगा सामरिक केंद्र
Sat, 23 May 2026 09:00 AM IST
Pavan
शिवदान सिंह
शिवदान सिंह
Published by: Pavan
Updated Sat, 23 May 2026 09:00 AM IST
सार
हिंद महासागर में चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के मद्देनजर कार-निकोबार में स्थापित सामरिक केंद्र हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के दबदबे को और बढ़ाएगा।
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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट
- फोटो : IANS
विस्तार
भारत की उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर जिस प्रकार हिमालय प्रहरी है, उसी प्रकार दक्षिणी हिंद महासागर के बंगाल की खाड़ी में अंडमान-कार निकोबार द्वीप समूह स्थित है। भारत की मुख्य भूमि से 1,200-1,400 किलोमीटर दूर 36 द्वीपों के इस समूह में से 30 पर आबादी है। यह द्वीप समूह दक्षिण चीन महासागर और हिंद महासागर के मुहाने पर स्थित है। कार-निकोबार मलक्का जलडमरूमध्य से केवल 160 किलोमीटर दूरी पर है, इसलिए मलक्का से गुजरने वाले सारे जहाजों पर यहां से नजर रखी जाती है। इस तरह कार-निकोबार द्वीप का भी सामरिक महत्व होर्मुज जलडमरूमध्य के समान ही है।
इसी महत्व को देखते हुए भारत सरकार ने अंडमान और कार-निकोबार द्वीप समूह को समुद्री सुरक्षा और भारत व्यापार के लिए आने जाने वाले जहाजों के लिए विकसित करने की खातिर 10 अरब डॉलर का महत्वाकांक्षी ग्रेट-निकोबार प्रोजेक्ट 2001 में शुरू किया था। इसे हिंद व प्रशांत महासागर क्षेत्र में गेमचेंजर के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि मलक्का के आसपास स्थित देशों का आयात-निर्यात इसी रास्ते से होता है। खासकर, चीन का 80 फीसदी तेल व गैस आयात अरब देशों से होर्मुज होते हुए मलक्का से ही गुजरता है। इस समय भारत के मालवाहक जहाजों को सिंगापुर और कोलंबो इत्यादि में कार्गो ट्रांसमिटमेंट करनी पड़ती है, पर निकोबार में सारी सुविधाएं विकसित होने के बाद भारतीय जहाजों को विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। सामरिक दृष्टि से निकोबार में एक मजबूत सैनिक ठिकाना एक अच्छा कदम है।
इससे भारत इस क्षेत्र से गुजरने वाले समुद्री यातायात की पूरी निगरानी और अपने मालवाहक जहाजों की सुरक्षा कर सकता है। चीन पूरे हिंद महासागर में अपना नियंत्रण स्थापित करना चाह रहा है। भारत ने भी अपने समुद्री यातायात को सुरक्षित करने के लिए नेकलेस ऑफ डायमंड नाम की नीति के तहत इंडोनेशिया के सबंग और सिंगापुर में झांकी बंदरगाहों में अपने ठिकाने स्थापित कर लिए हैं। हिंद महासागर में चीन की गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर सैनिक शक्ति का प्रयोग करने के लिए अंडमान निकोबार द्वीप समूह में पर्याप्त सैन्य व्यवस्था नहीं थी। इसलिए, अंडमान-निकोबार द्वीपों की सामरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए यहां पर एक अक्तूबर, 2001 को सैनिक कमांड की स्थापना की गई। इस कमांड में तीनों सेनाओं की टुकड़ियां और कोस्ट गार्ड शामिल हैं। इसे थिएटर कमांड के नाम से जाना जाता है। इससे दुश्मन की चुनौती से निपटने के लिए एक कमांडर के नियंत्रण में हर प्रकार की सैन्य सहायता तुरंत उपलब्ध होती है।
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निकोबार के सामरिक महत्व के कारण यहां एक अग्रिम निगरानी केंद्र की भी स्थापना की गई है, ताकि समुद्र की ऊपरी सतह के साथ सतह के नीचे की भी निगरानी की जा सके। चीनी आक्रामकता को जवाब देने के लिए जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और भारत ने मिलकर क्वाड नामक संगठन बनाया है। अंडमान-निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के नजदीक होने के कारण यह इस संगठन के लिए एक महत्वपूर्ण सामरिक स्थल बन गया है। ग्रेट निकोबार द्वीप के विकास से हिंद महासागर में भारत का दबदबा बढ़ रहा है।
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इसी महत्व को देखते हुए भारत सरकार ने अंडमान और कार-निकोबार द्वीप समूह को समुद्री सुरक्षा और भारत व्यापार के लिए आने जाने वाले जहाजों के लिए विकसित करने की खातिर 10 अरब डॉलर का महत्वाकांक्षी ग्रेट-निकोबार प्रोजेक्ट 2001 में शुरू किया था। इसे हिंद व प्रशांत महासागर क्षेत्र में गेमचेंजर के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि मलक्का के आसपास स्थित देशों का आयात-निर्यात इसी रास्ते से होता है। खासकर, चीन का 80 फीसदी तेल व गैस आयात अरब देशों से होर्मुज होते हुए मलक्का से ही गुजरता है। इस समय भारत के मालवाहक जहाजों को सिंगापुर और कोलंबो इत्यादि में कार्गो ट्रांसमिटमेंट करनी पड़ती है, पर निकोबार में सारी सुविधाएं विकसित होने के बाद भारतीय जहाजों को विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। सामरिक दृष्टि से निकोबार में एक मजबूत सैनिक ठिकाना एक अच्छा कदम है।
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इससे भारत इस क्षेत्र से गुजरने वाले समुद्री यातायात की पूरी निगरानी और अपने मालवाहक जहाजों की सुरक्षा कर सकता है। चीन पूरे हिंद महासागर में अपना नियंत्रण स्थापित करना चाह रहा है। भारत ने भी अपने समुद्री यातायात को सुरक्षित करने के लिए नेकलेस ऑफ डायमंड नाम की नीति के तहत इंडोनेशिया के सबंग और सिंगापुर में झांकी बंदरगाहों में अपने ठिकाने स्थापित कर लिए हैं। हिंद महासागर में चीन की गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर सैनिक शक्ति का प्रयोग करने के लिए अंडमान निकोबार द्वीप समूह में पर्याप्त सैन्य व्यवस्था नहीं थी। इसलिए, अंडमान-निकोबार द्वीपों की सामरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए यहां पर एक अक्तूबर, 2001 को सैनिक कमांड की स्थापना की गई। इस कमांड में तीनों सेनाओं की टुकड़ियां और कोस्ट गार्ड शामिल हैं। इसे थिएटर कमांड के नाम से जाना जाता है। इससे दुश्मन की चुनौती से निपटने के लिए एक कमांडर के नियंत्रण में हर प्रकार की सैन्य सहायता तुरंत उपलब्ध होती है।
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निकोबार के सामरिक महत्व के कारण यहां एक अग्रिम निगरानी केंद्र की भी स्थापना की गई है, ताकि समुद्र की ऊपरी सतह के साथ सतह के नीचे की भी निगरानी की जा सके। चीनी आक्रामकता को जवाब देने के लिए जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और भारत ने मिलकर क्वाड नामक संगठन बनाया है। अंडमान-निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के नजदीक होने के कारण यह इस संगठन के लिए एक महत्वपूर्ण सामरिक स्थल बन गया है। ग्रेट निकोबार द्वीप के विकास से हिंद महासागर में भारत का दबदबा बढ़ रहा है।