क्रांतिकारी कर सुधार
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वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) राष्ट्र, जनता, व्यवसायियों और उद्योग जगत के लिए इस सदी का सबसे क्रांतिकारी कर सुधार है। इससे हमारे देश की कर विकृतियां खत्म होंगी और पूरे देश में वस्तुओं एवं सेवाओं पर एक दर लागू होगी। यूरो क्षेत्र के विस्तार के साथ यह दुनिया एकीकृत बाजार ढांचे की दिशा में यूरो ट्रांस एटलांटिक संधि, नाफ्टा, साफ्टा जैसे मुक्त व्यापार समझौते की साक्षी है। जब दुनिया भर के बाजार अत्यधिक प्रतिस्पर्धी होते जा रहे हैं, तब हमारी सरकार अगर घरेलू स्तर पर एक प्रतिस्पर्धी ढांचा उपलब्ध नहीं कराएगी, तो इससे अर्थव्यवस्था के विकास में बाधा पैदा होगी।
मौजूदा अप्रत्यक्ष करों के ढांचे के तहत कर की दर तीन से 55 फीसदी तक है। जीएसटी दर ढांचे के तहत न्यूनतम दर पांच फीसदी, 12 और 18 फीसदी की दो मानक दरें तथा 28 फीसदी की उच्चतम दर रखे जाने की घोषणा हुई है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल 50 फीसदी वस्तुओं को कर के दायरे से बाहर रखा जाएगा। जीएसटी का सबसे अच्छा पहलू यह है कि खाद्यान्न एवं सार्वजनिक जरूरत की वस्तुओं एवं सेवाओं, मसलन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा पर कोई कर नहीं लगाया गया है। बुनियादी जरूरतों और बड़े पैमाने पर उपभोग की जाने वाली वस्तुओं पर शुरुआती पांच फीसदी कर लगेगा। लग्जरी कारों, तंबाकू और अन्य दोषपूर्ण वस्तुओं के उपभोग को हतोत्साहित करने के लिए इन पर उच्चतम कर लगाने के साथ ही उपकर भी लगाया जाएगा। इसके अलावा राष्ट्रीय आपदा शमन कोष के वित्तपोषण के लिए एक उपकर लगाए जाने का प्रस्ताव है।
सरकार द्वारा करों की चार श्रेणी बनाने का प्रयास स्वागत योग्य है। कुछ लोगों ने दो श्रेणियां बनाने का सुझाव दिया था, जो भारत में आय एवं संपत्ति की असमानता, जीवन स्तर की क्षेत्रीय विषमता और तेजी से उभरते मध्य वर्ग को देखते हुए उचित नहीं था। उच्चतम कर दर अगर प्रस्तावित 28 फीसदी के बजाय 25 फीसदी होता, तो शायद सबसे अच्छा होता। मेरी राय में पांच श्रेणी-पांच फीसदी, 10 फीसदी, 15 फीसदी, 20 फीसदी और 25 फीसदी में करों की दर निर्धारित की जाती, तो विभिन्न श्रेणियों के बीच का फासला तो कम होता ही, कर चोरी की आशंका भी कम होती। एक से डेढ़ करोड़ रुपये के टर्नओवर वाले छोटे व्यापारियों से एक साझा प्रक्रिया के तहत कर वसूली का काम संंबंधित राज्यों के ऊपर छोड़ा जा सकता है।
जीएसटी लागू होने से तटस्थ राजस्व की संभावना है और इससे विनिर्माण क्षेत्र को ज्यादा उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और देश के लोगों के लिए रोजगार की व्यापक संभावनाएं पैदा होंगी, क्योंकि कर सुधार लागू होने पर मूल कर उद्भव कर प्रणाली से गंतव्य कर प्रणाली में बदल जाएगा। इससे केंद्र सरकार की मेक इन इंडिया नीति को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
यदि उद्योग जगत कम कर का लाभ उपभोक्ताओं को देना चाहे, तो इससे हाउसिंग, उपभोक्ता वस्तुओं, जैसे, पंखे, लाइट्स,पानी, पेंट्स, सीमेंट, ब्रांडेड कपड़े, बिस्कुट आदि संभवतः सस्ते हो जाएंगे। हालांकि जेवर, टैक्सी सेवा, टेलीफोन बिल शायद महंगे हो जाएं। उम्मीद है कि इसका अनुपालन ज्यादा प्रभावी होगा और कर चोरी तथा कर बचाव घटेगा। साथ ही व्यवसाय और उद्योग जगत का उत्पीड़न भी काफी हद तक कम होगा। जीएसटी लागू होने के बाद कुछ राज्यों की आशंकाओं के बावजूद समय के साथ केंद्र का राजस्व तो बढ़ेगा ही, जीएसटी के बंटवारे से राज्यों की आय भी बढ़ेगी।
हालांकि मौजूदा बदलावों के लिए जीएसटी को नौकरशाही और ई-गवर्नेंस सुधारों के साथ लागू करने के लिए मजबूत बुनियादी ढांचे की जरूरत है। राज्यों के जितने राजस्व का नुकसान होगा, उसकी भरपाई केंद्र द्वारा जीएटी काउंसिल के सुझावों के आधार पर किया जाएगा। उद्योग जगत, जिसने इस बदलाव का स्वागत किया, कर सुधारों को अमल में लाने, खासकर सेज इकाइयों के रिफंड (वापसी) प्रक्रियाओं तथा अपने उत्पादों के विशेष वर्ग में वर्गीकरण को लेकर चिंतित है, जिसके आधार पर कर निर्धारण होगा। लेकिन हाल ही में वित्त मंत्री द्वारा राज्य एवं केंद्र, दोनों स्तरों पर कर निर्धारण करने के लिए एक आकलन अधिकारी का पद सृजित किए जाने तथा करों के भुगतान के लिए ऑनलाइन व्यवस्था करने की घोषणाओं को देखते हुए संभावना है कि कर आकलन अधिकारी के हाथों करदाता का कम उत्पीड़न होगा।
जीएसटी का यह ढांचा बहुत ही सरल है, जो केंद्र को मजबूत बनाएगा और देश को एक एकीकृत व्यापार क्षेत्र व्यापार क्षेत्र बनाने के साथ कर ढांचे के अनुपालन के पर्याप्त अवसर देगा, विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र को प्रोत्साहन देगा तथा आम लोगों के ऊपर से कर का बोझ घटाने वाला होगा। राज्यों की सीमाओं पर ट्रकों की लंबी कतार खत्म हो जाएगी और भ्रष्टाचार भी खत्म हो जाएगा। जीएसटी काउंसिल को राजस्व वसूली और जीएसटी लूट की साझेदारी के बावजूद बजटीय जरूरतों को पूरा करने तथा कर नीति के विभिन्न सिद्धांतों, जैसे समानता, सामाजिक न्याय, अनुपालन आदि के लिए विभिन्न योजनाओं को लागू करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। अभी हमारे देश में प्रत्यक्ष या परोक्ष कर का ढांचा कर नीति के सिद्धांतों से दूर है। विभिन्न कर चुकाने के बाद लोगों के हाथों में बहुत कम पैसे बचते हैं। लोगों पर अधिकतम कर का भार उनकी आय से 40 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए और युद्ध या किसी आपदा जैसी स्थिति में भी यह 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। राष्ट्रीय औसत बचत दर और करों के बोझ को देखते हुए पता चलता है कि लोग क्यों कर चोरी या कर बचाने के लिए प्रेरित होते हैं और जो लोग ईमानदारी से कर चुकाते हैं, उनके जीवन का स्तर बहुत निम्न है। उम्मीद करनी चाहिए कि समय के साथ जीएसटी से इन विकृतियों को दूर करने में मदद मिलेगी।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंस में प्रोफेसर