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विस्मृत सिन्धु के पुनरोदय के बारे में पढ़िए तरुण विजय के विचार

Mon, 20 Jul 2020 11:06 AM IST
tarun veejay तरुण विजय
Updated Mon, 20 Jul 2020 11:06 AM IST
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Revived indus valley civilization : Identification of a civilization and nationality
indus valley civilization - फोटो : social media

वह नदी जिसने एक देश को नाम दिया, जिसकी पहचान से एक भूमि, एक जन, एक सभ्यता और राष्ट्रीयता की पहचान बनी, उसे वही देश प्राय: भूल ही गया। पर लद्दाख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस नदी का पूजन कर स्मृतियां जगा दीं। शायद सिन्धु ने पूछा भी हो, ‘आने में इतना विलंब क्यों किया, पुत्र’?


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विश्व की महानतम नदी है सिंधु, 1800 मील (2600 कि.मी.) लंबी। आदि ग्रंथ ऋग्वेद में है इसका उल्लेख। आर्यजन और आर्य सभ्यता के उदय और विस्तार की प्रथम साक्षी है यह। तिब्बत में मानसरोवर के पास 16,000 फीट की ऊंचाई को सिंचित करते हुए लद्दाख में 15,000 फीट के स्तर पर आती है, जहां उससे प्रथम सहनदी जंस्कार का मिलन होता है। 150 मील आगे श्योक नदी को साथ मिलाकर वर्तमान पाकिस्तान के कोहिस्तान पर्वतों का सीना चीरते हुए बढ़ती है काराकोरम शृंखला तक।



सिंधु का उद्गम स्थान यद्यपि मानसरोवर झील को ही माना जाता है। परंतु वस्तुत:वह मानसरोवर जल क्षेत्र में कैलास पर्वत के उत्तर में है। हिन्दू तथा तिब्बत के अनेक बौद्ध ग्रंथों में सिंधु को सिंह-मुखी नदी के रूप में जाना जाता है। उस स्रोत को 'सेंगे खबब' जो सिंह- मुखी का ही एक तिब्बती भाषातंर है, कहा जाता रहा।

सिंधु के बारे में भी बहुत प्रयास किया कि भारत में लिखे ग्रंथ मिले परंतु वैदिक कोश, डॉ सम्पूर्णानंद लिखित ग्रंथ व कुछ अन्य प्राचीन संदर्भों और ऋग्वेद में लिखे सूक्तों के अतिरिक्त कुछ यदि मिला, तो वह पाकिस्तान के प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान द्वारा लिखित ‘सिंधु यात्रा’ पुस्तक और 1975 में ब्रिटिश लेखिका ज्यां मैक एलिस्टर फेयरले की पुस्तक ‘द लायन रिवर- द इण्डस में मिला।

कैलास पर्वत के उत्तर में 16 हजार फीट की ऊंचाई से मानो शिव चरणों को धोती हुई वह 200 मील उत्तर- पश्चिम के पठारों और पर्वतों के बीच से गुजरती है। जम्मू-कश्मीर के भाग लद्दाख में यह 15 हजार फीट की ऊंचाई पर प्रविष्ट होती है। लेह से 11 मील आगे उसमें जंस्कार नदी का मिलन होता है। इस बीच, अनके छोटे-छोटे हिमनद और नदी- नाले सिंधु में मिलते जाते हैं।

हिमनदों, पठारों और पर्वतों के बीच सिंधु का प्रवाह दैवीय ऊर्जा का ही एक प्रतिरूप प्रतीत होता है। हुंजा और गिलगित की रक्त जमा देने वाली बर्फानी पहाड़ियों के बीच से गुजरती हुई सिंधु को मील-मील लंबे हिमनद रोकने का प्रयास करते हैं।

कुछ जलप्रवाह रोकते हैं और पूरे क्षेत्र में अनंत जलराशि का एक नीला दर्पण बन जाता है, मानो देवलोक का एक खंड छिटककर जस-का-तस धरती की मखमली गोद में आ टिका हो। पर सिंधु भला कम जिद्दी है, जो तिब्बत के पठारों से निकल कर वज्र समान पर्वतों का सीना चीरती हुई गिलगित तक आ गई हो, उसे कौन सा हिमनद रोक सका?

विडंबना यह है कि हजारों वर्षों का इतिहास समेटे हुए बह रही इस सिंधु के विषय में बहुत कम भारतीयों को जानकारी रही। पाञ्चजन्य के संपादक के नाते सिन्धु दर्शन नामकरण व आयोजना का जो अवसर मिला वह नवीन जन्म लेने जैसा ही लगता है।

10 अक्तूबर 1997 को दुर्गा नवमी के दिन लद्दाख में लेह के पास से होकर बह रही सिंधु के तट पर जब एक ऐतिहासिक सिंधु-दर्शन कार्यक्रम का आयोजन हुआ, तो देश के सामान्य जन को यह जानकारी मिली कि सिंधु भारत के एक हिस्से से भी होकर गुजरती है और संपूर्णत: विदेशियों के नियंत्रण में नहीं है। सात, जून 2000 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की उपस्थिति ने इस संपूर्ण आयोजन को एक नई ऊंचाई और गरिमा प्रदान की।                                                                                          

अटल जी के सिन्धु तट पर ये शब्द थे, 'जब से भारत स्वाधीन हुआ है, हम राष्ट्रगान में पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा गाते रहे हैं। कभी कोई पूछता था कि आप गा तो रहे हैं, पर सिन्ध है कहां? तो हमारे पास तत्काल यह उत्तर नहीं होता था कि सिन्धु लेह में है। हम कहते थे सिन्धु चली गई है, आगे देखेगें क्या होता है?

लेकिन सिन्धु लद्दाख में बह रही है, लेह में बह रही है अतीत की सारी स्मृतियों को साकार कर रही है। उतार-चढ़ाव की पूरी गाथा हमारी आंखों के सामने खोल रही है। यह वास्तव में बड़े सौभाग्य की बात है।आज सिन्धु के जल का स्पर्श कर मैं सचमुच गद्गद् हो गया हूं। तरूण जी ने एक नए तीर्थ का आरम्भ कर दिया।'

प्रधानमंत्री मोदी ने सिन्धु पूजन कर भारत की उन सीमाओं का स्मरण करवाया जो वीर सावरकर ने अपने इस सूक्त में पुर्नव्याख्यायित की थींः
आ सिन्धु सिन्धु पर्यन्ता, यस्य भारत भूमिका।
पितृभू, पुण्यमू भूश्चैव, सा वै हिन्दू रीति स्मृता।
सिन्धु यानी भारत। सिन्धु यानी हिन्दू, सिन्ध से बना इण्डस ग्रीक शब्द जिससे बना इंडिया और इंडियन। सिन्धु यानी हमारी सिन्धु सरस्वती सभ्यता की पहचान, हमारे पूर्वजों का पराक्रम, सैन्यबलों का शौर्य, जनता का धैर्य। (लेखक भाजपा के पूर्व सांसद हैं।)

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