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सबसे पुरानी पार्टी की मजबूरी

Wed, 21 May 2014 07:28 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Wed, 21 May 2014 07:28 PM IST
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Restraints of the old party

यह तो कोई उम्मीद नहीं कर रहा था कि देश की सबसे पुरानी पार्टी लोकसभा चुनाव में मिली शर्मनाक पराजय के महज दो दिन के भीतर कोई कार्ययोजना लेकर सामने आए। इस हार ने पार्टी को लगभग एक क्षेत्रीय पार्टी की स्थिति में ला दिया है। जैसा कि सबको मालूम है पार्टी लोकसभा की मात्र 44 सीटें जीतने में कामयाब रही, जो अन्नाद्रमुक से मात्र सात सीट और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से नौ सीट ज्यादा है या अकेले उत्तर प्रदेश में भाजपा ने जितनी सीटें जीती हैं, उसके आधे से थोड़ा अधिक है। दस राज्यों में तो उसका एक भी सांसद नहीं है और पांच अन्य राज्यों में प्रत्येक में दो-दो सांसद हैं। कर्नाटक, केरल, असम और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों को छोड़कर देश के ज्यादातर हिस्सों में उसकी भूमिका नगण्य है।

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इस तरह के परिणाम से पार्टी का दंग रह जाना स्वाभाविक है। इसे स्वीकार करने और आगे के लिए योजना बनाने में समय लगेगा। कांग्रेस घिसी-पिटी लाइन के बजाय ऐसी प्रतिक्रिया के साथ उपस्थित हो सकती थी, जो महज औपचारिकता न हो। मगर कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्लूसी) की बैठक में सोनिया और राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की और वहां उपस्थित नेताओं ने उनकी मान-मनौव्वल शुरू कर दी। जबकि पूरे देश को कांग्रेस कार्यसमिति की ओर से ठोस प्रतिक्रिया का इंतजार था। इनमें देश भर में फैले कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ ही वे लोग भी शामिल थे, जिन्होंने कांग्रेस को वोट दिया था। दरअसल देश चाहता है कि जिस तरह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा अपने वायदों को पूरा करे, ठीक उसी तरह कांग्रेस से भी लोगों की अपेक्षा है कि वह एक मजबूत विपक्ष की भूमिका के लिए उठ खड़ी हो।
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निश्चित रूप से बैठक में मौजूद लोगों को गलतियों और सुधार के बारे में स्वतंत्र और स्पष्ट रूप से अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति देकर एक शुरुआत की जा सकती थी। यह शुरुआत ही अपने आप में एक उपचार होता। लेकिन वहां तो विचारों के अनौपचारिक और ईमानदार आदान-प्रदान के लिहाज से बैठने की व्यवस्था भी नहीं थी। अतीत में कांग्रेस नेता नीचे जमीन पर गद्दों पर बैठते थे और एक दूसरे से मुखातिब होते थे।
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इसके बावजूद मौजूदा हालात में गांधी परिवार के बिना कांग्रेस की स्थिति और भी खराब हो जाएगी। इतिहास बताता है कि कांग्रेस के नेताओं ने एक-दूसरे के मुकाबले गांधी परिवार के नेतृत्व को ही स्वीकार किया है। कांग्रेस के लिए गांधी परिवार की उतनी ही अहमियत है, जितनी भाजपा के लिए संघ परिवार की। लेकिन यदि पार्टी का पहला परिवार पार्टी का वोट पाने की क्षमता खो देता है, तो कांग्रेसी इस जहाज को छोड़कर कहीं और शरण लेने लगेंगे। कांग्रेस में ऐसी उथल-पुथल हमें आने वाले महीनों में हरियाणा, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में देखने को मिल सकती है, जहां चुनाव होने वाले हैं।

जाहिर है, महंगाई पर नियंत्रण करने और भ्रष्टाचार की रोकथाम में विफलता के कारण लोगों में यूपीए सरकार के प्रति गुस्सा था। इसने यूपीए की विश्वसनीयता घटाई और एक बार जब साख चली गई, तो कांग्रेस ने जिसे अपनी उपलब्धि बताया, लोगों ने उस पर जरा भी भरोसा नहीं किया।

लेकिन अन्य तमाम चीजों से ज्यादा आज कांग्रेस के सामने जो सबसे बड़ा संकट है, वह अनिवार्य रूप से नेतृत्व का है। डॉ मनमोहन सिंह का ढीलापन और लंबा मौन, सोनिया गांधी की अस्वस्थता और सभी चीजों को कुछ खास लोगों की मंडली के ऊपर छोड़ देना तथा अंत समय तक, जब खेल शुरू हो गया था, राहुल गांधी की जिम्मेदारी लेने के प्रति अनिच्छा ने एक ऐसा शून्य पैदा किया कि नरेंद्र मोदी को अपनी पैठ बनाने का मौका मिल गया। मोदी ने ठीक ही कहा था कि यह मतदान सिर्फ मौजूदा सरकार के खिलाफ नहीं था। यूपीए-दो के शासन की अनिश्चितता के चलते लोग एक निर्णायक नेता चाहते थे और उन्होंने उपलब्ध नेताओं में से एक को चुना और उसे स्वतंत्र रूप से शासन करने के लिए बहुमत से जिताया।

पुराने नेता राहुल की नेतृत्व-क्षमता के प्रति गहरा असंतोष जता रहे हैं। आलोचक जब राहुल तक पार्टी नेताओं की पहुंच के अभाव, पार्टी के साथ उनकी अनियमित संलग्नता या 700 करोड़ रुपये के देंत्सु प्रचार अभियान की विफलता की बात करते हैं, तो उसमें दम नजर आता है।

सच है कि कांग्रेस ने अतीत में कई झटके खाए हैं। 1977 में जब उत्तर भारत में पार्टी का सफाया हो गया था (तब भी उसके पास 154 सीट थी), उस समय इंदिरा गांधी जैसी नेता थीं, जिन्होंने तीन वर्ष बाद पार्टी को जीत दिलाई थी। 1998 में जब कांग्रेस तेजी से खत्म हो रही थी, तब सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और पार्टी को एकजुट रखा। आज गांधी परिवार में उस तरह की क्षमता नहीं दिखती है। यह कांग्रेस के लिए सामान्य वक्त नहीं है।


अगर सुधार के उपाय नहीं किए गए, जिसमें से एक राज्य के नेताओं को संरक्षण देने के बजाय उचित सम्मान एवं स्वायत्तता देना शामिल है, तो इस बात का जोखिम है कि आज नहीं, तो कल पार्टी टूट जाएगी। इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि आने वाले समय में कुछ कांग्रेसी और अतीत में पार्टी छोड़कर गए (जैसे तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, राकांपा के शरद पवार, वाईएसआर के जगन मोहन रेड्डी) कुछ पूर्व कांग्रेसी मिलकर एक अलग समूह बना लें और गांधी परिवार के लोगों को अलग-थलग कर कांग्रेस पर कब्जा जमा लें। यही वजह है कि ऐसी मांग जोर पकड़ती जा रही है कि प्रियंका गांधी पार्टी का नेतृत्व करे।

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