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अंबेडकर की याद और दलितों की मुश्किलें

Thu, 07 Apr 2016 07:42 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 07 Apr 2016 07:42 PM IST
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Remembring Ambedkar and trouble of Dalits
सुभाषिनी अली

आगामी 14 अप्रैल को बाबा साहब अंबेडकर की 125वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी। देश की गरीब जनता इस जयंती को बड़े ही उल्लास के साथ मनाएगी। वह जानती है कि भारत के इतिहास में पहली बार समानता के सिद्धांत को न्यायिक रूप बाबा साहब के अथक प्रयास के बाद ही संविधान में दिया गया था। यह समानता अब भी उनकी पहुंच से बहुत दूर है, लेकिन बाबा साहब ने उसको प्राप्त करने की उम्मीद उनके अंदर पैदा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 14 अप्रैल को बाबा साहब के जन्मस्थान महू उन्हें श्रद्धांजलि देने जाएंगे। पिछले दिनों उन्होंने नोएडा में 'स्टैंडअप इंडिया' का आगाज महिलाओं और दलितों का विकास सुनिश्चित करने के लिए किया और उनके बीच 5,000 ई-रिक्शे बांटे। जाते-जाते उन्होंने कहा कि ई-रिक्शा चालक परिवारों के साथ वह जल्दी ही 'चाय पर चर्चा' करेंगे।

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इंतजार तो इस बात का था कि दलितों के खिलाफ होने वाले अत्याचार की घटनाओं का वह विरोध करेंगे और पीड़ित व्यक्तियों और उनके परिवारों को न्याय दिलवाने के लिए आवश्यक कदम उठाएंगे। लेकिन इन मामलों पर ट्वीट करने की फुर्सत भी उन्हें नहीं मिली। रोहित वेमुला की आत्महत्या के घाव अभी भरे नहीं। दलितों पर अत्याचार की घटनाएं देश के हर कोने में हो रही हैं। पिछले पखवाड़े ही ऐसी दो घटनाएं घटीं।
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डेल्टा मेघवाल गरीब दलित परिवार की एक प्रतिभाशाली सोलह वर्षीय छात्रा थी, जो टीचर ट्रेनिंग हासिल करने के लिए राजस्थान के बाड़मेर से बीकानेर के कॉलेज में आई थी। कुछ साल पहले मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उसे इनाम भी दिया था। डेल्टा ने सपने देखे होंगे कि वह एक अच्छी शिक्षिका बनकर गरीब मां-बाप को बेहतर जिंदगी गुजारने का मौका उपलब्ध कराएगी।
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होली की छुट्टी थी। चार अन्य लड़कियां के साथ डेल्टा हॉस्टल में ही रही। 27 मार्च को उससे एक पुरुष शिक्षक का कमरा साफ करने को कहा गया। दूसरे दिन उसकी लाश कॉलेज परिसर में एक कुएं में मिली। उस लाश को पुलिस कचरा उठाने वाली गाड़ी में पोस्टमार्टम के लिए ले गई। कॉलेज की ओर से कोई रिपोर्ट या कार्रवाई नहीं हुई। इसके विरोध में पूरे देश में धरना-प्रदर्शन के बाद ही प्रशासन हरकत में आया, पर न्याय की लंबी लड़ाई की शुरुआत भी नहीं हुई है।


डेल्टा की मौत के ही दिन तमिलनाडु की कौशल्या को डॉक्टरों ने खतरे से बाहर घोषित किया। अपनी बीसवीं वर्षगांठ से एक दिन पहले वह अपने पति के साथ अपने लिए तोहफा खरीदने गई थी। दोनों खुश थे। अपने सपनों के साकार होने का विश्वास उनके अंदर प्रबल होने लगा था। कौशल्या ने दलित सहपाठी शंकर से शादी की थी। परिवार के विरोध से बचने के लिए दोनों छिपकर रह रहे थे। कौशल्या ने पढ़ाई छोड़कर नौकरी कर ली थी। अब शंकर की पढ़ाई खत्म हो गई थी और उसकी भी अच्छी नौकरी लगने वाली थी। कौशल्या अपनी छूट चुकी पढ़ाई फिर से शुरू करने वाली थी। अचानक भरे बाजार में, दिन-दहाड़े कौशल्या के पिता और रिश्तेदारों ने दोनों पर हंसिये से वार किया। शंकर वहीं मर गया। लहूलुहान कौशल्या को अस्पताल लाया गया। उसकी जान तो बच गई, पर उसके सपने बिखर गए। सरकार और प्रशासन, दोनों मौन हैं। बस, जीवन बीमा निगम के कर्मचारियों की लाल झंडे वाली यूनियन है, जिसने कौशल्या को वचन दिया है कि उसकी पढ़ाई का जिम्मा वह लेगा। रोहित, डेल्टा, कौशल्या-पता नहीं, कितने लोगों के सपने चकनाचूर होते जा रहे हैं। इसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है।

‌-माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य

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