राम मंदिर की याद
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लंबे समय बाद विगत शुक्रवार को मेरे इनबॉक्स में विश्व हिंदू परिषद के संरक्षक अशोक सिंघल का मेल आया। उनकी चिट्ठी में दिवाली से एक दिन पहले इलाहाबाद में पत्रकारों से हुए उनके संवाद का ब्योरा था। अशोक सिंघल की उस पत्रकार वार्ता को मीडिया में प्रमुखता मिली। उस संवाददाता सम्मेलन में सिंघल ने याद दिलाया कि सितंबर, 2000 में संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दी सम्मेलन में शामिल होने न्यूयॉर्क गए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सौ से अधिक भारतीय संतों के एक प्रतिनिधिमंडल को यह आश्वासन दिया था कि अगर भाजपा संसद में अपने बूते बहुमत हासिल करती है, तो वे राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर बनाने का अपना वायदा पूरा करेंगे। अशोक सिंघल ने आगे कहा, आज रामभक्तों ने जब भाजपा को बहुमत दिया है, तब मोदी सरकार को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए पहल करनी चाहिए।
लोकसभा चुनाव में भाजपा के शानदार प्रदर्शन के बाद भी अशोक सिंघल ने एक बयान जारी किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अपने हिंदू होने पर गर्व करने वाली धर्मनिरपेक्ष ताकतों को पूर्ण बहुमत मिला है। तब उन्होंने उस धर्मनिरपेक्ष मॉडल को खास तौर पर रेखांकित किया था, जिसने आर्थिक समृद्धि के साथ आध्यात्मिक उन्नति का समन्वय बिठाया है और जो इस विकास का विस्तार पर्यावरण और पारिस्थितिकी तक करने का इच्छुक है। उनका तर्क यह भी था कि यह धर्मनिरपेक्षता उस दूसरी विकृत धर्मनिरपेक्षता से भिन्न है, जिसमें हिंदुत्व के लिए गर्व का भाव नहीं है, और वह न सिर्फ अल्पसंख्यक ग्रंथि, पराजित मनोभाव, पलायनवाद और आत्मपीड़ा से आक्रांत है, बल्कि जेहादी ताकतों की तुष्टिकरण करके खुद की धर्मनिरपेक्ष पहचान बनाता है।
अशोक सिंघल के इन दो बयानों में दो गौर करने वाले बिंदु हैं, क्योंकि सिंघल सामान्य आदमी नहीं, संघ परिवार के सम्मानित व्यक्ति हैं। वह बेशक अपनी कठोर छवि के लिए जाने जाते हों, लेकिन वह कभी सीमा का अतिक्रमण नहीं करते और न ही उनकी छवि उनके अपने ही संगठन के प्रवीण तोगड़िया जैसी अगंभीर है। सिंघल के विचार मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप कदम उठाने का आह्वान करने वाले होते हैं, इसलिए उनके विचार पर गौर फरमाना जरूरी है।
भाजपा की जीत के बाद विगत मई में जब उन्होंने पहला बयान जारी किया था, तब उन्होंने यह बताया था कि 2014 के नतीजे ने सामाजिक बहस के प्राथमिक स्वरूप को बदल दिया है। जिस बदलाव की ओर सिंघल इशारा कर रहे थे, वह धर्मनिरपेक्षता बनाम छद्म धर्मनिरपेक्षता की बहस तक सीमित नहीं था। राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर विचार-विमर्श भी इस प्रश्न तक सीमित नहीं था कि भारतीय राष्ट्रवाद को क्षेत्रीय आधार पर परिभाषित करना चाहिए या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आधार पर।
इसके बजाय सत्ता से जुड़े कई नेताओं के फैसलों ने इस ओर इशारा किया कि कैसे विश्व के बारे में भारतीयों की सोच में फर्क आया है। सत्ता में आने के तत्काल बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के मुखिया के तौर पर एक ऐसे इतिहासकार को नियुक्त किया, जिनके विचार इतिहास के बारे में विवादास्पद रहे हैं। आईसीएचआर के नए मुखिया वाई एस राव जाति प्रथा और मुस्लिम शासन के कारण देश पर पड़े नकारात्मक असर पर अपने विचार दर्ज करने के लिए स्वतंत्र हैं, पर जब वह तर्क देते हैं कि इतिहास ऐसा विषय नहीं है, जिसे हमेशा वैज्ञानिक ढंग से स्थापित किया जाए, तो सवाल उठेंगे ही। वह अनौपचारिक ढंग से यह दावा करते आए हैं कि इतिहास की खोज में विश्वास और आस्था का भी खासा महत्व है।
यह ठीक वैसा ही तर्क है, जैसा राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान दिया जाता था, कि अयोध्या का राम की जन्मभूमि होना हमारी आस्था का मामला है, इसलिए इसे अदालत में वैज्ञानिक तरीके से साबित करने की आवश्यकता नहीं है। धीरे-धीरे हमारी समाज वैज्ञानिक सोच में एक बदलाव आ रहा है और तमाम पुरानी व्यवस्थाओं को ध्वस्त करने की बात की जा रही है। सुब्रह्मण्यम स्वामी हालांकि फिलहाल भाजपा में किसी आधिकारिक पद पर नहीं हैं, लेकिन पार्टी का बचाव करने में या किसी विरोधी पर हमला बोलते हुए वह संघ परिवार के प्रहरी की तरह दिखते हैं। हाल ही में उन्होंने कहा कि नेहरूवादियों और वाम वैचारिकों द्वारा लिखे गए इतिहास को कूड़े में फेंक देना चाहिए। इस तरह की सोच सभी समाज वैज्ञानिकों को एक ही तरह देखती है। नए निजाम में समाज विज्ञान को वैज्ञानिक ढंग से नहीं देखा जा रहा, इसका ताजा उदाहरण दिल्ली विश्वविद्यालय का संस्कृत विभाग है, जहां एक ताजा शोध परियोजना में यह साबित किया गया है कि आर्यों का बाहर से आना एक मिथक है। यह सच हो सकता है, लेकिन फिलहाल अगर ऐसी ही परियोजनाओं को महत्व देना है, तो भी यह साबित करने का काम इतिहास विभाग का है।
बेशक बीती सदी के आठवें और नवें दशक में अयोध्या आंदोलन का जैसा आकर्षण था, वह आज संभव नहीं है। पर अशोक सिंघल ने इसकी याद दिलाकर न सिर्फ मुद्दे को जीवित कर दिया है, बल्कि वह ट्रंप कार्ड की तरह इसका उपयोग भी कर सकते हैं।
इस समय इस मुद्दे पर यथास्थिति बहाल है, और प्रशासन वहां किसी तरह के निर्माण कार्य की अनुमति नहीं दे सकता। लेकिन जब भाजपा का संसद में बहुमत है, और अयोध्या मुद्दे पर समूचा कानूनी विवाद कई तरह की व्याख्याओं के लिए खुला हुआ है, तो ऐसे में, यह संभावना भी है कि केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय से अयोध्या में यथास्थिति बहाल करने के अपने पुराने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकती है। सिंघल ने तो राम जन्मभूमि मुद्दे को जीवित करने का संदेश देकर गेंद नरेंद्र मोदी के पाले में डाल दी है। अब यह देखना है कि प्रधानमंत्री इस मामले में क्या करते हैं।
(वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक)