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अफ्रीका के साथ रिश्ते: लीक से हटकर और कल्पनाशील पहल के विपरीत
Mon, 09 Sep 2019 02:01 AM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत
सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत
Published by: सुरेंद्र कुमार
Updated Mon, 09 Sep 2019 02:01 AM IST
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सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत
- फोटो : a
विदेश नीति के क्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीक से हटकर और कल्पनाशील पहल (2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क नेताओं को बुलाने और नवाज शरीफ के जन्मदिन पर अचानक लाहौर पहुंचने) के विपरीत, जिसके नतीजे मिले-जुले रहे, उनकी सोची-समझी और अफ्रीका तक पहुंच बनाने पर केंद्रित नीति उस महाद्वीप के साथ भारत के संबंधों को बेहतर बना रही है। एक दशक पहले तक अधिकांश अफ्रीकी राजधानियों और अफ्रीकी नेताओं से भारत ने परहेज रखा। भारतीय राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दशकों तक अफ्रीकी देशों के दौरे पर नहीं गए। अफ्रीकी नेताओं को भी भारत आने के निमंत्रण बहुत कम भेजे गए। लेकिन अब ऐसा बिल्कुल नहीं है!
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प्रधानमंत्री मोदी ने मोजाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया, केन्या, युगांडा और रवांडा की यात्रा करके खुद मिसाल पेश की है। उनके प्रधानमंत्री काल में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने घाना, नामीबिया की यात्रा की, तो पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने ट्यूनीशिया और मोरक्को का दौरा किया। मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद स्वाजीलैंड, भूमध्यरेखीय गिनी, जिबूती और इथियोपिया, मॉरीशस और मेडागास्कर, बेनिन, गिनी कॉनक्री और गाम्बिया की यात्रा कर चुके हैं। 23 मई, 2017 को गांधीनगर में आयोजित 52वें अफ्रीकी विकास बैंक की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा था कि जब से वह प्रधानमंत्री बने हैं, उन्होंने अपनी विदेश और आर्थिक नीति में अफ्रीका को शीर्ष प्राथमिकता में रखा है। प्रधानमंत्री से प्रेरणा लेते हुए उनके कैबिनेट सहयोगियों ने भी अफ्रीका की यात्रा की है। कोई भी ऐसा अफ्रीकी देश नहीं बचा होगा, जिसका पिछले पांच वर्षों में भारतीय मंत्रियों ने दौरा न किया हो। विदेश मंत्रालय में सचिव टी एस तिरुमूर्ति के अनुसार, अफ्रीका के साथ हमारे राजनीतिक जुड़ाव में अभूतपूर्व तीव्रता आई है। भारत की ओर से अफ्रीका में राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री स्तर के 29 दौरे हुए हैं, तो पिछले पांच वर्षों में विभिन्न आयोजनों के तहत अफ्रीका के 35 से अधिक नेताओं की हमने मेजबानी की है। इसके अलावा 41 प्रमुखों/ शासनाध्यक्षों ने भी अक्तूबर, 2015 में तृतीय अफ्रीका-भारत फोरम शिखर सम्मेलन में भाग लिया था।
भारत पहले ही अफ्रीका में 18 अतिरिक्त मिशनों में से छह रेजिडेंट मिशन खोल चुका है। पांच साल पहले कोई सोच तक नहीं सकता था कि भारत बर्किना फासो, कैमरून, चाड, कांगो गणराज्य, जिबूती, भूमध्यरेखीय गिनी, लाइबेरिया सोमालिया, रवांडा आदि देशों में अपने रेजिडेंट मिशन खोलेगा। फिलहाल अफ्रीका में भारत के 29 रेजिडेंट मिशन हैं, जिनके 2021 तक 47 हो जाने की उम्मीद है। नए मिशन खोलने के लिए देशों के चयन की वजहें हैं। कुछ भारतीय उत्पादों के लिए बाजार की पेशकश करते हैं, जबकि अन्य निवेश के लिए आकर्षक लगते हैं। कुछ के पास समृद्ध खनिज (यूरेनियम सहित) और ऊर्जा संसाधन हैं, जबकि अन्य का क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक परिदृश्य बदलने से रणनीतिक महत्व बढ़ गया है। कुछ नए मिशन हमारे समुद्री हितों की रक्षा करेंगे और अफ्रीका के पश्चिमी तट से चलने वाले व्यापारी जहाजों पर समुद्री डाकू के हमलों से निपटेंगे। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य बनने की भारत की महत्वाकांक्षा को साकार करने के लिए भी अफ्रीका का समर्थन महत्वपूर्ण है।
वर्ष 2017-18 में अफ्रीका के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार अनुमानतः 62.18 अरब डॉलर का था, जिसमें पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 21.50 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी। भारत अफ्रीका का तीसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य और चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत जहां 18 फीसदी कच्चे तेल का आयात अफ्रीका से करता है, वहीं अफ्रीका लगभग 20 फीसदी दवा का भारत से आयात करता है। निजी क्षेत्र की कई प्रमुख कंपनियों की अफ्रीका में महत्वपूर्ण उपस्थिति है। कृषि, फार्मास्यूटिकल्स, ऊर्जा, ऑटोमोबाइल, आईटी सेवा, कंप्यूटर विज्ञान, हाइड्रोकार्बन-उन क्षेत्रों में से हैं, जिनमें भारतीय निवेश के लिए काफी संभावनाएं हैं।
कम विकसित देशों के लिए भारत की शुल्क मुक्त वरीयता योजना से 38 अफ्रीकी देशों को लाभ मिलता है। भारत ने हाल के वर्षों में 12 अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन की पेशकश की है। भारत की तकनीकी सहायता और आईटेक छात्रवृत्ति का उद्देश्य अफ्रीका में क्षमता निर्माण है, जिसकी वहां व्यापक सराहना हुई है। जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, 'अफ्रीका के साथ भारत की साझेदारी सहयोग के एक मॉडल पर आधारित है, जो अफ्रीकी देशों की जरूरतों के लिए उत्तरदायी है। यह मांग से प्रेरित और बिना शर्त है। अफ्रीका की प्राथमिकता हमारी प्राथमिकता है।' भारत अफ्रीकी देशों की डिजिटल खाई को पाटने में भी मदद कर रहा है और उसने पूरे अफ्रीका में ई-नेटवर्क परियोजना का दूसरा चरण शुरू किया है-ई विद्याभारती एवं ई आरोग्य भारती नेटवर्क परियोजना, जिसका उद्देश्य 4,000 छात्रों को पांच वर्ष तक मुफ्त टेली-शिक्षा और 1,000 डॉक्टरों/ नर्सों/ पैरामेडिकल स्टाफों को निःशुल्क चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सा परामर्श प्रदान करना है। जिन 48 देशों ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के फ्रेमवर्क पर हस्ताक्षर किए हैं, उनमें से 25 देश अफ्रीका के हैं। भारत ने स्थानीय सरकारों के परामर्श से 13 अफ्रीकी देशों में 23 सौर ऊर्जा परियोजनाओं की घोषणा की है।
जुलाई, 2018 में युगांडा की संसद को संबोधित करते हुए अफ्रीका के साथ जुड़ाव दर्शाने के लिए नरेंद्र मोदी के 10 नियम अब भी अफ्रीका के साथ परस्पर लाभप्रद साझेदारी के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बने हुए हैं। इस दौरान हमारे मंत्रियों की मानसिकता में बदलाव आया है, लेकिन अफसोस कि अब भी भारतीय विदेश सेवा के अनेक अधिकारियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है। पिछले सत्तर वर्षों में हमारे आधे दर्जन विदेश सचिवों ने भी अफ्रीका में अपनी सेवाएं नहीं दी हैं, और यही अफ्रीका के बारे में हमारी अब तक की उदासीनता बताने के लिए काफी है। पर उम्मीद है कि अफ्रीका के प्रति प्रधानमंत्री मोदी का उत्साह उन्हें भी प्रेरित करेगा।