मंदिरों के पाकिस्तान में
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भारत में यह एक आम जिज्ञासा है कि पाकिस्तान में अब कितने मंदिर बचे हैं, वहां पूजा-अर्चना संभव भी है या नहीं। पाकिस्तान अल्पसंख्यकों के प्रति बहुत सहिष्णु नहीं है, तिस पर बाबरी विध्वंस के बाद वहां मंदिर लगातार निशाना बने हैं। विभाजन के समय पाकिस्तान में मंदिरों की संख्या करीब तीन सौ थी। अब उनकी संख्या दो अंकों में सिमट चुकी है-इस किताब में ही बीस से अधिक मंदिरों का जिक्र नहीं है। इसके बावजूद रीमा अब्बासी की करीब तीन सौ पेज की यह किताब, जिसमें मदीहा ऐजाज की शानदार फोटोग्राफी का भी उतना ही योगदान है, एक सुखद आश्चर्य की तरह हमारे सामने है।
यह किताब पाकिस्तान के जिन चर्चित मंदिरों के बारे में बताती है, उनमें पहला बलूचिस्तान स्थित हिंग्लाज माता का मंदिर है। हजारों वर्ष पुराना यह मंदिर उन विरल तीर्थों में से है, जहां मुस्लिम भी आते हैं और इसे नानी का हज कहते हैं। हिंग्लाज शक्तिपीठ है, जहां सती का सिर गिरा था। विभाजन से पहले राजपूत श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां आते थे। चर्चित बांग्ला लेखक अवधूत ने 'मरुतीर्थ हिंग्लाज' नाम से किताब लिखी थी, जिस पर बांग्ला में फिल्म भी बनी थी। अब भी हिंग्लाज में नवरात्र के दौरान भारी भीड़ उमड़ती है।
पंजाब में चकवाल स्थित कटासराज मंदिर भारतीय उपमहाद्वीप के समृद्ध इतिहास की उतनी ही दर्शनीय झांकी है, भले ही अब यह ध्वंसावशेष के रूप में है। वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत की यह रचनाभूमि बताई जाती है। पार्श्वनाथ ने यहीं समाधि ली थी और गुरु नानक का भी यहां आना-जाना था। कटासराज का महत्व सिर्फ धार्मिक नहीं है, वह हमारी सांस्कृतिक श्रेष्ठता और स्थापत्य के शिखर का भी एक नमूना है। कराची के पुराने सोल्जर बाजार स्थित पंचमुखी हनुमान मंदिर भी उतना ही प्रसिद्ध है। करीब पंद्रह सौ वर्ष पुराने इस मंदिर को दुनिया का इकलौता तीर्थ स्थान बताया जाता है, जहां हनुमान की मूर्ति प्रकृति निर्मित है।
अल-बरूनी की किताब में कटासराज के अलावा इस मंदिर का जिक्र है। बाबरी विध्वंस के बाद भी यह मंदिर अक्षत रहा है। पेशावर स्थित गुरु गोरखनाथ मंदिर या गोरखत्री का भी ऐतिहासिक महत्व है। पेशावर को दुनिया के प्राचीनतम शहरों में गिना जाता है। ह्वेन सांग ने इस मंदिर का जिक्र किया है, पर उस समय यहां बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा थी। इस मंदिर से मुगल-सिख और ब्रिटिश परंपरा जुड़ी रही है। तालिबान ने कुछ महीने पहले इस पर हमला किया था। पुस्तक में सक्खर स्थित साधुवेला मंदिर का भी जिक्र है, जिसे कुंभ के समानांतर तीर्थ बनाने की योजना थी।
उमेरकोट का शिव मंदिर, सिंध में मनोरा स्थित वरुणदेव मंदिर, पेशावर का वाल्मीकि मंदिर और नागरपारकर के पास वीरवाह में गोरी का भव्य जैन मंदिर भी ध्यान खींचते हैं। पाकिस्तान के ज्यादातर मंदिरों में दिवंगत पुजारियों की समाधियां हैं और यहां मुस्लिम भी आते हैं। कई मंदिर अपने समृद्ध इतिहास के साथ आज भी खड़े हैं, जैसे-पेशावर सैन्य छावनी के पास का वाल्मीकि मंदिर, जो नेहरू कैबिनेट के पुनर्वास मंत्री मेहरचंद खन्ना की मिल्कियत थी और जहां 1946 में महात्मा गांधी आए थे, या वहां के भव्यतम मंदिरों में से एक स्वामीनारायण मंदिर, जिसके दर्शन के लिए जिन्ना आए थे। इन सबके बीच कराची स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर भी है, जहां असहिष्णुता की छाप दिखती है। जिस सिंध में सबसे ज्यादा मंदिर थे, वहां भी हिंदू धर्मस्थलों की संख्या अब कम हो रही है। इस किताब में जिस एक चर्चित मंदिर का जिक्र नहीं है, वह पाक अधिकृत कश्मीर स्थित नीलम घाटी में शारदा पीठ है। शायद लेखिका के लिए वहां जा पाना संभव न हो पाया हो।
वहां फकीरा जैसे कलाकार हैं, जो मुस्लिम होने के बावजूद आस्था के साथ हिंदू देव-देवियों की मूर्तियां बनाते हैं। खुद रीमा अब्बासी ने यह किताब लिखने के लिए फोटोग्राफर के साथ एक साल तक पाकिस्तान का दौरा किया। पाकिस्तान जैसे मुल्क में दो मुस्लिम महिलाओं के लिए यह काम बहुत आसान नहीं था। जाहिर है, इस किताब का दस्तावेजी महत्व है।