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निवेश बढ़ाने का नुस्खा, अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सकती है कार्पोरेट कर में कटौती
Wed, 25 Sep 2019 07:09 AM IST
नारायण कृष्णमूर्ति
नारायण कृष्णमूर्ति
नारायण कृष्णमूर्ति
Published by: नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Wed, 25 Sep 2019 07:09 AM IST
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बीएसई सेंसेक्स
20 सितंबर 2019 का दिन इतिहास में याद किया जाएगा, क्योंकि उस दिन भारतीय शेयर बाजारों ने अभूतपूर्व लाभ कमाया। बीएसई सेंसेक्स 5.2 फीसदी चढ़ गया और शेयर बाजारों में चारों तरफ खुशी का माहौल दिखने लगा। शेयर बाजार के व्यापारियों के लिए मानो समय से पहले दीवाली आ गई, क्योंकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घरेलू कॉरपोरेट्स के लिए प्रभावी कर की दर को कम करने की घोषणा की, जिसमें अधिभार भी शामिल है।
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अगर कॉरपोरेट्स किसी अन्य कर छूट का लाभ उठाना बंद कर देते हैं, तो वित्त मंत्री की इस घोषणा से कॉरपोरेट कर की दर घटकर 34.94 फीसदी से 25.17 फीसदी हो जाएगी। और एक अक्तूबर, 2019 के बाद स्थापित होने वाली और 31 मार्च, 2023 तक परिचालन शुरू करने वाली नई विनिर्माण कंपनियों के लिए प्रभावी कर की दर 29.1 फीसदी से घटकर 17 फीसदी रह जाएगी।
प्रभावी रूप से सरकार इस कटौती से कर राजस्व में 1.45 लाख करोड़ रुपये छोड़ने को तैयार है। इसका सभी कॉरपोरेट संस्थानों ने स्वागत किया और इसे भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की दिशा में एक कदम के रूप में देखा जा रहा है। न्यूनतम कॉरपोरेट टैक्स का उद्देश्य निजी क्षेत्र द्वारा निवेश को बढ़ावा देना है। कॉरपोरेट टैक्स में कटौती एक दीर्घकालीन उपाय है, जो मौजूदा और नए व्यवसायों के लिए निवेश और उत्पादन बढ़ाने की दृष्टि से आकर्षक होगा, जिससे अंततः रोजगार पैदा होंगे।
इस कदम के पीछे यह सोच है कि निजी क्षेत्रों के हाथों में अधिक धन देकर सरकार अर्थव्यवस्था के उत्पादन और योगदान के लिए अधिक प्रोत्साहन दे रही है। कर दर में यह कटौती सरकार द्वारा विगत जुलाई में पेश किए गए बजट के बाद उठाए गए कदमों की एक शृंखला का ही हिस्सा है, जब उसे आर्थिक मंदी के बाद आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। जून तिमाही के अंत तक आर्थिक विकास दर पिछली पांच तिमाहियों के मुकाबले घटकर पांच फीसदी पर आ गई है।
इस कटौती का तात्कालिक कारण विभिन्न कॉरपोरेट घरानों की नाराजगी हो सकती है, जो उन्होंने सरकारी नीतियों के प्रति जताई है। मसलन, कई निवेशक बजट घोषणा के तहत अपने ऊपर थोपे गए अतिरिक्त कर से डर गए और अपना पैसा निकालकर देश से बाहर ले जाने लगे। सरकार को उम्मीद है कि नई व कम कर दरें देश में अधिक निवेश को आकर्षित करेंगी और घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को पुनर्जीवित करने में मदद करेंगी, जो अभी संकट का सामना कर रही है।
पिछले कुछ वर्षों से कॉरपोरेट्स के निवेश नहीं करने का कारण यह है कि वे दोहरी बैलेंस शीट की परेशानियों का सामना कर रहे हैं। यह और कुछ नहीं, बल्कि तेजी के दौरान उधार लिए गए धन पर कंपनियों के खर्च का परिणाम है, जिन्हें मंदी के वर्षों में चुकाना उन्हें मुश्किल लगता है। प्रभावी रूप से कंपनियां कर्ज लेकर जितना कमाती हैं, उससे ज्यादा खर्च करती हैं, जिससे अंततः कर्ज चुकाने के अपने दायित्व को पूरा नहीं कर पाती हैं।
इसके चलते बैंकों के एनपीए में वृद्धि होती है। अगर आंकड़ों को देखें, तो कॉर्पोरेट इंडिया ने 2003 से 2012 तक भारी उधार लिया, इसलिए यह देखते हुए कि मंदी पांच-छह वर्षों से है, वह निवेश करने और विस्तार करने के लिए और अधिक उधार लेने के लिए तैयार नहीं है। इसी तरह बैंक उधार नहीं देना चाहते, क्योंकि वह और जोखिम नहीं उठाना चाहते।
कॉरपोरेट जगत की निवेश करने और बैकों की उधार देने के प्रति अनिच्छा के संयोजन का सीधा प्रभाव विकास पर पड़ता है, जो ठप हो गया है। यदि भारतीय कंपनियां कर्ज नहीं लेंगी और निवेश नहीं करेंगी, तो इसका मतलब है कि उन्हें भारत के आर्थिक भविष्य के प्रति भरोसा नहीं है। यह कई कारकों से उपजा है, जिसमें आर्थिक अनिश्चितता और तथाकथित जनसांख्यिकी लाभांश भी शामिल हैं। दोहरी बैलेंस शीट की समस्या सिर्फ निवेश की कमी से नहीं होती, किसी के निवेश करने के पीछे अब भावी नतीजे की अहम भूमिका होती है।
जुलाई में पेश बजट के विपरीत पिछले एक महीने से वित्त मंत्री ने कॉरपोरेट जगत में निवेश के माहौल को बढ़ावा देने के लिए कई उपायों की घोषणा की है। एनपीए की समस्या से निपटने और बैंकों में दक्षता लाने के लिए बैंकों का विलय किया गया, और इसलिए कॉरपोरेट के हाथों में अधिक पैसा रहने देने के लिए कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की गई है। कॉरपोरेट्स के हाथों में अधिक धन होने से उन्हें ज्यादा मुनाफा मिलेगा। उम्मीद है कि उनके हाथों में यह पैसा रहेगा, तो बाद में अर्थव्यवस्था में वापस आएगा।
लेकिन यह भरोसा आर्थिक पुनरुत्थान की गारंटी नहीं है, क्योंकि वास्तविकता में, यहां तक कि बड़ी भारतीय कंपनियों ने कभी भी 35 फीसदी की दर से कर भुगतान नहीं किया है, कई कंपनियों ने जटिल और उलझे हुए प्रोत्साहन का फायदा उठाकर अपनी कर देयता को 20 फीसदी तक कम कर लिया है।
उदाहरण के लिए, रिलायंस इंडस्ट्रीज, जिसने साल 2018-19 में इस टैक्स से पहले 47,367 करोड़ का मुनाफा कमाया, कर के रूप में 12,204 करोड़ रुपये का भुगतान किया यानी 25.8 फीसदी की दर से कर चुकाया और नई कर कटौती की दर से 9,400 रुपये भुगतान करके इसे 19.9 फीसदी पर ले आएगी।
जहां तक शेयर बाजार में उछाल की बात है, तो यह उन निवेशकों का भरोसा है, जो उन कंपनियों में शेयर से बहतर लाभ उठाते हैं, जिनमें उन्होंने निवेश किया है। बाजार में पूंजी प्रवाह ज्यादा नहीं होने से व्यापारी और निवेशकों का मिजाज बेअसर रहा। इसका मतलब यह है कि नई खबर क्या है, इस आधार पर बाजार में उछाल आएगा। यानी जिस दिन ऐसी घोषणाएं होती हैं, उस दिन बाजार चढ़ेगा और जिस दिन विकास के आंकड़े कम होंगे, उस दिन बाजार गिरेगा। इसलिए बाजार की चाल के आधार पर अर्थव्यवस्था की स्थिति को नहीं देखना चाहिए।
शेयर बाजार कई कारकों द्वारा संचालित होते हैं, जिसमें भविष्य की कमाई की संभावना एक बड़ा कारक है। यदि आप भारतीय शेयर बाजार में निवेश कर रहे हैं, तो आपको एहसास होगा कि पिछले तीन वर्षों में प्रत्यक्ष शेयरों में निवेश के जोखिम तेजी से बढ़ गए हैं। इसी समय, म्यूचुअल फंडों के माध्यम से शेयरों में निवेश संख्या और मूल्य, दोनों दृष्टि से बढ़ा है।