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बिना खिड़की की दीवार और बेड़ियां तोड़ने की दिशा, पढ़ें तस्लीमा नसरीन की लेखनी

Thu, 03 Sep 2020 02:07 AM IST
taslima nasreen तस्लीमा नसरीन
Updated Thu, 03 Sep 2020 02:07 AM IST
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Read The Direction Of Taslima Nasreen, Without Breaking The Walls Snd Fetters Of The Window
women equality - फोटो : pixabay

बांग्लादेश के चर्चित गायक और गीतकार फारूक महफूज अनम यानी जेम्स की पहली पत्नी रथी को मैं कभी भूल नहीं सकती। वह बहुत सुंदर महिला थीं, जिन्होंने विज्ञापन, नाटक, टेली फिल्म और फिल्मों में भी काम किया था। उन्हें शादी के बाद पति के आदेश से अभिनय छोड़ना पड़ा था।


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जेम्स ने शादी के बाद रथी से साफ कह दिया था कि नाटक और सिनेमा में काम करना नहीं चलेगा। दो संतानों के जन्म के बाद जेम्स ने रथी को तलाक दे दिया था। वर्ष 2003 में रथी को अपनी दो संतानों के साथ जेम्स के घर से बाहर निकल जाना पड़ा था। उन्होंने अपने बच्चों को खुद पाला।

हमारे बेहद लोकप्रिय स्टार जेम्स ने उन दो बच्चों के पालन-पोषण में कोई मदद नहीं की, यहां तक कि अपने धन-दौलत से भी उन्हें कुछ खर्च नहीं करना पड़ा। शादी के बाद रथी को अभिनय छोड़ना पड़ा था, लेकिन जेम्स ने गाना नहीं छोड़ा।

बल्कि बांग्लादेश से निकलकर उन्होंने बॉलीवुड के चर्चित संगीतकार प्रीतम (चक्रवर्ती) के साथ जोड़ी बनाई और गैंगस्टर, वो लम्हे और लाइफ इन मेट्रो जैसी हिंदी फिल्मों में भी गाने गाए। जेम्स ने रथी के साथ जो किया, वह कोई अजूबा नहीं है।

आज भी समाज में इस तरह की घटनाएं घटती हैं। लड़कियों की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की मुहिम में जिन शिक्षित और सजग पुरुषों को सहायक माना जाता है, वही उनके रास्तों में बड़े बाधक के रूप में सामने आते हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप में विवाह को स्त्री-पुरुष के जीवन का पवित्र गठबंधन माना जाता है। लेकिन कटु सच्चाई यह है कि इस 21 वीं सदी में यह विवाह प्रथा स्त्री-पुरुष के बीच की विषमता का त्रासद प्रतीक है। पृथ्वी के प्रत्येक प्राणी के जीवन में हर क्षण बदलाव हो रहा है।

हमारे नियम-कानूनों में निरंतर परिवर्तन हो रहा है। लेकिन विवाह के नियम-कानूनों में कोई बदलाव नहीं आया है। चाहे हिंदू घर हो या मुस्लिम, विवाह के बाद स्त्रियों को शोषण का सामना करना ही पड़ता है। अब भी लड़कियों को शादी के बाद पति के घर में जाना पड़ता है।

हिंदू स्त्रियों को मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र पहनना पड़ता है। मुस्लिम धर्म में निकाह के समय स्त्रियों को मेहर मिलती है, साथ ही, निकाह के समय उनकी सहमति की भी जरूरत पड़ती है। इसके बगैर काजी निकाह पढ़ा ही नहीं सकता। लेकिन सिद्धांततः इतनी आजादी के बाद भी ससुराल में उन्हें वैसे ही शोषण का सामना करना पड़ता है।

भारत में हाल ही में एक अदालत ने विवाह विच्छेद के एक मामले में यह फैसला दिया कि पत्नी चूंकि मांग में सिंदूर नहीं लगाती, इससे यह पता चलता है कि वह अपने पति को पति के रूप में नहीं मानतीं। हालांकि इस फैसले की बहुत चर्चा नहीं हुई, लेकिन अगर अदालत ही यह मान ले कि सिंदूर न लगाना पतिव्रत धर्म का पालन नहीं करना है, तो फिर दूसरों के बारे में क्या कहा जाए!

पुरुषसत्तात्मक सोच जब तक नहीं बदलेगी, तब तक महिलाओं को खामियाजा भुगतना पड़ेगा। यूरोप-अमेरिका में ईसाई और यहूदी समाज में पति-पत्नी, दोनों अनामिका उंगली में शादी की अंगूठी पहने रहते हैं। वही उनकी शादी की पहचान होती हैं।

लेकिन उनमें इतनी स्वतंत्रता तो है कि इच्छा होने पर एक समय बाद वे अंगूठी उतार कर रख सकते हैं। सभी धर्मों के लोगों में इतनी आजादी तो रहनी चाहिए। हालांकि मुस्लिम महिलाओं में शादी के बाद शादी की किसी पहचान की आवश्यकता नहीं पड़ती। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वे स्वतंत्र और कम शोषित हैं।             

वैवाहिक जीवन की मुश्किलों और स्त्री शोषण का एक बड़ा कारण है कि शादी के बाद हर पुरुष अपनी पत्नी को अपने माता-पिता के पास ले आता है। ऐसे में, नई दुल्हन का ज्यादा वक्त सास-ससुर और ननद-देवर आदि के साथ बीतता है।

उसे सबके कहे अनुसार चलना पड़ता है और सबका मन रखना पड़ता है, क्योंकि आज्ञा न मानने पर उसकी बदनामी होने का डर है। मैंने ऊपर जिस अदालती मामले का उल्लेख किया, वह दरअसल तलाक का एक मामला था। पति ने सिर्फ इसलिए पत्नी से तलाक मांगा था, क्योंकि उसकी शिकायत थी कि उसकी पत्नी ससुराल में नहीं रहना चाहती। उसका ठोस कारण भी था।

दरअसल ससुराल के लोगों के शोषण से तंग आकर उसने पति से अलग रहने की बात कही थी। पर पति इसके लिए तैयार नहीं था। उसके माता-पिता भी दुल्हन को ही दोषी मान रहे थे। यह एक बड़ी समस्या है। दूसरे घर, दूसरे परिवार और दूसरी परंपरा से आई लड़की को कोई समझना नहीं चाहता, स्वीकारना नहीं चाहता।

हर कोई उसे ही दोषी ठहराता है। एक सुंदर, सुशील, होशियार और संवेदनशील लड़की ससुराल में कुछ महीने गुजारने के बाद ही कुरूप, बदतमीज और मूर्ख स्त्री में तब्दील कर दी जाती है। हैरानी इस बात की है कि दांपत्य जीवन पत्नियों के लिए बंधन और घुटन के बजाय सम्मान और स्वतंत्रता का पर्याय क्यों नहीं बन सकता!   

उपरोक्त मामले में पति ने तलाक मांगा था। उसे तलाक मिल गया। तलाक में कोई बुराई नहीं है। मेरा यह मानना है कि परंपरा के नाम पर वर्षों तक बेमेल दांपत्य जीवन बिताने के बजाय तलाक लेकर अलग हो जाना कहीं अच्छा है। इससे पति और पत्नी, दोनों स्वतंत्र रूप से अपना जीवन जी सकते हैं और संभव हो, तो फिर विवाह बंधन में बंध सकते हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप में विवाहित स्त्रियों की दुर्दशा देखकर कभी-कभी ऐसा लगता है कि गुलामी को कानूनी रूप से वैध बनाने के लिए ही संभवतः विवाह प्रथा की शुरुआत की गई। हालांकि सुखद दांपत्य जीवन के उदाहरण कोई कम नहीं हैं। शिक्षित और कामकाजी महिलाएं पत्नी के तौर पर सफल हैं। लेकिन हाशिये की महिलाओं के जीवन में तो कुछ भी नहीं बदला है।

विवाह जैसी प्राचीन प्रथा को बनाए रखने के लिए इसमें बदलाव लाना जरूरी है। इस प्रथा को नारी विद्वेष के बजाय स्त्री-पुरुष समान अधिकार की बुनियाद पर खड़ा करना होगा। विवाह नौकर और मालिक का संबंध न बनाए, दोनों के मानवाधिकार का संरक्षण हो और दांपत्य जीवन प्रेम और भरोसे की बुनियाद पर खड़ा हो, इस दिशा में सोचना होगा।

वह दिन कब आएगा, जब शादी के नाम पर लड़कियां रोएंगी नहीं! वह दिन कब आएगा, जब विवाह शोषण और अत्याचार के बजाय महिलाओं को स्वतंत्रता और समानाधिकार दिलाने का अवसर होगा!

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