लोकसभा से निकलती उम्मीद की किरण
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पंद्रहवीं लोकसभा के रिकॉर्ड हंगामे के बाद मौजूदा 16वीं लोकसभा की तस्वीर चमत्कारिक ढंग से बदल रही है। बीता बजट सत्र पिछले दस वर्षों का दूसरा सबसे उत्पादक सत्र रहा है। इस बार कई मायनों में राज्यसभा के मुकाबले लोकसभा का प्रदर्शन कहीं बेहतर था। यह तब हो रहा है, जब लोकसभा में 314 सांसद पहली बार चुनकर आए हैं। इतना ही नहीं, बीते सत्र में ही पहली बार चुनकर आए 246 सांसदों ने विभिन्न चर्चाओं में भाग लेकर अपनी गंभीरता का एहसास भी करा दिया है। असल में, हाल में आयोजित प्रबोधन कार्यक्रमों ने नए सांसदों का मनोबल बढ़ाया है। दूसरी तरफ लोकसभाध्यक्ष और विभिन्न राजनीतिक दलों ने पहली बार चुनकर आए सांसदों को सदन में बोलने का भरपूर मौका भी दिया।
दरअसल 16 मई को आए चुनावी नतीजों के बाद लोकसभा की जो तस्वीर उभरी, वह कई मायनों में पिछली लोकसभाओं से अलग है। इस बार लगभग हर बड़े राज्य से बड़ी संख्या में सांसद पहली बार चुनकर दिल्ली पहुंचे हैं। राज्यवार देखें, तो उत्तर प्रदेश के 80 में से 54, जबकि तमिलनाडु के 39 में से 35 सांसद पहली बार लोकसभा आए हैं। इसके साथ ही मौजूदा कुल सांसदों में से 197 सांसदों की आयु 50 वर्ष से कम है, जबकि पहली बार चुनकर आए सांसदों में से आधे युवा हैं। शैक्षणिक स्तर से भी वर्तमान लोकसभा को परखें, तो 543 में से 419 सांसद स्नातक या इससे अधिक शिक्षित हैं, यानी करीब 77 फीसदी! जाहिर है, जागरूक होते मतदाताओं का दबाव, माननीयों की बेहतर शैक्षणिक पृष्ठभूमि और सदन के प्रति सकारात्मक उत्साह लोकसभा सत्रों के बेहतर भविष्य की उम्मीदें जगा रहा है।
दिलचस्प है कि यह तब हो रहा है, जब नियमों व परंपराओं के चलते लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद खाली है। इस पद पर कांग्रेस लगातार दावे कर रही है और अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। उल्लेखनीय है कि मान्यता प्राप्त प्रतिपक्ष का मतलब विपक्ष में बैठने वाले सभी सांसदों का प्रतिनिधित्व करना है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि ममता बनर्जी और जयललिता जैसे सांसद कांग्रेस के नेतृत्व में विरोध दर्ज करवाना पसंद करें। अतीत बताता है कि इस विशाल लोकतंत्र के पिछले 62 वर्षों के संसदीय सफर में करीब 30 वर्षों तक लोकसभा बिना मान्यता प्राप्त प्रतिपक्ष के ही संचालित हुई है! इन तीस वर्षों में कई मंत्रियों को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा है और सरकारों के खिलाफ कई बार अविश्वास प्रस्ताव लाए गए। जाहिर है, इस देश ने अक्सर मजबूत विपक्ष देखा है; भले ही मान्यता मिली हो या नहीं।
मोदी सरकार और कांग्रेस के बीच की तल्खी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष तक ही सीमित नहीं है। कांग्रेस को दूसरा बड़ा झटका लोकसभा उपाध्यक्ष को लेकर भी मिला है। परंपरानुसार यह पद विपक्ष को ही दिया जाता रहा है। लेकिन सरकार ने राजनीतिक गुणा-भाग को ध्यान में रखते हुए यह पद सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस के बजाय दूसरे सबसे बड़े विपक्षी दल अन्नाद्रमुक को दिया है। अन्नाद्रमुक के एम थंबिदुरै सर्वसम्मति से लोकसभा उपाध्यक्ष चुने गए। वैसे बीते दस वर्ष कांग्रेस विपक्ष को संसद में रचनात्मक सहयोग देने का सुझाव देती रही है। संसद की इन बदली परिस्थितियों के बीच रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने की जिम्मेदारी अब उसके कंधों पर आ गई है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि बदलती राजनीति के बीच संसद में बेहतर प्रदर्शन का दबाव आखिर विपक्षी सांसद किस रूप में लेते हैं।
(लेखक लोकसभा टीवी में एंकर हैं)