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चीन का नया खेल दुनिया के लिए कितना बड़ा खतरा, समझा रहे हैं रवींद्र दुबे

Thu, 17 Sep 2020 02:08 AM IST
ravindar dubey रवींद्र दुबे
Updated Thu, 17 Sep 2020 02:08 AM IST
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Ravindra Dubey explaining how Chinas new game is a big threat to the world
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

इन दिनों देश के खुफिया, रणनीतिक और सामरिक हलकों में एक तूफान-सा आया हुआ है। इस तूफान की वजह है एक बहुसंस्करण अंगरेजी अखबार द्वारा हाल ही में किया गया खुलासा। वह यह है कि चीन एक कंपनी के माध्यम से एक विशालकाय डाटाबेस के जरिये कई देशों के महत्वपूर्ण से लेकर आम लोगों तक की गतिविधियों पर न सिर्फ नजर रखे हुए है, बल्कि विस्तृत जानकारी भी जुटा रहा है।


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भारत में यह सूची राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेता प्रतिपक्ष से शुरू होकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों, सांसदों, पूर्व मुख्यमंत्रियों, पूर्व सांसदों, प्रधानमंत्री कार्यालय में पदस्थ नौकरशाहों, राज्यों के मुख्य सचिवों एवं आला पुलिस अधिकारियों से होती हुई आर्थिक अपराधियों और मादक पदार्थों के तस्करों तक जाती है।

ओवरसीज की इंडिविजुअल डाटाबेस (ओ.के.आई.डी.बी.) नामक यह डाटाबेस चीन की झेन्हुआ डेटा इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी कंपनी ने तैयार की है। इस कंपनी ने ओपन सोर्स संसाधनों यानी सोशल मीडिया, समाचार स्रोत, अखबार, पत्रिकाओं, पेटेंट और नीलामी के दस्तावेजों, यहां तक कि रिक्त पदों पर भर्ती के विज्ञापनों तक से जानकारियां जुटा कर इसे तैयार किया है। झेन्हुआ ने अपनी वेबसाइट पर दावा किया है कि वह चीनी इंटेलिजेंस, सेना और सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर काम करती है। डाटा खनन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के विशेषज्ञ वांग शूफेंग 86 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ इस कंपनी के मालिक हैं।

इस डाटाबेस का फोकस चीनी हितों के विशेष क्षेत्रों पर भी है, जैसे टेक्नोलॉजी और यूरेनियम जैसे प्राकृतिक संसाधन। इसके अलावा वन्य जीवन, सोने और मादक पदार्थों की तस्करी भी चीन की दिलचस्पी के विषय हैं। चीन की दक्षिणी सीमा पर म्यांमार से सटे सुनहरे त्रिभुज से इसकी निकटता चीन को हमेशा से परेशान करती रही है।

पारंपरिक रूप से चीन और भारत पौधों के जरिये दुनिया के सबसे बड़े ओपीएट और एफेड्रीन (मादक द्रव्य) उत्पादक देश हैं। हाल के वर्षों में राजस्व खुफिया निदेशालय ने सोने की तस्करी में संलिप्त कई चीनी संगठनों का पर्दाफाश किया है। चीन भारतीय वन्यजीवन उत्पादों की खपत का बहुत बड़ा बाजार है, जहां लाल चंदन, शेर-तेंदुओं के अंगों और हाथी दांत की जबर्दस्त मांग है। और तो और, इस डाटाबेस में भारत भर में अवैध शिकार तथा वन्यजीवन की तस्करी में आरोपित व्यक्तियों के अलावा मादक पदार्थ और सोने की तस्करी में की गई गिरफ्तारियों के सैंकड़ों मामलों की विस्तृत जानकारी है।

ऐसे समय में, जब चीन लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारी संख्या में अपनी फौज तैनात किए हुए है, भारत में इस खुलासे पर चिंता होना स्वाभाविक है। सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के नेतृत्व में इसका विश्लेषण किया जा रहा है। हालांकि चीन के निशाने पर अकेला भारत नहीं है, लेकिन पड़ोसी देश होने के नाते उसे इस तथ्य पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

हालांकि कई रणनीतिक विशेषज्ञ इसे कई देशों की ‘रूटीन एक्सरसाइज’ कह कर खारिज करने की कोशिश करते हैं। उनका कहना है कि डाटा खनन कोई बड़ी बात नहीं  है और तकरीबन सभी देश ऐसा करते रहते हैं। लेकिन कुछ अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि चीन जिस परिमाण में डाटा इकट्ठा कर उसकी प्रोसेसिंग कर रहा है, वह जरूर पेशानी पर बल डालने वाला है।

खुफियागिरी की भाषा में इस तरह से जानकारियां जुटाना ओसिंट (ओपन सोर्स इंटेलिजेंस) के अंतर्गत आता है। जाने-माने सुरक्षा विशेषज्ञ क्रिस्टोफर बाल्डिंग के अनुसार, युनाइटेड फ्रंट आर्गेनाइजेशन नामक चीन के खास सरकारी महकमे का पूरा अमला विदेशी संस्थानों और व्यक्ति विशेषों को प्रभावित करने के प्रति समर्पित है। वे खुफियागिरी, विदेशी मामलों और दूसरी एजेंसियों में बड़ी-बड़ी धनराशियां खर्च करते हैं, ताकि विदेशी व्यक्तियों और संस्थानों को अपनी तरफ मोड़ा जा सके। ये रकम करोड़ों, अरबों डॉलर में होती हैं। बाल्डिंग का यह भी कहना है कि चीन सायबर जासूसी के क्षेत्र में मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट सिक्योरिटी के जरिये थर्ड पार्टी ठेकेदारों का जम कर इस्तेमाल करता है।

चीन के हाथों भारत इस तरह के कई झटके खा चुका है। अभी कुछ ही अरसा पहले भारतीय नौसेना की पूर्वी कमान के मुख्यालय विशाखापट्टनम के अधिकारी तब काफी हैरान हो गए थे, जब उन्होंने पाया कि उनके संवेदनशील कंप्यूटरों में हैकरों ने घुस कर ऐसे ‘बग’ डाल दिए थे, जो गोपनीय जानकारियों को चीन भेज रहे थे! नौसेना की यह कमान दक्षिण चीन सागर में जहाजी बेड़ों की तैनाती करती है और भारत की पहली आणविक पनडुब्बी आई एन एस अरिहंत का परीक्षण इस कमान के तहत चल रहा था।

नौसेना के इन कंप्यूटरों में एक ऐसा ट्रोजन पाया गया, जो गोपनीय फाइलें और दस्तावेजों को चीनी सर्वरों पर भेज रहा था। घोस्टरेट नामक यह ट्रोजन बाद में 103 देशों के संवेदनशील संस्थानों के कंप्यूटरों में पाया गया, जिसका पता कई वर्षों बाद कनाडा के वैज्ञानिकों ने लगाया। लेकिन तब तक तो कई सूचनाएं इधर की उधर हो चुकी थीं और कई देशों की गोपनीय जानकारियां चीन के हाथ लग जाने से खासा नुकसान हो चुका था!

बहरहाल, चीन की इन गतिविधियों के मद्देनजर भारत को अनेक मोर्चों पर मुस्तैद रहने की जरूरत है। व्यक्तिगत डाटा के संरक्षण की स्वस्थ संरचना कायम करने की त्वरित आवश्यकता है। विदेशी कार्यक्षेत्रों में निजता के कानून पर जोर देना भले ही असंभव हो, कम से कम व्यक्तिगत डाटा या जानकारी के उपयोग की पूर्ण सहमति और तीसरे पक्ष को जानकारी के बहाव की जांच और निगरानी के प्रावधान उपलब्ध करवाने होंगे।

अन्यथा अपारदर्शी अधिनायकवादी व्यवस्थाओं में काम करने वाली झेन्हुआ जैसी कंपनियां जानकारी का खनन करने के लिए बिग डेटा का इस्तेमाल प्रजातांत्रिक पर्यावरण में करती रहेंगी और नियामक रडार की पकड़ से बाहर रहेंगी। खासकर तब, जब तीसरे पक्ष की डाटा शेयरिंग पर सहमति की गैर-मौजूदगी में मामले और भी मुश्किल हो जाते हों। जानकारियों के ये टुकड़े जिसके द्वारा जिस तरह से एकत्रित किए जाते हैं, समय और परिमाण के साथ वे अमूल्य होते चले जाते हैं। यही समझ इससे निपटने का मुख्य मुद्दा है।

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