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बलात्कार और हमारा समाज

Thu, 24 May 2018 06:36 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 24 May 2018 06:36 PM IST
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Rape and  society
सुभाषिनी सहगल अली
पिछले दो-तीन साल में बलात्कार की घटनाएं बहुत अधिक बढ़ने लगी हैं। हर घटना के बाद मांग उठती है कि कानून सख्त बनाया जाए और सख्ती से लागू किया जाए। इस तरह की मांग का यह असर हुआ है कि बारह साल से कम उम्र की लड़की के साथ बलात्कार करने वाले को सजा-ए-मौत सुनाई जाएगी। इसका लोगों ने स्वागत भी किया है, हालांकि इस तरह की सजा का बलात्कार की दर पर कोई असर नहीं पड़ा है। हमारे देश में बलात्कारियों के खिलाफ चलने वाले मुकदमों की स्थिति बहुत ही लचर है।

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न्याय की प्रक्रिया मामलों को सालोंसाल लटकाने वाली है। बहुत ही कम आरोपियों को सजा दी जाती है। सजा-ए-मौत का यह भी नतीजा होगा कि आरोपी पक्ष मौत से बचने के लिए अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल करेगा। तो क्या बलात्कार से निपटने का कोई रास्ता नहीं है? बिल्कुल है। सख्ती से कानून लागू करना, फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना करना, न्याय प्रक्रिया का निष्पक्ष तरीके से चलना-ये तमाम कार्यवाहियां अपराधियों को दंडित करने और पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने के लिए सफलतापूर्वक इस्तेमाल की जानी चाहिए।

लेकिन समाज की भी कुछ जिम्मेदारियां हैं और आम लोगों से ज्यादा सार्वजनिक स्थानों पर आसीन नेताओं की जिम्मेदारी है। क्या यह सच नहीं कि अक्सर अपराधी अगर ‘अपना’ हो, तो हम उन्हें बचाने में लग जाते हैं? अगर बलात्कार का आरोपी धर्मगुरु हो, तब उसे बचाने, उसके निर्दोष होने का प्रचार करने और उसके खिलाफ आरोप लगाने वालों को षड्यंत्रकारी ठहराने में क्या हम अपनी पूरी ताकत नहीं लगा देते? कुछ ईसाई धर्मगुरुओं के मामले में ऐसा देखने को मिला है।

लेकिन हमारे देश में, हमारे अपने बहुसंख्यक समाज में जो हो रहा है, हम कब तक उसे अनदेखा और अनसुना करते रहेंगे? पांच साल से आसाराम जोधपुर की जेल में है। पांच साल से वह अपने धन और प्रभाव का इस्तेमाल अपने किए से बचने के लिए कर रहा है। उसने अपने आपको नपुंसक बताया; बूढ़ा और बीमार बताया; उसने लगातार अपने आपको साजिश का शिकार बताया; उसने देश के सबसे अच्छे और कीमती वकीलों को अपना पैरोकार बनाया; तीन बार उसने सर्वोच्च न्यायालय से जमानत की अपील की; पीड़िता के पिता पर झूठे मुकदमे लगाकर उन्हें कई प्रदेशों के न्यायालयों की परिक्रमा करने पर मजबूर किया; गवाह की हत्या करवा दी।

इन पांच साल में उसके खिलाफ लड़ने वाला केवल एक छोटा-सा मध्यवर्ग का परिवार था, अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति थी, कुछ निष्ठावान और ईमानदार वकील थे और न्यायपालिका और प्रशासन से जुड़े कुछ सच्चे लोग थे। आसाराम के पक्ष में तो लाखों खड़े थे। और उन लाखों में वरिष्ठतम नेता भी थे। उसको जब जेल पहुंचाया जा रहा था, तब हजारों की भीड़ ने उसे बचाने की कोशिश की। कितने आश्चर्य की बात है कि उस लड़की के प्रति किसी ने हमदर्दी नहीं दिखाई, जो आसाराम के ही गुरुकुल में अपने मां-बाप की उनके प्रति श्रद्धा के कारण पढ़ती थी, जिसे आसाराम ने अपनी निजी कुटिया में बुलाकर हवस का शिकार बनाया था।

यह रुख दिखाकर लोगों ने क्या देश की तमाम महिलाओं और बेटियों की असुरक्षा को बढ़ाने का काम ही नहीं किया? अगर आसाराम छूट जाता, तो किसका हौसला बढ़ता-बलात्कारियों का या पीड़ितों का?

यह सवाल बहुत अहम है। जोधपुर न्यायालय का फैसला इंटरनेट पर उपलब्ध है। हर उस नागरिक को उसे पढ़ना चाहिए, जिसे इस देश की महिलाओं और बेटियों की सुरक्षा की चिंता है।
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