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बीमार समाज के अपराधी

Mon, 22 Apr 2013 06:07 PM IST
इम्तियाज अहमद
इम्तियाज अहमद Updated Mon, 22 Apr 2013 06:07 PM IST
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rape and our society

राजधानी में पांच साल की बच्ची के साथ की गई बर्बरता के बाद लोग फिर सड़कों पर हैं। कमोबेश हर समाज में औरतें निशाने पर होती हैं। लेकिन यह चौंकाने वाला सच है कि हमारा समाज जिस तेजी से बदला है, उसमें बलात्कार की घटनाओं में तेजी आई है।

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इसके अलावा मीडिया की सक्रियता के कारण भी पहले की तुलना में ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। यह स्तब्ध करने वाला है कि कई मामलों में परिवार के सदस्य ही इस घिनौने काम में लिप्त पाए गए हैं।
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कुछ मामलों में बलात्कार को अंजाम देने वाले शख्स प्रभावशाली, पैसे वाले और दबंग होते हैं, जो अपने से कमजोर को इसका शिकार बनाते हैं। कुछ मामले ऐसे हैं, जिनमें समाज का निचला तबका ऐसी घिनौनी हरकत को अंजाम देता है। ऐसे तत्व कुंठा से भरे हुए होते हैं।
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दरअसल, समय के साथ पुराने सामाजिक मूल्य खत्म होते जा रहे हैं। इसलिए ऐसे हादसों की तादाद बढ़ती जा रही है। लोगों में 'मैं आजाद हूं' की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। सिर्फ बड़े शहर नहीं, छोटे शहर और कस्बे भी अब इसकी चपेट में आ गए हैं।

निर्भया हादसे के बाद राजधानी में मध्यवर्ग के गुस्से को देखकर सरकार हिल गई थी। उसे आभास हुआ कि कुछ तो करना ही पड़ेगा। इसलिए उसने आपराधिक कानून में तब्दीली कर उसे थोड़ा कठोर बना दिया। अब भी उसमें कुछ खामियां हैं। लेकिन इस दिशा में हम कुछ कदम आगे बढ़े हैं। फिर यह भी सोचना होगा कि सब कुछ सरकार के ऊपर डाल देने से भी कुछ नहीं बदलने वाला।

मौजूदा स्थितियों में हमें समाज पर भी नजर डालने की जरूरत है। आज बलात्कार के अनेक मामले परिवार में ही सामने आ रहे हैं। कई मामलों में पिता ही बलात्कारी साबित होता है। छोटी बच्चियों, मानसिक रूप से विक्षिप्त औरतों, बुजुर्ग स्त्रियों के साथ बर्बरता की जा रही है।

राजस्थान में एक छोटी बच्ची के साथ गैंगरेप हुआ था, जिसकी हालत अब भी सामान्य नहीं हो पाई है। दिल्ली के गांधीनगर में हुई बर्बरता से पहले उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में छह साल की बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई।

उससे पहले वहीं बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज कराने आई दस साल की एक बच्ची को पुलिस हिरासत में ले लिया गया। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में एक बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, जिसे इलाज के लिए नागपुर ले जाया गया है।

दरअसल यह बीमार समाज की पहचान है। हमें इस सवाल का जवाब खोजना होगा कि यह विकृति इतनी तेजी से क्यों पनप रही है। लोगों में सामाजिक मूल्यों और मान्यताओं के प्रति न तो निष्ठा बची है और न ही भय रह गया है। कुछ समय पहले मैं गोवा के एक बार में गया। वहां एक लड़का लगातार शराब पिए जा रहा था।

पास बैठे एक बुजुर्ग ने उससे कहा कि तुम लगातार पिए जा रहे हो, तुम्हें अपनी कोई फिक्र नहीं है क्या? लड़के ने कहा, आप अपने से मतलब रखिए। पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। बड़े-बुजुर्गों के प्रति एक लिहाज का भाव था। अब यह सब खत्म हो रहा है। आजादी का यह दायरा समाज और परिवार के बीच उन मूल्यों को खत्म कर रहा है, जो स्वस्थ समाज के लिए जरूरी हैं। इसलिए बीमार समाज में बलात्कार जैसी संक्रामक बीमारी तेजी से बढ़ रही है।

ऐसे मामलों में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने निर्भया के मामले में भी माहौल बनाया, और अब गुड़िया के मामले में भी उसकी सक्रियता देखती बन रही है। इससे लोगों में सामाजिक चेतना जगी। पर मीडिया का रवैया भी तात्कालिक होता है। उसके अपने वाणिज्यिक हित हैं, टीआरपी का चक्कर है।

लाजिमी तो यही था कि निर्भया मामले में मीडिया व्यापक बहस और विश्लेषण तक जाता, समस्या पर शोध कर लोगों को बताता कि ऐसा क्यों हो रहा है। समस्या की जड़ तलाशकर उस पर प्रहार करता। पर ऐसा नहीं हुआ। किसी भी समाज में ऐसी विकृतियों के लिए सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सरकार की अपनी सीमाएं हैं।

चलती बस में हुए बलात्कार के लिए तो कानून-व्यवस्था को दोषी माना जा सकता है, लेकिन घर के अंदर परिवार के ही सदस्य ऐसी घिनौनी हरकत करें, तो इसमें सरकार क्या कर सकती है? सामाजिक आंदोलन इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हमारे ही देश में सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ बड़े सामाजिक आंदोलन हुए हैं।

भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर अन्ना हजारे ने एक निर्जीव समाज को गति देने की कोशिश की थी। हालांकि वह आंदोलन बहुत जल्दी दम तोड़ गया। उस आंदोलन के रणनीतिकार अरविंद केजरीवाल राजनीति में दस्तक दे चुके हैं।

इससे पहले भी कई छोटे-छोटे आंदोलन हुए, जो विफल रहे। दरअसल ज्यादातर आंदोलनों के पीछे निहित स्वार्थ होते हैं। इसलिए लोगों को इन पर भरोसा नहीं बन पाता। इस सिलसिले में गांधी जी के आंदोलनों को प्रतीक माना जा सकता है। उनके आंदोलनों में नैतिकता का भाव था। आज के आंदोलनों में ऐसी बात नहीं है।

सख्त कानून बनाने के बाद अब हर बलात्कारी को फांसी देने की मांग की जा रही है। लेकिन समझना चाहिए कि सिर्फ कड़े कानून बना देने से ही स्थिति बदल नहीं जाएगी। अपने यहां तो कानूनी प्रक्रिया भी बहुत लंबी है। लिहाजा कानून को सख्त बनाने के साथ-साथ उसका पालन भी जरूरी है।


दिल्ली के गांधीनगर मामले में बच्ची के घरवालों का कहना है कि पुलिस उसे दो हजार रुपये देकर चुप रहने के लिए कह रही थी। ऐसे में सख्त कानून का क्या फायदा? अब रास्ता सिर्फ यही है कि मीडिया रचनात्मक भूमिका निभाए, सरकार पुलिसवालों में संवेदना जगाने की पहल करे तथा सामाजिक संगठन सामाजिक चेतना विकसित करने और आम लोगों को दिशा दिखाने के लिए आगे आएं।

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