सामंती मानसिकता की उपज है रैगिंग
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हाल ही में ग्वालियर के प्रसिद्ध सिंधिया पब्लिक स्कूल में एक छात्र ने अपने सीनियर छात्रों की रैगिंग से परेशान होकर आत्महत्या की कोशिश की, तो मेरठ के एक इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र ने आत्महत्या कर ली। 2009 में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में अमन कचरू नामक छात्र की रैंगिग के दौरान मिली प्रताड़ना से मौत हो गई थी। उसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र एवं राज्य सरकारों को रैगिंग रोकने के लिए सख्त निर्देश दिए थे। देश के विभिन्न शिक्षण संस्थानों में सीनियर छात्रों द्वारा नए छात्रों का रैगिंग के नाम पर उत्पीड़न किया जाता है, पर ज्यादातर मामलों की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं होती। रैगिंग की वजह से कई छात्रों की मौत हो जाती है, तो कई मानसिक अवसाद के शिकार हो जाते हैं।
रैंगिंग की शुरूआत अंग्रेजों के जमाने में हुई थी। धीरे-धीरे इस प्रकार का व्यवहार तमाम शैक्षणिक संस्थानों की संस्कृति में सम्मिलित हो गया। जो छात्र एक बार रैगिंग का शिकार हुआ, वह कुंठा व बदले की भावना से सीनियर बनने पर अपने जूनियर छात्रों के साथ उसी प्रकार की रैंगिंग व प्रताड़ना भरा व्यवहार दोहरा कर अपने साथ हुई ज्यादती का बदला लेने का प्रयास करता है। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने भी बताया है कि ग्वालियर के सिंधिया स्कूल में वर्षों तक उन्हें शारीरिक व मानसिक यातनाएं दी गईं। सख्त रैंगिंग की पुष्टि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी की है, जब वह नैनीताल के शेरवुड स्कूल के छात्र थे।
आज रैगिंग की घटनाएं स्कूलों के अतिरिक्त मेडिकल, इंजीनियरिंग कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में भी होने लगी हैं। तकनीकी शिक्षा के प्रसार के उद्देश्य से राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्ति और बैंकों द्वारा दिए जा रहे कर्ज के कारण विभिन्न आय वर्ग के छात्र इन संस्थानों में प्रवेश पाते हैं। शिक्षा के निजी क्षेत्र में जाने के बाद महंगे संस्थानों में बड़े घरों के बिगड़ैल बच्चों का प्रवेश ज्यादा आसान हो गया है। इसलिए इन संस्थानों में 30 प्रतिशत योग्य छात्रों के साथ 70 प्रतिशत अयोग्य व बिगड़ैल किस्म के छात्र प्रवेश पा लेते हैं। ऐसे छात्र कैंपस में रैगिंग एवं आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते हैं।
उच्चतम न्यायालय के सख्त निर्देश के बावजूद अगर ऐसी घटनाएं रुक नहीं रही हैं, तो इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि अपनी साख बचाने के चक्कर में ज्यादातर स्कूल एवं कॉलेज पुलिस को सूचना नहीं देते, जैसा कि सिंधिया स्कूल में देखने को मिला। रैगिंग के लिए सजा का भी प्रावधान है और यूजीसी का निर्देश है कि रैंगिंग के मामलों की पुलिस में तुरंत रिपोर्ट की जाए। रैंगिंग रोकने के उद्देश्य से देश में एक हेल्पलाइन 1800-180-5522 भी चालू की गई है। इन सबके बावजूद अगर रैगिंग नहीं रुक रही है, तो हमें समझना होगा कि जरूरत मानसिकता बदलने की है। बच्चों को अच्छे संस्कार देकर उनमें बढ़ रही सामंती प्रवृत्ति को रोकने की जरूरत है। साथ ही शिक्षा को धन कमाने का जरिया बनने से भी रोकना होगा। निजी क्षेत्र के शिक्षण संस्थान यूजीसी के मानकों को धता बताकर अयोग्य छात्रों को डिग्री बांट रहे हैं। केंद्र एवं राज्य सरकारों को शिक्षा के गिरते स्तर और इसमें रैंगिंग के नाम पर होते अपराधों को रोकने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी।