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जीत का अर्थ: स्पर्धा में जीतना साहस की मिसाल, लेकिन एक मां को ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ी?

Thu, 03 Sep 2026 07:03 AM IST
अमर उजाला Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Thu, 03 Sep 2026 07:03 AM IST
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सार
महाराष्ट्र के बीड जिले में बेटी की फीस के लिए 47 वर्षीय रमाबाई का सामान्य साड़ी तथा चप्पल पहनकर दौड़ स्पर्धा में भाग लेना और उसे जीतना साहस की मिसाल जरूर है, लेकिन एक संवेदनशील व्यवस्था की असली सफलता तब होगी, जब किसी और मां को ऐसा करने की जरूरत ही न पड़े।
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बेटी की फीस के लिए मां ने लगाई दौड़ - फोटो : PTI

विस्तार

किसी मैराथन में जीत का अर्थ आमतौर पर पदक, पुरस्कार राशि और अपनी शारीरिक क्षमता का प्रदर्शन माना जाता है, लेकिन महाराष्ट्र के बीड जिले की 47 वर्षीय रमाबाई रणवीर ने जब साड़ी पहनकर नंगे पांव दौड़ते हुए स्पर्धा जीती, तो उनकी जीत का अर्थ इन सबसे कहीं बड़ा था। वह अपनी बेटी की पढ़ाई जारी रखने के लिए दौड़ रही थीं। उल्लेखनीय है कि रमाबाई के पति की एक हादसे में मौत हो चुकी है और बड़ी बेटी का दाखिला उन्होंने जिस एकेडमी में कराया है, उसी में वह खाना बनाने का काम करती हैं। छोटी बेटी अलग रहकर पढ़ाई कर रही है, जिसके लिए उन्हें पैसे भेजने होते हैं। सामान्य साड़ी और चप्पल पहनकर वह अमृत दौड़ स्पर्धा में शामिल तो हो गईं, लेकिन जब चप्पलें रास्ते में फिसलने लगीं, तो उन्होंने चप्पल हाथ में लेकर दौड़ पूरी की। इस घटना की सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि एक महिला ने युवाओं को पीछे छोड़ते हुए प्रथम स्थान हासिल किया, बल्कि यह है कि एक मां ने अपनी आर्थिक सीमाओं को बेटियों के भविष्य की सीमा बनने से रोक दिया। रमाबाई की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत में शिक्षा को लेकर होने वाली बहसें अक्सर बड़े आंकड़ों, योजनाओं और बजट के आसपास घूमती रहती हैं। हम सकल नामांकन अनुपात, स्कूल छोड़ने की दर, डिजिटल शिक्षा और कौशल विकास की चर्चा करते हैं, लेकिन इन आंकड़ों के पीछे मौजूद उन परिवारों को अक्सर भूल जाते हैं, जिनके लिए बच्चे की फीस भरना ही सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती है। देश के करोड़ों परिवारों के लिए शिक्षा अब भी केवल अधिकार नहीं, बल्कि संघर्ष से हासिल किया जाने वाला अवसर बनी हुई है। ऐसे में, इस कहानी को केवल मां के त्याग की एक भावुक कथा बनाकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। बेटी की फीस के लिए मां को नंगे पैर दौड़ना पड़े, तो यह स्थिति प्रेरणादायी भले हो, लेकिन व्यवस्था के लिए स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। ऐसी हर कहानी दरअसल सरकारी दावों और वास्तविकता के बीच मौजूद उस खाई की ओर ही इशारा करती है, जिसे जवाबदेही से भरे जाने की जरूरत है। अच्छी बात है कि राज्य सरकार ने रमाबाई की मदद करने का आश्वासन दिया है, लेकिन यह पड़ताल भी जरूरी है कि जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए घोषित छात्रवृत्तियां, फीस माफी, मुफ्त किताबों और छात्रावास जैसी सुविधाओं का लाभ वास्तव में कितने बच्चों को मिल पा रहा है। रमाबाई का दौड़ पूरी कर बेटी की फीस जुटाना उनके साहस की मिसाल जरूर है, लेकिन एक संवेदनशील व्यवस्था की असली सफलता तब होगी, जब किसी और मां को ऐसा करने की जरूरत ही न पड़े।
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