{"_id":"640bcc1643500c6a5102e374","slug":"ram-chandra-poudel-victory-as-nepal-president-change-political-scenario-setback-for-china-relief-for-india-2023-03-11","type":"story","status":"publish","title_hn":"Nepal: पौडेल की जीत से बदली नेपाल की सियासत; चीन के लिए झटका, भारत को राहत","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
Nepal: पौडेल की जीत से बदली नेपाल की सियासत; चीन के लिए झटका, भारत को राहत
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
Ram Chandra Poudel
- फोटो :
Agency (File Photo)
विस्तार
राजनीति अनिश्चितताओं का खेल है और यह नेपाल के राजनीतिक उथल-पुथल के बारे में बिल्कुल सही है। हाल ही में चीन के कट्टर समर्थक पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली द्वारा प्रचंड सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद नए सत्ता समीकरण में भारत समर्थक नेपाली कांग्रेस अब प्रचंड सरकार का हिस्सा बन सकती है और चूंकि वह सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए सरकार में उसका प्रभुत्व हो सकता है। आठ दलों के गठबंधन की ओर से नेपाली कांग्रेस प्रत्याशी रामचंद्र पौडेल नए राष्ट्रपति चुने गए हैं, जो पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' के नेतृत्व में नई गठबंधन सरकार का मार्ग प्रशस्त करेंगे।
संसदीय चुनाव के पूर्व बने पांच दलों के गठबंधन को पुनर्जीवित करने से नेपाली कांग्रेस के प्रभुत्व वाले गठबंधन को संसद में बहुमत साबित करने में कोई परेशानी नहीं होगी। इससे पूर्व प्रधानमंत्री ओली अलग-थलग पड़ गए हैं, जिन्होंने अपने कार्यकाल में भारत-नेपाल संबंधों को निचले स्तर पर ला दिया था, क्योंकि उन्होंने लगातार चीन को खुश करने की कोशिश की थी और भारत के कुछ इलाकों को नेपाल में दिखाने के लिए मानचित्र को फिर से तैयार करने, भारत द्वारा कैलास पर्वत तक सड़क निर्माण पर आपत्ति जताने और चीन को नेपाल में भारी मात्रा में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने जैसे विवादित मुद्दों को उठाया। नेपाली कांग्रेस के प्रभुत्व वाली नई सरकार भारत विरोधी अभियान को रोक सकती है और सदियों पुराने संबंधों को मजबूत कर सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ओली के नेतृत्व वाली चीन समर्थक ताकतों के अलग-थलग पड़ने का अमेरिका भी स्वागत करेगा, जो चीन को हाशिये पर रखने के लिए नेपाल को आर्थिक मदद दे सकता है। अमेरिका ने चीन को अलग-थलग करने के लिए काठमांडू में अपनी पैठ मजबूत बनाने के लिए वित्तीय पहल की थी, जिसे ओली के नेतृत्व में नेपाल ने रोक दिया था। नई गठबंधन सरकार एक अलग रुख अपना सकती है, क्योंकि अमेरिका आम तौर पर मुफ्त या अनुदान के रूप में वित्तीय सहायता देता है, जबकि चीन की ऋण जाल नीति उधार लेने वाले राष्ट्र को भारी कर्ज में डाल देती है और फिर शर्तें थोपने लगती है, जिसने पहले ही पाकिस्तान, श्रीलंका और दुनिया के दर्जनों गरीब देशों को बर्बाद कर दिया है।
नेपाल की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए अमेरिका के मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन ने 2017 में नेपाल के साथ 50 करोड़ डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किया था, पर ओली सरकार ने इसे अवरुद्ध करने की कोशिश की, जिसे अब पुनर्जीवित किया जा सकता है। संसदीय चुनाव में 89 सीटों के साथ नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। पर सत्ता साझा करने पर प्रचंड से सहमति नहीं बनने के चलते प्रचंड ने ओली के साथ गठबंधन करके सरकार बनाया। फिर भी विश्वास मत के दौरान नेपाली कांग्रेस ने प्रचंड सरकर का समर्थन किया था, लेकिन नेपाली कांग्रेस प्रत्याशी पौडेल को प्रचंड द्वारा समर्थन देने के कारण ही ओली ने प्रचंड सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
राष्ट्रपति चुनाव में नेपाली कांग्रेस के प्रत्याशी एवं पूर्व स्पीकर राम चंद्र पौडेल को प्रधानमंत्री प्रचंड सहित नेपाल की बारह में से आठ दलों ने समर्थन दिया, जिससे वह आसानी से चुनाव जीत गए। इसके विपरीत ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल के प्रत्याशी मात्र चार दलों का समर्थन जुटा सके और उन्हें अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा। निवर्तमान राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी का कार्यकाल 14 मार्च को समाप्त हो रहा है। भंडारी को नेपाली कांग्रेस के गुस्से का तब सामना करना पड़ा था, जब उन्होंने नेपाल में ओली सरकार की सदन में हार के बाद 2020 में सबसे बड़ी पार्टी को नई सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने से इनकार कर दिया था।
फिलहाल प्रचंड की सरकार सुरक्षित है, क्योंकि इसे बारह दलों का समर्थन हासिल है। 275 सीटों वाले सदन में इस गठबंधन को बहुमत के लिए जरूरी 138 से ज्यादा सांसदों का समर्थन हासिल है, जिसमें नेपाली कांग्रेस की 89, प्रचंड के माओवादी सेंटर की 32, पूर्व प्रधानमंत्री माधव नेपाल की यूनिफाइड सोशलिस्ट की 10 और पूर्व टीवी पत्रकार रबि लिमिछाने की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की 20 सीटें शामिल हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल की संसद में 79 सीटें हैं, लेकिन प्रचंड सरकार से समर्थन वापस लेकर वह अप्रासंगिक हो गई है। हालांकि एक चतुर राजनेता के रूप में ओली ने संसदीय चुनाव के बाद प्रचंड को प्रधानमंत्री पद का प्रलोभन देकर अपने जाल में फंसा तो लिया था, लेकिन दोनों का गठबंधन लंबा नहीं चल पाया, क्योंकि कथित तौर पर ओली ने प्रचंड को चीन की गोद में धकेलने की कोशिश शुरू कर दी थी, जो प्रचंड को पसंद नहीं था, क्योंकि वह चीन और भारत, दोनों के प्रति समान रिश्ता रखना चाहते थे। राष्ट्रपति पद के लिए अपने वफादार प्रत्याशी को आगे करना ओली के लिए भारी पड़ गया, जिन्हें समर्थन देने से प्रचंड ने इनकार कर दिया। प्रचंड और ओली के बीच अविश्वास का पुराना इतिहास रहा है, क्योंकि प्रचंड को ओली ने तब धोखा दिया था, जब वह सत्ता में आए अविभाजित सीपीएन-यूएमएल का हिस्सा थे।
प्रचंड, नेपाली कांग्रेस अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा, और माधव नेपाल की यूनिफाइड सोशलिस्ट ने सरकार के शेष कार्यकाल के लिए बारी-बारी से सत्ता साझा करने पर सहमति व्यक्त की है, जो भविष्य में नेपाल में स्थिरता सुनिश्चित करेगा। नेपाली कांग्रेस के नेताओं के अनुसार, काठमांडू स्थित चीनी दूतावास ने देश की राजनीति में हस्तक्षेप किया और कम्युनिस्टों के दो गुटों को एकजुट करने की कोशिश की, लेकिन सब व्यर्थ हो गया। ओली ने खुले तौर पर चीन का पक्ष लिया था और भारत के साथ टकराव का विकल्प चुना, जो अब नई गठबंधन सरकार में नहीं चल सकता है। चीन एशिया में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए नेपाल को भारत से दूर करना चाहता है।
विश्लेषकों का कहना है कि नेपाली कांग्रेस के प्रत्याशी रामचंद्र पौडेल की राष्ट्रपति के रूप में जीत चीन के लिए झटके की तरह है, जबकि भारत को इससे राहत मिली है, क्योंकि ओली का झुकाव पूरी तरह से चीन की तरफ था। इससे अग्निवीर योजना के तहत 25 हजार नेपाली युवाओं की भर्ती सुनिश्चित हो सकती है, जिसे ओली सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था।