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मंजिलें और भी हैं: भीख मांगने वाले बच्चों के हाथ में हैं किताबें

राकेश सिंह नेगी Updated Tue, 10 Sep 2019 04:15 AM IST
गरीब बच्चों को इस तरह उपलब्ध करा रहे शिक्षा
गरीब बच्चों को इस तरह उपलब्ध करा रहे शिक्षा - फोटो : file photo
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श्रीनगर (उत्तराखंड) में अपने घर से विश्वविद्यालय जाते समय अक्सर मैं सड़क किनारे कुछ बच्चों को खड़ा देखता था। जो वहां पर रुकने वाले पर्यटकों से भीख मांगा करते थे। कई बार वे मेरे पास भी आते थे। कुछ पर्यटक तो उन्हें रुपये देते थे, जबकि कई उन्हें भगा देते थे। मैं उत्तराखंड के चमोली जिले का रहने वाला हूं। मेरा बचपन पहाड़ों के बीच में बीता है। मेरी प्राथमिक शिक्षा यहीं से हुई। स्कूल के समय से मैं सामाजिक कार्यों में भागीदारी करने के लिए उत्साहित रहता था।
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उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद मैं गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर (उत्तराखंड) में राजनीति विज्ञान विभाग में पढ़ा रहा हूं। मैं विभिन्न कॉलेजों में जाकर मोटिवेशनल कक्षाएं भी लेता हूं। एक दिन एक बच्चा मेरे पास भीख मांगने आया तो मैंने उसे कुछ रुपये दिए, इस शर्त पर कि जो पूछूंगा वह बताएगा। मैंने उसके घर, परिवार, पढ़ाई के बारे में बातचीत की। उसके माता-पिता दैनिक मजदूरी करते थे।

मैंने उस बच्चे से पूछा कि वह स्कूल क्यों नही जाता, तो उसने बताया, कि माता-पिता के पास इतने पैसे नहीं बचते हैं कि वे उसकी फीस और किताब-कॉपी का खर्च उठा सकें। मैंने देखा कि बहुत सारे बच्चे स्कूल न जाकर भीख मांग रहे हैं। उनके माता-पिता मजदूरी करके दो वक्त के खाने का जुगाड़ करते हैं, परिवार में कोई उन बच्चों को सही दिशा देने वाला नही है, तो मैंने सोचा कि इन बच्चों के लिए कुछ कर सकूं, जिससे ये अपने जीवन को नई दिशा दे सकें।
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