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स्मरण: राहुल सांकृत्यायन के नाम पर बसा है एक गांव

Sudhir Vidhyarthi सुधीर विद्यार्थी
Updated Sun, 23 Apr 2023 06:57 AM IST
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सार
1969 में ‘राहुल संस्थान’ की ओर से छपरा में राहुल जयंती का आयोजन किया गया था और एक विशेषांक भी छपा था। अब शायद राहुल जी के निधन के 60 वर्ष पूरे होने से राॅयल्टी मुक्त हो जाने के चलते किसी प्रकाशक की नजर उनके संपूर्ण साहित्य पर जाए।
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Rahul Nagar village named after rahul sankrityayan in pilibhit district of uttar pradesh
राहुल सांकृत्यायन - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

मेरी वह यात्रा पीलीभीत जनपद के पूरनपुर कस्बे तक पहुंचकर जंगल से गुजरते हुए थी। चंदिया हजारा की बंगाली बस्ती में मोटर साइकिल खड़ी करके आगे का रास्ता हमने पैदल ही तय किया। कुछ कदम चलकर शारदा नदी की मंद धार को पार करने के बाद सुनसान में लंबी पगडंडी से निकलकर नरकुल और फूस की बनी झोपड़ियां दिखाई दीं, तो लगा कि हम बंगाल के किसी दूरस्थ इलाके में आ गए हैं। यह राहुल नगर गांव है, जिसे करीब चार दशक पहले इंडियन पीपुल्स फ्रंट ने हिंदी साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन की स्मृति में बसाया था।


यहां कुछ बंगाली परिवारों और पूर्वी उत्तर प्रदेश के विस्थापित गरीब मजदूरों की रिहायशें हैं। इनमें ज्यादा बांस और फूस से बनी-ढंकी झोपड़ियां हैं। 1982 में यहां बन चुके घरनुमा ढांचों को बड़े भूस्वामियों ने वन विभाग और जिला प्रशासन से मिलकर अत्यंत बेरहमी से उजाड़ दिया। इसके बाशिंदों को गुंडों की सहायता से मार-पीट कर भगाने के साथ ही तब सैकड़ों लोगों पर पुलिस और पीएसी ने ऐसा कहर ढाया कि देखते-ही-देखते, वे सब न जाने किस ओर प्रस्थान कर गए। यहां के प्राइमरी स्कूल तक को नष्ट कर दिया गया और लूट की संपत्ति को ट्रैक्टरों और ट्रकों से ढोने के बाद जमीन को एक लाख पच्चीस हजार रुपये में किसी भूस्वामी को पट्टा भी दे दिया गया। 1983 में दिनमान में इसकी रिपोर्ट छपने के बाद भी हिंदी के लेखक समुदाय के बीच तब किसी तरह की हलचल नहीं हुई। राहुल सांकृत्यायन के नाम पर देश भर में बसा यह अकेला गांव उन दिनों बहुत अंधेरे में डूब गया था, पर इस जमीन से जबरन विस्थापित किए गए वे मजदूर और गरीब-गुरबे चुप नहीं बैठे। उन्होंने योजनाबद्ध ढंग से संगठित होकर अपनी मुहिम को चलाया और फिर से धरती के उस टुकड़े पर अपना अधिकार जमा लिया। इस तरह राहुल नगर गांव की वह बस्ती उजड़ने के बाद फिर बस गई और वहां जिंदगी के साथ फसलें भी लहलहाने लगीं।


अब यहां गांव के बीचो-बीच बड़े मण्डप के ऊपर मजदूरों का लाल झंडा लगा है, जहां गांव वाले बैठकें करते हैं। नई रणनीति और संघर्ष तेज करने की गुफ्तगू होती है। यहां लकड़ी के एक बक्से में छोटी-बड़ी अनेक किताबें, अखबार और पम्फलेट रखे हैं। उस रोज वहां मिलने वाले कॉमरेड नवी हसन से हम देर तक बतियाते रहे। शाम घिरने लगी थी, लेकिन मैं इस गांव के निवासियों, खासकर यहां की कामगार स्त्रियों से कुछ बातें कर लेना चाहता था। उनकी जीवन शैली देखकर एक नई संस्कृति को जानने के अनुभव से गुजरता हूं। इस ग्राम की दीर्घ संघर्ष-गाथा पर तो एक डाक्यूमेंटरी बननी चाहिए। मैंने पिछले दिनों ‘निशांत नाट्य मंच’ के संयोजक शम्सुल इस्लाम और पहाड़ के संपादक शेखर पाठक के सम्मुख यह प्रस्ताव रखा कि लेखकों और संस्कृतिकर्मियों को राहुल नगर गांव की एक सांस्कृतिक यात्रा की योजना बनानी चाहिए।

मुझे याद है कि 1969 में ‘राहुल संस्थान’ की ओर से छपरा में राहुल जयंती का आयोजन किया गया था। जनशक्ति की ओर से उसी समय राहुल जी पर एक विशेषांक भी प्रकाशित किया गया था। इसके बाद 1981 में राहुल जी के गांव कनैला (आजमगढ़) में जार्स्टन क्राडवे की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह तय किया गया था कि केंद्र और राज्य सरकारों से राहुल साहित्य के प्रकाशन के बारे में कहा जाएगा तथा उनके पैतृक गांव को ‘बी’ श्रेणी पर्यटन केंद्र बनाने की योजना भी स्वीकृत हुई थी। स्थानीय नगरपालिका ने भंडपा मुहल्ले का नामकरण भी राहुल जी के नाम पर कर दिया था। यह भी तय हुआ था कि राहुल जन्मदिवस पर चक्रपाणिपुर-कनैला क्षेत्र में प्रतिवर्ष उनकी याद में एक मेले का आयोजन किया जाएगा। पर वे सब योजनाएं अधूरी रह गईं। हम यह भी जानते हैं कि एक समय संपूर्ण राहुल साहित्य पर एक प्रकाशक कुंडली मारे बैठा रहा।

अब राहुल जी के निधन के 60 वर्ष पूरे हो जाने पर राॅयल्टी मुक्त हो जाने के चलते शायद कुछ सुधी और विचार संपन्न प्रकाशकों का ध्यान इस ओर जाए। एक समय शंकर दयाल सिंह पारिजात प्रकाशन, पटना से राहुल जी पर कुछ काम करने को थे। इसी तरह देहरादून के पद्मकुमार जैन भी उन पर स्मृति-ग्रंथ छापने की तैयारी कर रहे थे। पर वे योजनाएं आगे नहीं बढ़ीं। विगत कुछ वर्षों से राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ, मऊ ने एक नई पहल की है। पूर्वांचल के भुजौटी-मऊ में साथी जयप्रकाश धूमकेतु ने राहुल सांकृत्यायन की स्मृति का जो उपक्रम निर्धारित किया है, वह इस कठिन समय में एक सपने की कौंध जगाता है। राहुल स्वयं भी ‘भागो नहीं, दुनिया को बदलो’ का संदेश हमें देते हैं।
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