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कट्टर दक्षिणपंथ और कट्टर वामपंथ, दोनों का एक ही लक्ष्य

Sun, 14 Mar 2021 03:03 AM IST
रामचंद्र गुहा रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा Published by: रामचंद्र गुहा Updated Sun, 14 Mar 2021 03:03 AM IST
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Radical Right and Radical Left article by Ramachandra Guha
सांकेतिक तस्वीर

मैं अग्रणी ब्रिटिश नारीवादी और शिक्षाविद् डोरा रसेल के संस्मरण पढ़ रहा हूं। इनका प्रकाशन तीन खंडों में किया गया था और मैंने अभी बस पहला खंड ही पूरा किया है। इसमें एडवार्डियान इंग्लैंड में उनकी परवरिश, कैम्ब्रिज में उनकी शिक्षा, लैंगिक समानता पर उनके दृष्टिकोण का विकास, उनके द्वारा स्थापित एक प्रायोगिक स्कूल और विद्वान तथा विवादास्पद दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल के साथ विवाह में बिताए वर्षों को समाहित किया गया है।


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उनकी पीढ़ी के अन्य लोगों की तरह डोरा रसेल भी बोल्शेविक क्रांति से गहराई से प्रभावित थीं, जो कि तब हुई थी, जब उनकी उम्र बीस-बाइस साल की रही होगी। क्रांति के भड़कने के बाद उन्होंने रूस की यात्रा की, ताकि इसके प्रभाव का सीधा अध्ययन कर सकें। 1918-19 के दौरान रूस में उत्साही बोल्शेविकों के साथ बात करते हुए डोरा को मध्य युगीन ईसाई धर्मशास्त्रियों की याद आ गई, जिन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड का सपना देखा था, इस उम्मीद में कि इसकी रचना ईश्वर करेंगे। उन धार्मिक कल्पनाजीवियों की तरह, जैसा कि रसेल ने लिखा, 'ये लोग (रूस में) ब्रह्मांड के वास्तुकार 'ग्रेट क्लॉकमेकर' की नकल कर रहे हैं और जिस तरह से उसने ग्रहों की गति स्थापित की थी, ठीक उसी तरह से वे नए समाज के ब्लू प्रिंट की रचना करेंगे, जो कि औद्योगिक रणनीति पर आधारित होगा, जिसमें प्रत्येक पुरुष और स्त्री को काम मिलेगा और वे अपना योगदान देंगे। एक बार गति पकड़ लेने के बाद यह नई तर्कसंगत समाज व्यवस्था खुद से चलने लगेगी।' 

सोवियत रूस में बातचीत के दौरान डोरा रसेल बोल्शेविकों की भयानक मताधंता को देखकर प्रभावित और कुछ हद तक परेशान हुईं। उन्होंने लिखा, 'ऐसा दिखता है कि भविष्य के साम्यवादी राज्य की स्थापना के लिए साम्यवाद की शिक्षा अनिवार्य हो सकती है, लेकिन यह मुझे एक बुराई लगी, क्योंकि इसे रचनात्मकता के बजाय घृणा और उग्रवाद की अपील के साथ भावनात्मकता और उन्माद के जरिये किया जा रहा है। यह स्वतंत्र समझ पर रोक लगाता है और ऐसी पहल को ध्वस्त करता है।'

डोरा रसेल के एक दशक बाद कवि रवींद्रनाथ टैगोर सोवियत रूस की यात्रा पर गए। टैगोर दो हफ्ते के प्रवास के दौरान वहां स्कूलों और फैक्टरियों में गए और विभिन्न वर्गों के लोगों से बात की। लौटने से थोड़ा पहले टैगोर ने पार्टी के अखबार इजवेस्तिया को एक साक्षात्कार दिया। सोवियतों ने जिस अद्भुत सघनता के साथ शिक्षा का विस्तार किया, उसकी उन्होंने सराहना की, लेकिन साथ ही उन्होंने यह चेतावनी भी दी, 'मैं आपसे पूछना चाहूंगा ः क्या आप प्रशिक्षण में अपने लोगों के मन में उन लोगों के प्रति गुस्सा, वर्गीय घृणा और बदले की भावना को भड़का कर अपनी विचारधारा का भला कर रहे हैं, जो आपकी विचारधारा से साझा नहीं करते, जिन्हें आप अपने दुश्मन समझते हैं? यह सच है कि आपको बाधाओं से लड़ना होगा, आपको अज्ञानता और संवेदनहीनता से लड़ना होगा यहां तक कि निरंतर आने वाले प्रतिरोध से भी। आपके अनुसार आपका मिशन अपने खुद के राष्ट्र या खुद की पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी मानवता की बेहतरी के लिए है। लेकिन क्या जो लोग आपके लक्ष्य से सहमत नहीं हैं, वे मानवता के दायरे में नहीं आते?'

टैगोर के विचार से एक परिपक्व राजनीतिक व्यवस्था असहमति को स्वीकार करती है, जहां मन को स्वतंत्र होने की इजाजत हो। यदि दबाव बनाकर सारे विचार एक जैसे हो जाएं, तो यह न केवल अरुचिकर, बल्कि यांत्रिक नियमन से संचालित निर्जीव दुनिया बन जाएगी। यदि आपके पास ऐसा मिशन है जिसमें सारी मानवताएं समाहित हैं, तो फिर मत भिन्नता को स्वीकार कीजिए। बौद्धिक ताकतों के मुक्त प्रवाह तथा नैतिक प्रोत्साहन से विचार निरंतर बदलते रहते हैं और पुनः बदलते हैं। हिंसा, हिंसा और अंध मूर्खता का कारण बनती है। सत्य को स्वीकार करने के लिए मन की स्वतंत्रता जरूरी है; आतंक इसे निराशाजनक ढंग से नष्ट कर देता है।'

डोरा रसेल पर लौटते हैं। सोवियत रूस की यात्रा के कई साल बाद वह चीन गईं और वहां उन्होंने नौसिखुआ कम्युनिस्ट पार्टी से बात की। उनकी कट्टरता और उत्कंठा अपने रूसी कॉमरेड से कम नहीं थी। जनवरी, 1921 में बीजिंग से अपने एक मित्र को भेजे एक पत्र में डोरा ने टिप्पणी की कि 'विचारकों में साम्यवाद को सत्ता में लाने का दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन चीन और रूस दोनों जगह यह धर्म से कम नहीं है... धर्म के रूप में इसका लाभ यह हो सकता है कि राज्यों के निर्माण में धर्म लोगों को एक समुदाय के रूप में एकजुट रखते हैं और उनमें एक झुंड में रहने की भावना जगाते हैं।'

विशेष रूप से, जैसा कि हमारे अपने देश के समकालीन इतिहास से पता चलता है कि कट्टर दक्षिणपंथ कट्टर वामपंथ के साथ कई गुणों का साझा करता है। वे इस पर भी यकीन करते हैं कि साधन चाहे कुछ भी हो लक्ष्य ही अंतिम है, जैसे कि सत्तारूढ़ राजनेताओं को नौकरशाही और न्यायपालिका को नियंत्रित करना चाहिए, राज्य और सत्तारूढ़ दल के पास यह अधिकार हो कि वह नियंत्रित और निर्देशित कर सकें कि उपन्यास कैसे लिखे जाएं, गाने कैसे गाए जाएं, किन नारों को प्रोत्साहित किया जाए और किन्हें प्रतिबंधित किया जाए। कट्टर दक्षिणपंथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी नकारता है और अपने खुद के धर्म के रहस्यमय और अतार्किक तत्वों से निर्देशित होता है। फ्रेंच इतिहासकार फ्रैंकोइस फ्यूरे ने दक्षिणपंथी और वामपंथी निरंकुशता की समानताओं को खूबसूरती से अपनी किताब द पासिंग ऑफ एन इल्यूशन में दर्ज किया है। फ्यूरे ने लिखा, 'सोवियत लोगों की तरह ही नेशनल सोशलिस्ट लोग थे, उनसे बाहर हर व्यक्ति एंटीसोशल था। एकता का निरंतर जश्न मनाया जाता था और सार्वजनिक रूप से वैचारिक घोषणाओं में इसकी पुष्टि की जाती थी। इसका सर्वोच्च रूप था, इसके नेता फ्यूहरर की मनुष्येतर छवि। इस प्रकार जनता अनिवार्य और स्थायी रूप से पार्टी स्टेट का हिस्सा थी। इससे परे, केवल लोगों के दुश्मन थे, लेनिन के लिए इसका मतलब बूर्जुआ था और हिटलर के लिए यहूदी। हर समय लोग निगरानी में रहते थे और सत्ता शाश्वत थी।' फ्यूरे ने लिखा कि फासीवाद की तरह साम्यवाद को हिंसा और अनैतिक साधन मंजूर थे, बशर्ते कि वे राजनीतिक प्रभुत्व की ओर ले जाएं। लिहाजा लेनिन और हिटलर के लिए, 'आप अपने साथी नागरिकों को उसी तरह से मार सकते हैं, जिस तरह से युद्ध में शत्रु को। इसके लिए बस यह जरूरी है कि वे गलत वर्ग या विपक्षी दल के हों।'

फ्यूरे की किताब अंतर यूरोपीय युद्ध पर केंद्रित है, इसलिए इसमें लेनिन और हिटलर का जिक्र है। युद्धोतर एशिया का कोई भावी इतिहासकार चीन में साम्यवाद के उदय और भारत में सत्तावादी हिंदुत्व के उदय में समानताएं देख सकता है, खासतौर से माओ और मोदी की मनुष्येतर छवि में। वास्तव में फ्यूरे कभी भारत नहीं आए और संभव है कि उन्होंने इस देश के इतिहास के बारे में भी कम पढ़ा हो, लेकिन मैंने जिस अंश का जिक्र किया वह भारत के संबंध में पूर्वाभास-सा लगता है। माओ के अधीन साम्यवादी चीनियों की तरह मोदी के नेतृत्व में भाजपा एक पार्टी वाली व्यवस्था कायम करना चाहती है। इसके लिए महान और कभी गलती न करने वाले नेता की छवि गढ़ी गई है; विपक्षियों को भयभीत किया गया है और राष्ट्रविरोधी बताकर उनकी आलोचना की जाती है। एक अंतराल के बाद दावा किया जाता है कि प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश हो रही है। और सबसे दुखद है कि भारतीय मुस्लिमों को ठीक उसी तरह आतंकित किया जा रहा है, जैसा कि कम्युनिस्टों ने चीन में गैर हान समुदायों के साथ किया। दोनों ही पक्ष स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन कट्टर दक्षिणपंथ और कट्टर वामपंथ में काफी समानताएं हैं। डोरा रसेल की ऊपर दी गई पंक्तियों को याद करें और 'साम्यवाद' की जगह 'हिंदुत्व' रख दें, तो यह इस बात का स्पष्ट निरूपण होगा कि आरएसएस और भाजपा आज भारत में क्या करना चाहते हैं।

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