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काबुल में अमन का सवाल : ताकि वर्षों से चली आ रही हिंसा समाप्त हो सके

Fri, 26 Jul 2019 07:27 PM IST
kuldeep talwar कुलदीप तलवार
Updated Fri, 26 Jul 2019 07:27 PM IST
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Question of peace in Kabul
Afghan security personnel in Kabul

अफगानिस्तान में एक तरफ तालिबान की सक्रियता के कारण हिंसा बढ़ी है, वहीं शांति बहाली के लिए कई गैरसरकारी कद्दावर अफगान नेताओं के साथ वार्ता का सिलसिला भी जारी है। अमेरिका के साथ अब तक सात दौर की वार्ता हो चुकी है। विगत 10-11 जुलाई को बीजिंग में अमेरिका, रूस, चीन और पाकिस्तान ने तालिबान से अनुरोध किया कि वे संघर्ष विराम के लिए राजी हो जाएं और अफगान सरकार से बातचीत करें, ताकि वर्षों से चली आ रही हिंसा समाप्त हो सके। अमेरिका आगामी सितंबर में अफगानिस्तान में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले तालिबान के साथ समझौते पर पहुंचना चाहता है, ताकि अपने सैनिकों को वापस बुला सके।


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अफगानिस्तान में एक तरफ तालिबान की सक्रियता के कारण हिंसा बढ़ी है, वहीं शांति बहाली के लिए कई गैरसरकारी कद्दावर अफगान नेताओं के साथ वार्ता का सिलसिला भी जारी है। अमेरिका के साथ अब तक सात दौर की वार्ता हो चुकी है। विगत 10-11 जुलाई को बीजिंग में अमेरिका, रूस, चीन और पाकिस्तान ने तालिबान से अनुरोध किया कि वे संघर्ष विराम के लिए राजी हो जाएं और अफगान सरकार से बातचीत करें, ताकि वर्षों से चली आ रही हिंसा समाप्त हो सके। अमेरिका आगामी सितंबर में अफगानिस्तान में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले तालिबान के साथ समझौते पर पहुंचना चाहता है, ताकि अपने सैनिकों को वापस बुला सके।

अमेरिका के विशेष दूत खलीलजाद ने, जो तालिबान और अमेरिका में समझौता कराने के लिए पिछले काफी समय से कोशिश कर रहे हैं, कई बार तालिबान से संघर्ष विराम की अपील की है। पर जब तक अमेरिकी-नाटो फौज अफगानिस्तान से निकल नहीं जाती, तब तक तालिबान संघर्ष विराम नहीं करेंगे। हालांकि उन्होंने वादा किया है कि वे अपनी धरती को दहशतगर्दों को इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देंगे। पर कुछ सवालों के जवाब जरूरी हैं, जैसे अमेरिकी फौज वहां से कब निकलेगी?

क्या अगले कुछ महीनों में अमेरिकी फौज के लिए वहां से निकलना संभव होगा, जैसा कि तालिबान चाहते हैं? अमेरिकी दूतावास की सुरक्षा के लिए मौजूद एक हजार अमेरिकी सैनिकों को दहशतगर्दी के खात्मे के लिए ऑपरेशन करने की इजाजत होगी या नहीं? क्या तालिबान अपने लड़ाकों को फौज में शामिल करने का दबाव डालेंगे?

अफगानिस्तान में शक्ति संतुलन और नए संविधान की तैयारी के मामले भी काफी पेचीदा हैं। इसकी भी संभावना है कि तालिबान देश के पश्चिमी इलाके पर नियंत्रण मांगें, जिस पर काफी हद तक उनका कब्जा है।

पिछले दिनों पाकिस्तान ने अपने हित पूरे करने और अमेरिका को खुश करने के लिए कुछ कदम उठाए, जिनमें अफगान शांति वार्ता में मदद देना भी शामिल है। ऐसा करके पाक फिर अमेरिका को धोखा दे रहा है। तालिबान संघर्ष विराम करें, यह पाकिस्तान नहीं चाहता। वह अफगानिस्तान में ऐसी सरकार चाहता है, जो उसकी उंगलियों पर नाचे। ऐसे में शांति बहाली के लिए पाकिस्तान द्वारा नेक नीयत से कदम उठाने की उम्मीद क्या की जा सकती है?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिका पहुंचे पाक प्रधानमंत्री इमरान खान के बीच हाल में हुई मुलाकात में अफगानिस्तान के मामले में भी बातचीत हुई। जहां इमरान ने ट्रंप के कहने पर अफगानिस्तान में संघर्ष विराम कराने की झूठी तसल्ली दी, वहीं ट्रंप की टिप्पणी थी कि अगर वह चाहें, तो अफगानिस्तान के युद्ध को 10 दिन में समाप्त कर सकते हैं, पर वह एक करोड़ लोगों को मारना नहीं चाहते।

इस पर अफगानिस्तान ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और साफ कर दिया कि अफगान सरकार को दरकिनार कर कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष अफगानियों के भाग्य का फैसला नहीं कर सकता। इधर इमरान खान ने भी स्वीकार किया है कि पाकिस्तान में चालीस-पचास हजार आतंकवादी मौजूद हैं, जो कश्मीर और अफगानिस्तान में हमले करते हैं।

जरूरत है कि शांति बहाली के लिए तालिबान संघर्ष विराम पर राजी हो जाएं और सरकार से सीधी बातचीत करें। अफगानियों ने बातचीत के जरिये कई बार पेचीदा मसले हल किए हैं और उन्हें मध्यस्थता की जरूरत नहीं है। देखना होगा कि अफगानिस्तान के हालात अगले कुछ दिनों में क्या शक्ल अख्तियार करते हैं।
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