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सीबीआई पर नियंत्रण का सवाल

Mon, 24 Feb 2014 07:09 PM IST
विनीत नारायण
विनीत नारायण Updated Mon, 24 Feb 2014 07:09 PM IST
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Question about control on CBI

बीते दिनों प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में नियुक्ति समिति ने सीबीआई के अतिरिक्त निदेशक के पद पर अर्चना रामसुंदरम की नियुक्ति करके एक और विवाद खड़ा कर दिया है। उल्लेखनीय है कि यह नियुक्ति केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम व दिल्ली पुलिस स्थापना कानून की अवज्ञा करके की गई है। इस कानून के अनुसार, सीबीआई में पुलिस अधीक्षक से लेकर विशेष निदेशक तक की नियुक्ति करने का अधिकार जिस समिति को दिया गया है, उसकी अध्यक्षता केंद्रीय सतर्कता आयुक्त करते हैं। इस समिति में दो सतर्कता आयुक्त, भारत के गृह सचिव व भारत के डीओपीटी (कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग) के सचिव भी सदस्य होते हैं। सीबीआई के निदेशक को सलाह के लिए आमंत्रित अतिथि के रूप में बुलाया जाता है। सीबीआई के निदेशक की सलाह मानना इस समिति की बाध्यता नहीं है। लेकिन इस समिति द्वारा जो नाम प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली नियुक्ति समिति को भेजा जाता है, उसे मानना प्रधानमंत्री की समिति के लिए अनिवार्य है। अभी तक ऐसा ही होता आया है।

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उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय ने विनीत नारायण फैसले के तहत सीबीआई की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए यह निर्देश जारी किया था। पर अर्चना रामसुंदरम की नियुक्ति करके प्रधानमंत्री ने एक बार फिर इन नियमों की अवहेलना की है। उल्लेखनीय है कि दो वर्ष पहले केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति के समय प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की सलाह की उपेक्षा करके पी जे थॉमस को नियुक्त कर दिया था, जिस पर भारी बवाल मचा। उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के कड़े रूख को देखते हुए थॉमस को इस्तीफा देना पड़ा। ठीक वैसी स्थिति अब पैदा हो गई है।
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केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने सीबीआई के सह निदेशक पद के लिए बंगाल कैडर के पुलिस अधिकारी आर के पचनंदा का नाम प्रस्तावित किया था। जिसे डीओपीटी ने लौटाकर पुनर्विचार करने को कहा। इसके बाद पिछले वर्ष की 26 दिसंबर को आयोजित दूसरी बैठक में भी चयन समिति ने फिर से आर के पचनंदा का नाम ही प्रस्तावित किया। दूसरी बार प्रस्तावित करने की वजह से उसे मानना केंद्र सरकार की बाध्यता बन गई। लेकिन केंद्र सरकार ने इसकी परवाह नहीं की और किन्हीं दबावों में आकर अपनी मर्जी से सह निदेशक की नियुक्ति कर दी।
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यहां सवाल इस बात का नहीं है कि अर्चना रामसुंदरम योग्य हैं अथवा नहीं। प्रश्न यह है कि क्या प्रधानमंत्री का यह निर्णय कानून सम्मत है। इसका उत्तर है, नहीं। ऐसे में यह नियुक्ति अदालत की परीक्षा में कैसे खरी उतर पाएगी? अगर प्रधानमंत्री को आर के पचनंदा के नाम पर आपत्ति थी, तो उन्हें इसका लिखित कारण बताकर समिति को पुनर्विचार करने के लिए कहना चाहिए था। पर ऐसा कोई आरोप सरकार ने पचनंदा के विरुद्ध नहीं लगाया, इसलिए उनकी उम्मीदवारी की उपेक्षा का कोई कारण समझ में नहीं आता।


मैंने इस नियुक्ति के विरोध में प्रधानमंत्री को एक पत्र भी लिखा था। अगर सरकार कानून का उल्लंघन करके सीबीआई में अपनी पसंद के अधिकारी नियुक्त करना चाहती है, तो वह अदालत से कहकर उसके निर्देशों के विरुद्ध फैसला ले ले, क्योंकि फिर उसे केंद्रीय सर्तकता आयोग की जरूरत नहीं बचेगी। पर जब तक यह कानून प्रभावी है, इसका उल्लंघन गैरकानूनी माना जाएगा और नियुक्ति पर सवाल उठेंगे। समझ में नहीं आता कि चुनावी वर्ष में, अपने कार्यकाल के अंतिम कुछ हफ्तों में प्रधानमंत्री क्यों बार-बार ऐसी गलती दोहरा रहे हैं, जिस पर पहले भी उनकी फजीहत हो चुकी है। अगर अदालत का फैसला सरकार के पक्ष में आता है, तो अर्चना रामसुंदरम की इस स्थान पर नियुक्ति हो सकती है। फिलहाल वह तमिलनाडु कैडर की पुलिस अधिकारी हैं। जनहित याचिका पर अदालत का रुख सुने बिना अगर वह सीबीआई में पदभार ग्रहण कर लेती हैं और फिर फैसला उनके विरुद्ध आता है, तो उन्हें वापस अपने राज्य लौटना होगा। इससे सरकार की साख पर सवाल उठेंगे। इसलिए यह प्रश्न गंभीर है और शोचनीय भी।

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