पाकिस्तान में पंजाबी

मरिआना बाबर Updated Sat, 11 Nov 2017 09:31 AM IST
Punjabi in Pakistan
मरिआना बाबर
एक रूढ़िवादी पख्तून परिवार में पली-बढ़ी होने के कारण पश्तो को छोड़कर किसी अन्य भाषा में परिवार के लोगों के साथ बात करना मेरे लिए अकल्पनीय था। कभी-कभी घरेलू नौकर गैर-पख्तून होते, इसलिए उनके साथ उर्दू या अंग्रेजी में बातचीत होती थी। घर से बाहर निकलने पर ही हम स्वतंत्र रूप से राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय भाषा का इस्तेमाल करते थे। जिस कारण से मैं अपनी मातृभाषा की बात कर रही हूं, उसके पीछे यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि हमारे कई पंजाबी मित्र, खासकर शहरों में रहने वाले, अपनी मातृभाषा में बात नहीं करते, बल्कि वे उर्दू में बात करते थे। दशकों तक पंजाबी केवल गांवों में सुनी जाती थी और कपड़े सहित पंजाब की जीवंत और समृद्ध संस्कृति कहीं नहीं देखी जा सकती थी। हालांकि पंजाबी सिनेमा आम जनता के बीच लोकप्रिय था, लेकिन जब भी कोई पंजाबी फिल्म दिखाई जाती थी, तो अभिजात वर्ग के किसी व्यक्ति को सिनेमाघर में नहीं देखा जा सकता था।

एक बार जब मैंने एक पंजाबी महिला से पूछा कि वह अपने बच्चों से उर्दू में क्यों बात करती है, तो उसका जवाब था, क्योंकि अगर वे पंजाबी बोलेंगे, तो अपने अंग्रेजी उच्चारण को बर्बाद कर देंगे। उसका जवाब सुनकर मैं हतप्रभ रह गई। लेकिन कुछ अपवाद भी हैं, जैसे पूर्व पंजाबी प्रधानमंत्री चौधरी शुजात हुसैन। उन्होंने पंजाबी छोड़कर कभी दूसरी भाषा में बात नहीं की और अब भी पंजाबी ही बोलते हैं। उन्होंने सिर्फ एक बार संसद में ऊर्दू बोला। वह मुझसे पंजाबी में ही बात करते हैं, और मैं उन्हें उर्दू में जवाब देती हूं। एक दिन मैंने उनसे कहा कि अगर वह लगातार मुझसे पंजाबी में बात करेंगे, तो मैं पश्तो में जवाब दूंगी। जब उन्होंने शिकायत की कि वह पश्तो नहीं समझते, तो मैंने उनसे कहा कि जिस तरह पंजाबी समझने के लिए मुझे उसे सीखना पड़ा, उसी तरह वह पख्तूनों की भाषा क्यों नहीं सीख सकते!

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के निर्माण के लिए पंजाब प्रांत में हजारों चीनी कर्मचारियों को लाया गया है। मुझे उनकी महान भाषा कौशल को देखते हुए कोई हैरानी नहीं है कि पंजाबी कर्मचारियों के साथ मिलकर काम करने वाले चीनी कर्मचारियों को पंजाबी या उर्दू सीखनी होगी। मुझे चीनी लोगों के पंजाबी में बात करने की बात सोचकर ही हंसी आती है, जो एक बेहद कठिन भाषा है। इससे मुझे खैबर पख्तूनख्वा के उन सिख समुदायों की याद आई, जो मलाला यूसुफजई के जन्मस्थल स्वात क्षेत्र पर तालिबान के कब्जे के बाद शरण लेने ननकाना साहिब गुरुद्वारा पलायन कर गए थे। सिख समुदाय के वे लोग इतनी उत्कृष्ट पश्तो बोलते थे कि मुझे बेहद खुशी महसूस हुई। यह पहली बार था, जब मैंने सिख समुदाय को गैर-पंजाबी भाषा बोलते सुना।

यह सबको मालूम है कि पाकिस्तान की स्थापना में अधिकतर पंजाबी लोग शामिल थे, लेकिन आपने कभी पाकिस्तान में किसी सैन्य या सिविल नौकरशाह को सार्वजनिक रूप से पंजाबी बोलते नहीं सुना होगा। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब में 56 फीसदी मुस्लिम पंजाबी, 26 फीसदी हिंदू पंजाबी, 14 फीसदी सिख पंजाबी और चार फीसदी ईसाई पंजाबी शामिल हैं। पंजाबियों के पास खुद पर गर्व करने का कारण है कि वे राजनीतिक रूप से पाकिस्तान में हावी हैं। सबको अच्छी तरह से यह तथ्य मालूम है कि पंजाब प्रांत ही मुल्क का प्रधानमंत्री बनाता और बिगाड़ता है।

हाल ही में आई एक रिपोर्ट बताती है कि अकेले लाहौर एक बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसका राजस्व दस खरब पाकिस्तानी रुपये है। लेकिन लाहौर के पंजाब की राजधानी बनने के साथ जागरूकता बढ़ने लगी और पंजाबी भाषा व कविता की गति थोड़ी सुधरी। बाद में वहां पंजाबी भाषा के पुनरुद्धार के लिए रैलियां और सम्मेलन होने लगे। सोशल मीडिया पर इस तरह के पंजाबी ब्लॉग पढ़े जा सकते हैं-जिसने अपनी मातृभाषा खो दी, उसने सब कुछ गंवा दिया, अगर सब कुछ नहीं, तो कम से कम अपनी सांस्कृतिक विरासत तो जरूर खो दी। लेकिन अपनी सांस्कृतिक विरासत से वंचित या उसे खारिज करने वाला व्यक्ति या समुदाय अत्यंत निर्धन है। जो लोग अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत को भूल जाते हैं, वे आम तौर पर कुछ सदियों में गायब हो जाते हैं।

मासिक हेराल्ड  द्वारा इस कैप्शन के साथ एक मुहिम चलाई गई-अपनी भाषा पर ध्यान दें, पंजाबी के संरक्षण के लिए आंदोलन। स्वतंत्र शोधकर्ता और खोज गृह अनुसंधान केंद्र के संस्थापक इकबाल कैसर ने यह मुहिम चलाई-पंजाबी पढ़ें, पंजाबी लिखें और पंजाबी बोलें। उन्होंने पंजाब में अपनी मातृभाषा के संरक्षण की मांग करते हुए दर्जनों संघों, कार्यकर्ता समूहों और स्वयंसेवी संगठनों को एकजुट किया है। हर वर्ष 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर रैली आयोजित की जाती है। यह उन सभी लोगों का मुख्य आयोजन है, जो पंजाबी भाषा के लिए काम करते हैं। एक पंजाबी का कहना है, पंजाब पाकिस्तान में नेतृत्वकारी प्रांत है, लेकिन पंजाबी नेतृत्वकारी भाषा नहीं है। इस पहेली का जवाब औपनिवेशिक काल में निहित है, जब अंग्रेजों ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई, जिसमें रोजगार को उर्दू में प्रवीणता से जोड़ दिया गया। अपनी मातृभाषा को पुनर्जीवित करने की कोशिश करने वाले एक अन्य पंजाबी भाषी कहते हैं, औपनिवेशिक शासन ने भारत में उत्पादन क्षेत्र में बदलाव किया। जिस पैमाने पर उर्दू और अंग्रेजी में रोजगार सृजन हुआ, वह अभूतपूर्व था। अकेले रेलवे ने पूरे मुगल शासन तंत्र से ज्यादा रोजगार पैदा किया।

पाकिस्तान में जब ठेठ पंजाबी कपड़े पहनने की बात आती है, तो पुरुष ज्यादातर पाजामा या सलवार के साथ कुर्ता पहनते हैं। कोई पारंपरिक लुंगी या धोती में नहीं दिखता, जो पाकिस्तानी पंजाब के गांवों में दिखता है। यही समय है कि आम पंजाबी पुरुष और स्त्रियां गर्व के साथ शहरों में भी ठेठ पंजाबी कपड़े पहनें। पख्तून लोग दुनिया भर में कमीज और सलवार पहनते हैं, खासकर कराची और दुबई में, जिन्हें पख्तूनों के सबसे बड़े शहरों में गिना जाता है।

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