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दवाओं की कीमतें और अनसुलझे पहलू: ट्रेड मार्जिन पर 30% की सीमा लागू करने की व्यवस्था बड़ी पहल, अन्य पहलू क्या?

Thu, 22 Oct 2026 08:37 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Thu, 22 Oct 2026 08:37 AM IST
सार

कैंसररोधी दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर 30 फीसदी की सीमा लागू करने की व्यवस्था निस्संदेह एक बड़ी पहल है। पर, स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कुछ पहलू और भी हैं।

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Drug prices and unresolved issues capping cancer medicine trade margins at 30% major initiative other aspects
कैंसर के महंगे इलाज पर सरकार का बड़ा प्लान - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/AdobeStock

विस्तार

भारत में कैंसर के इलाज का खर्च इतना अधिक होता है कि अक्सर परिवार भारी कर्ज में डूब जाते हैं। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई, जिससे अस्पतालों और वितरकों द्वारा की जा रही भारी मुनाफाखोरी का खुलासा हुआ। हाल ही में, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि व्यावसायिक हितों को जनता के किफायती स्वास्थ्य सेवा पाने के अधिकार से ऊपर नहीं रखा जा सकता। इसके बाद केंद्र सरकार ने ‘ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन’ (टीएमआर) व्यवस्था लागू की है। इसके तहत, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) कैंसररोधी अहम दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर 30 फीसदी की सीमा लागू करेगी, जिससे निर्माताओं को अपनी अधिकतम खुदरा कीमतों (एमआरपी) को कम करना होगा।

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दवाओं की कीमतों से जुड़ी इस जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई अब कैंसर की दवाओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े मुद्दे से जुड़ गई है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने गैर-अनुसूचित दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर सख्त नियंत्रण की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए भारत में बने एक कार्डियक स्टेंट का उदाहरण दिया। इस स्टेंट की खुदरा कीमत 5,000 रुपये है, पर इसका एमआरपी 25,000 रुपये है। इसके अलावा, सलाइन ड्रिप और सिरिंज, आईवी सेट व दस्ताने जैसी वस्तुओं की कीमत खरीद लागत से कई गुना अधिक है। अदालत ने निजी अस्पतालों की उस आम प्रथा पर भी ध्यान दिलाया, जिसमें वे भर्ती मरीजों को केवल अस्पताल की फार्मेसी से ही दवाएं और चिकित्सा उपकरण खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि उसने स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। इस समिति को 15 दिनों के भीतर कैंसररोधी दवाओं की सूची तैयार करने को कहा है, जिन्हें इस आपातकालीन मूल्य विनियमन के दायरे में लाया जाना है। दो बड़े राज्यों ने उस पारदर्शिता को लागू करने की दिशा में कदम भी उठाए हैं, जिसकी मांग अदालत कर रही है।
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कर्नाटक के खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन ने जांच में पाया कि कुछ दवाओं और अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों की कीमत, खरीद लागत से 52 गुना तक अधिक रखी गई थी। वहीं, उत्तर प्रदेश के नियामक ने 67 गुना तक का भारी अंतर पाया है। इसे देखते हुए, नियामक ने अस्पतालों की फार्मेसियों को निर्देश दिया है कि वे एक नवंबर से खरीद और बिक्री की कीमतें स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करें। साथ ही, उन्होंने एनपीपीए को पत्र लिखकर महंगी दवाओं के ट्रेड मार्जिन और अधिकतम खुदरा कीमतें (एमआरपी) तय करने की प्रक्रिया की समीक्षा करने को भी कहा है। इससे मरीज अब यह भी देख सकते हैं कि अस्पताल किसी दवा के लिए कितना भुगतान करता है और मरीज से कितना बिल वसूलता है।
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लेकिन, समस्या सिर्फ किसी एक दवा के मार्जिन तक सीमित नहीं है। एक बार जब कोई मरीज अस्पताल में भर्ती हो जाता है, तो फार्मेसी, चिकित्सा सामग्री, जांच और इलाज के पूरे पैकेज रेट पर अस्पताल का ही नियंत्रण होता है। ट्रेड मार्जिन पर सीमा लगाने से अस्पतालों को इससे नहीं रोका जा सकता कि वे अपनी कमाई बनाए रखने के लिए कमरों के किराये, पेशेवर शुल्क या कुल पैकेज के खर्चों को न बढ़ाएं।

‘क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट (पंजीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010’ के तहत चिकित्सकीय संस्थानों के लिए पंजीकरण कराना, सुविधाओं और कर्मचारियों के न्यूनतम मानकों को पूरा करना तथा अपनी दरों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करना जरूरी है। इसके 2012 के नियमों में यह भी परिकल्पना की गई है कि संस्थानों को केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के परामर्श से तय की गई दरों की सीमा के भीतर ही शुल्क लेना चाहिए। इस दर-सीमा को कभी भी व्यापक रूप से लागू नहीं किया गया है। हालांकि, यह अधिनियम केवल कुछ ही राज्यों में पूरी तरह से लागू है, और वहां भी कीमतों से जुड़े प्रावधान केवल कागजों तक ही सीमित रह गए हैं।


अस्पताल संघों का तर्क है कि ऐसा नियम लागू करने से इलाज की गुणवत्ता या अस्पताल के कामकाज पर बुरा असर पड़ेगा। ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की सह-संयोजक मालिनी ऐसोला का कहना है कि अगर हमारा लक्ष्य किफायती स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना है, तो कॉरपोरेट अस्पतालों के लिए नियमन और न्यूनतम मानक तय होने चाहिए।

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