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मुद्दा: डॉलर की चमक में गुम होती पंजाबियत... पहचान, संस्कृति और विरासत सबकुछ दांव पर

Thu, 20 Feb 2025 04:48 AM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Thu, 20 Feb 2025 04:48 AM IST
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सार
अमेरिका से डिपोर्ट करते समय पगड़ी उतारा जाना निंदनीय है, पर यह मंथन जरूरी है कि जो युवा डंकी रूट से गए थे व वापस आए हैं, वे कितने सिखी स्वरूप में थे।
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Punjabi culture losing shine of in dollar lust identity, culture and heritage everything is at stake
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब की हवा, पानी, मिट्टी, संसाधन और खुशनुमा वातावरण वाकई अद्भुत है, लेकिन आज गुरुओं, संतों और महात्माओं की धरती पंजाब के युवा विदेश की ओर एकमुश्त में रुख कर रहे हैं। इससे अधिक इस बात की चिंता है कि इस पलायन के साथ पंजाब की अपनी संस्कृति, विरासत, इतिहास और सिख धर्म पर इसका बहुत गहरा प्रभाव पड़ रहा है। किसी भी सभ्यता को समझना बुराई नहीं है। लेकिन दुष्प्रभाव तब पड़ता है, जब आप इस दीवानगी में अपनी जान जोखिम में डालकर उन देशों में घुसने का गलत रास्ता अख्तियार करते हैं, और पंजाब में यही हो रहा है।



पंजाब में सिख बहुसंख्यक हैं, लेकिन गांवों में अब सिखों की आबादी लगातार कम हो रही है। नकोदर के निकट गांव नवांपिंड के एडवोकेट हरकीकत सिंह का कहना है कि कभी यहां उनके गांव में 700 घर सिख जाटों के होते थे। अब तो चंद घर ही बचे हैं। बाकी सब कनाडा, अमेरिका या ब्रिटेन चले गए हैं। अब तो उनकी अगली पीढ़ी वापस पंजाब आने के लिए तैयार नहीं है। गांव लदड़ के किरपाल सिंह यूके के चाटम कैंट में रहते हैं। उन्होंने दाढ़ी, केश व पगड़ी कुछ नहीं रखा। उनका बेटा जे. सिंह ब्रिटेन में पैदा हुआ, जो सिख विरासत संस्कृति से दूर है। ये महज चंद उदाहरण हैं। यह संख्या बहुत ज्यादा है और तेजी से बढ़ रही है। यानी पंजाब के पलायन से आने वाली पीढ़ी में सिखिज्म के कमजोर होने का डर भी पनप रहा है।


2008 के बाद पंजाब में एक जबर्दस्त लहर चली, जो लगातार 2023-24 तक चलती चली गई। 2008 में ब्रिटेन ने पंजाब के युवाओं के लिए दरवाजे खोले, तो 2012 के बाद कनाडा ने। हर साल पंजाब से डेढ़ लाख बच्चे कनाडा का रुख करने लगे। अगर वीजा नहीं मिला, तो डंकी रूट अख्तियार कर लिया। हालात यह है कि 2021 से लेकर 2024 तक अमेरिका में जितने शरणार्थी केस फाइल किए गए, उनमें 66 फीसदी पंजाबी थे। 2023 में चार लाख 77 हजार शरणार्थी केस फाइल किए गए। इसमें 66 फीसदी डंकी रूट से अमेरिका में घुसे थे। वहीं वैध तरीके से कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में जाने वाले युवा बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करते ही स्नातक पाठ्यक्रमों के लिए अपने देश से दूर चले जाते हैं। आज पंजाब के 25 लाख लोग विदेश में रह रहे हैं। कनाडा की 3.6 करोड़ की आबादी में पंजाबियों की संख्या 1.3 प्रतिशत है।

ऑस्ट्रेलिया में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में पिछले वर्ष की तुलना में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कनाडा में छात्रों की संख्या में 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्क वीजा पर विदेश जाना मुश्किल है। संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय (यूएनओडीसी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक,  हर साल पंजाब से 20,000 से अधिक लोग अवैध रूप से पलायन करते हैं। विदेश जाने के लिए एजेंट उनसे मनमाने रुपये वसूलते हैं, जो कि 25 लाख रुपये से लेकर एक-एक करोड़ रुपये तक हो सकते हैं। इन सबका असर यह हो रहा है कि पंजाब के गांव वीरान हो रहे हैं। अंग्रेजी का विस्तार या उसको अपनाना बिल्कुल गलत नहीं है। ग्लोबल लैंग्वेज के तौर पर हमें यह करना ही होगा। हम इसकी कीमत किस तरह से चुकाते हैं। इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा।

पंजाब के नामचीन गायक गिप्पी ग्रेवाल से लेकर जस्सी, बब्बू मान से लेकर गुरदास मान पगड़ी व सिखी वेशभूषा में नहीं दिखते हैं। मनमोहन वारस, कमल हीर, हनी सिंह, शैरी मान आदि बेशक युवाओं के आइकॉन हैं, लेकिन वे पगड़ी नहीं पहनते और उनके फॉलोअर्स की संख्या लाखों में है। तो यह बात उठ रही है कि इन विदेशी चमक-दमक, ग्लैमर और डॉलर की चमक के बीच क्या पंजाबी युवा अपनी संस्कृति व अपनी विरासत को भूलते जा रहे हैं। अमेरिका से डिपोर्ट करते समय सिख की पगड़ी उतारी गई। यह निंदनीय है। लेकिन सोचने की बात यह भी है कि जो युवा डंकी रूट से पराए मुल्क में घुस रहे थे और वापस आए हैं, वे कितने सिखी स्वरूप में थे। इस पर मंथन करने की जरूरत है। आज जरूरत इस बात का ध्यान रखने की है कि कहीं विदेश की चाहत और डॉलर की चमक में हम अपनी पहचान, संस्कृति, विरासत को तो नहीं दांव पर लगा रहे हैं।

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