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खतरनाक मोड़ पर पंजाब की सियासत
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अजय सेतिया
पंजाब प्रांत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह संघचालक ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) जगदीश गगनेजा पर हुए हमले ने पंजाब ही नहीं, बाहर भी चिंता बढ़ा दी है। विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुई इस वारदात को गंभीर खतरे की चेतावनी माना जाना चाहिए। अस्सी के दशक में पंजाब में आतंकवाद की शुरुआत भी इसी तरह से हुई थी। आतंकवादियों ने सितंबर, 1981 में जालंधर में हिंद समाचार समूह के संस्थापक लाला जगत नारायण की गोली मारकर हत्या कर दी थी। उनकी हत्या से पूर्व सिख आतंकवादी सिर्फ निरंकारियों को ही निशाना बना रहे थे। सवाल यह है कि क्या गगनेजा पर हुए हमले का चुनावी राजनीति से कोई संबंध है? या क्या पंजाब को एक बार फिर आतंकवाद में झोंकने की कोई विदेशी साजिश है?
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पिछले एक साल से पंजाब प्रदेश भाजपा में कश्मकश चल रही थी कि विधानसभा चुनाव अकालियों से अलग होकर लड़े जाएं या मिलकर। हरियाणा में अकेले चुनाव लड़ने से भाजपा को हुए फायदे से भाजपा और संघ का एक वर्ग बेहद उत्साहित था। लोकसभा चुनाव में अमृतसर से टिकट कटने से खफा नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा के उन नेताओं की रहनुमाई कर रहे थे, जो अकालियों से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने की वकालत कर रहे थे। अमृतसर में अरुण जेटली को न्योता प्रकाश सिंह बादल ने दिया था, जिस कारण सिद्धू का टिकट कटा था। सिद्धू का लक्ष्य अपनी अमृतसर टिकट कटने के लिए जिम्मेदार बादल से बदला लेना मात्र था, जबकि संघ के गगनेजा जैसे कई नेता पंजाब में भाजपा-अकाली गठबंधन को राजनीतिक से ज्यादा सामाजिक एकता की जरूरत के रूप में देखते थे। गगनेजा जैसे सुलझे हुए हिंदू नेता के कारण हिंदू-सिख या कहें कि भाजपा-अकाली गठबंधन टूटने से बचा है।
यहां पंजाबी सूबे के आंदोलन को याद करना जरूरी है। तब के सरसंघ चालक गुरु गोलवलकर ने पंजाब के जनसंघी नेताओं को सलाह दी थी कि पंजाब के हिंदुओं को अपनी मातृभाषा वही लिखवानी चाहिए, जो वे घर में बोलते हैं। पंजाब के अबोहर जैसे कुछ इलाकों को छोड़कर हिंदू अपने घरों में ठेठ पंजाबी बोलते हैं। लेकिन पंजाब के हिंदुओं ने आर्य समाज के प्रभाव में आकर अपनी भाषा हिंदी लिखवाई थी, नतीजतन पंजाब में जनसंघ और बाद में भाजपा अल्पसंख्यक हिंदुओं की पार्टी बनकर रह गई। लेकिन संघ ने 1967 में अपनी गलती को सुधारा और हिंदू-सिख एकता के लिए अकाली दल से स्थायी दोस्ती कर ली। इसलिए पंजाब में भाजपा कोई भी निर्णय बिना संघ से सलाह लिए नहीं ले सकती। जानकारों का कहना है कि जो लोग अकेले चुनाव लड़ने की वकालत कर रहे थे, उनका भी सिर्फ यह कहना था कि भाजपा एक बार अकेले ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़कर देखना चाहिए। चुनाव के बाद अकाली-भाजपा एकता की खिड़की खुली छोड़नी चाहिए, क्योंकि पंजाब में हिंदू-सिख एकता के लिए अकाली-भाजपा का इकट्ठा रहना जरूरी है। इन वर्गों की आशंका थी कि भाजपा-अकालियों की एकता टूटी, तो पंजाब में एक बार फिर आतंकवाद पनप सकता है।
पंजाब के हित में भाजपा कार्यकर्ताओं की इच्छा को दरकिनार कर अकालियों के साथ चुनाव लड़ने का निर्णय लिया गया था। पंजाब का माहौल खराब करने वाली ताकतों को इससे गहरा धक्का लगा। इसलिए पंजाब के आरएसएस नेता पर हुए आतंकी हमले को हिंदू-सिख एकता को तोड़ने की साजिश के रूप में देखा जा रहा है। पुलिस भी अपनी जांच में इस कोण को नजरंदाज नहीं कर सकती।