{"_id":"8805bdc17fa0e8eb2fe4867044d4a3f0","slug":"punishmnet-of-their-crime","type":"story","status":"publish","title_hn":"उनके अपराध की सजा","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
उनके अपराध की सजा
पिंकी आनंद
Updated Tue, 26 Nov 2013 08:21 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आरुषि-हेमराज हत्याकांड में सीबीआई अदालत के फैसले के बाद इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होना स्वाभाविक है। साढे़ पांच वर्ष बाद आए इस फैसले में न्यायालय ने तलवार दंपति को दोषी करार देकर सजा सुना दी है, तब यह भी जरूरी हो जाता है कि इस पूरे मामले के अलग-अलग संदर्भों की व्याख्या की जाए और इसी बहाने हमारे सिस्टम पर भी बात की जाए।
विज्ञापन
14 वर्ष की मासूम आरुषि और तलवार दंपति के घरेलू नौकर हेमराज की हत्या, महज एक अपराध की घटना भर नहीं रह गई थी। इस घटना को लेकर मीडिया काफी सजग रहा। घटनास्थल की देश की राजधानी से निकटता, एक सक्षम और जाने-माने दंपति पर अपनी ही बेटी की हत्या का आरोप लगना और हत्याकांड के पीछे गहराते रहस्य की वजह से, यह घटना मीडिया के लिए खोज-खबर का एक बड़ा विषय बन गई थी।
विज्ञापन
सवाल उठता है कि क्या 'मीडिया ट्रायल' ने इस मामले को प्रभावित किया? नूपुर और राजेश तलवार की ओर से ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि मीडिया के तूल देने की वजह से यह मामला नाटकीय ढंग से गलत दिशा में जा रहा है। मगर यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि अदालतें उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाती हैं, न कि मीडिया के दबाव में। कुछ हद तक न्यायिक प्रक्रिया इससे प्रभावित हो सकती है, लेकिन फैसला तो साक्ष्य के आधार पर ही दिया जाता है।
विज्ञापन
यह सनसनीखेज दोहरा हत्याकांड देश के सबसे चर्चित हत्याकांडों में से एक है। शुरू से शक यही था कि किसी खास परिस्थिति में तलवार दंपति ने अपनी उस बेटी की हत्या कर दी, जिसे उन्होंने बड़ी मन्नतों के बाद पाया था। उन्हीं खास परिस्थितियों में घर के नौकर हेमराज की भी हत्या की गई।
अगर पूरे घटनाक्रम पर गौर करें, तो शक की सुई कहीं और नहीं अटकती। खासकर घर की छत पर हेमराज की लाश नहीं मिलती, तो शायद कुछ और भी सोचा जाता। तब शायद शक हेमराज पर ही गहराता। यह तो साफ है कि इस घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। यहां केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला सुनाया जा सकता था। अदालत ने भी इसी बात को अपने फैसले का आधार बनाया होगा।
यह जरूर कहा जा सकता है कि यह सोच-समझकर किया गया अपराध नहीं है, बल्कि भावावेश में, गुस्से में उठाया गया कदम है। ऐसे अपराध क्षण भर में हो जाते हैं। लेकिन बाद में डर या ऐसी स्थिति से छुटकारा पाने के लिए सबूत मिटाने की हर तरह की कोशिश की जाती है। इस मामले में भी अपराध हो जाने के बाद साक्ष्यों को मिटाने से लेकर सीबीआई और पुलिस को जांच से भटकाने और जांच की दिशा को मोड़ने तक के हर तरह के प्रयास किए गए।
निचली अदालत के फैसले में साढ़े पांच वर्ष लगे हैं, यदि यह मामला ऊपरी अदालतों में चला, तो खासा लंबा वक्त लगेगा। इसने देश की न्यायिक व्यवस्था पर विचार करने का अवसर भी दिया है। असल में समयबद्ध फैसला न दे पाना हमारे न्याय तंत्र की सबसे बड़ी विफलता है। देश की तमाम अदालतों में आज तीन करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।
पिछले वर्ष 16 दिसंबर को दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद भी ऐसे मामलों में त्वरित न्याय की बात उठी थी और उस मामले में एक वर्ष में फैसला भी आ गया। मगर व्यापक स्तर पर देखें, तो देश में न्यायिक सुधारों की तुरंत जरूरत है। लंबी गवाहियां और लंबी-लंबी बहसें, बार-बार अपील करना और पेशी का टलना, ये ऐसे कई बिंदु हैं, जो मामले को भटकाते हैं।
इसका न्यायिक प्रक्रिया पर असर पड़ना स्वाभाविक है, जिसकी वजह से फैसले में देर होती है। इसके अलावा न्यायिक तंत्र का पर्याप्त आधारभूत ढांचा भी हमारे यहां नहीं है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। इसकी शुरुआत निचले स्तर से करने की जरूरत है।
आरुषि मामले में अभियोजन को लेकर भी सवाल उठे हैं। पहले यह मामला पुलिस के पास था और उसके बाद सीबीआई के पास गया, जिसकी भूमिका संदेह के घेरे में रही। सीबीआई ने तो इस मामले की क्लोजर रिपोर्ट ही दे दी थी। सीबीआई की स्वायत्तता पर जो बहस चल पड़ी है, उसे इन संदर्भों से ही टटोला जा सकता है कि आखिर हमने इस तंत्र को किस तरह का बनाकर रखा हुआ है।
कोई भी मामला अभियोजन द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों पर टिका होता है। अक्सर जब भी कोई बड़ा मामला होता है, तो पुलिस आनन-फानन में कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लेती है, जैसा कि इस मामले में भी उन तीन नौकरों के साथ किया गया। हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया, इसलिए जब न्यायिक सुधार की बात आती है, तो ध्यान रखा जाना चाहिए कि उसमें अभियोजन भी एक अहम कड़ी है, जिसकी भूमिका प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज किए जाने के बाद से शुरू हो जाती है।
आखिरकार सीबीआई अदालत का फैसला आरुषि के माता- पिता के खिलाफ आया है। अभियोजन के प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही यह फैसला सुनाया गया है। लिहाजा सीबीआई खुद को शाबाशी दे सकती है कि उसने इस मामले को उसकी परिणति तक पहुंचाया। हालांकि यह भी साफ दिखता है कि कई सबूत मिटाए गए हैं।
तलवार दंपति को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। उनके वकील मामले को ऊपरी अदालत में ले जा रहे हैं, वे उनकी सजा को जितना कम करा सकें, वही उनके हित में होगा, पर लगता नहीं कि नूपुर और राजेश तलवार को जल्द किसी तरह की राहत मिल पाएगी।