फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   punishment for women

औरत होने की सजा

Tue, 25 Dec 2012 12:55 AM IST
सीताराम येचुरी (माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य)
सीताराम येचुरी (माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य) Updated Tue, 25 Dec 2012 12:55 AM IST
विज्ञापन
punishment for women

देश की राजधानी के भीड़-भाड़ वाले इलाके में एक चलती बस में हुई सामूहिक बलात्कार तथा नृशंसता की घटना ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। पीड़िता अस्पताल में जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही है, तथा देश भर में विक्षुब्ध जनता स्वतःस्फूर्त तरीके से विरोध के लिए उठ खड़ी हुई है।

विज्ञापन


इसकी प्रतिध्वनि संसद के दोनों सदनों में भी हुई और सांसदों ने गृहमंत्री को यह भरोसा दिलाने के लिए मजबूर किया कि दोषियों के खिलाफ तत्परता से कार्रवाई की जाएगी और कानून व व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे। हालांकि ऐसे आश्वासन लोगों के मन में कोई खास भरोसा शायद ही पैदा कर पाएंगे।  
विज्ञापन


इसकी वजह तो यही है कि ताजातरीन घटना कोई अकेली नहीं है। महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध देश भर में चिंताजनक रफ्तार से बढ़ते जा रहे हैं। हरियाणा में ही पिछले कुछ महीनों में नृशंस बलात्कार के एक के बाद एक पंद्रह मामले सामने आए थे, जिनमें ज्यादातर सामूहिक बलात्कार के थे।
विज्ञापन
विज्ञापन


इसी तरह, इसी महीने की शुरुआत में अमृतसर में एक पुलिस अधिकारी की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि वह यौन उत्पीड़न से अपनी बेटी को बचाने की कोशिश कर रहा था। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े दिखाते हैं कि 1953 से 2011 के बीच बलात्कार की घटनाओं में 873 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। बलात्कार की वारदातों की बढ़ोतरी की रफ्तार, तमाम संज्ञेय अपराधों की संख्या से तीन गुना ज्यादा बैठती है और हत्याओं में बढ़ोतरी की रफ्तार से साढ़े तीन गुना ज्यादा। पिछले पांच वर्षों में (2007 से 2011 के बीच) ही बलात्कार की वारदातों में 9.7 फीसद की वृद्धि हुई है।

कुछ हफ्ते पहले ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने भारत को औरतों के लिए जी-20 के सभी देशों में बदतरीन जगह बताया था। महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले सूचना व सहायता केंद्र, थॉमस रायटर्स ट्रस्ट लॉ वीमेन के एक सर्वे के अनुसार, भारत महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक जगहों में आता है और इस श्रेणी में उसका साथ देने वाले अन्य देश हैं, अफगानिस्तान, कांगो तथा सोमालिया।

भारत में औसतन हर चालीस मिनट में एक महिला को देश में कहीं न कहीं अपहरण और बलात्कार का निशाना बनाया जा रहा होता है। महानगरों में दिल्ली शर्मनाक तरीके से बलात्कार की घटनाओं के मामले में सबसे आगे है। वर्ष 2007 से 2011 के बीच राजधानी में बलात्कार की 2,620 घटनाएं दर्ज हुई थीं। इसकी तुलना में मुंबई में 1,033, बंगलूरू में 383, चेन्नई में 293 और कोलकाता में 200 वारदातें ही दर्ज की गई थीं। इससे भी बदतर यह कि 2002 से 2011 के बीच, राजधानी में ही बलात्कार के चार में से तीन मामलों में आरोपी सजा से बचकर निकल गए थे।

2002 से 2011 के बीच, यानी पिछले एक दशक में बलात्कार के 5,337 मामलों में फैसले आए थे और इनमें से 3,860 मामलों में आरोपियों को या तो बरी ही कर दिया गया था या फिर समुचित साक्ष्यों के अभाव में अदालतों ने छोड़ दिया। निवारक सजा की तो बात दूर, ऐसा लगता है कि हमारे देश में अपराध के लिए सजा दिए जाने का रिकॉर्ड इतना खराब होने के चलते ही, अपराधियों के मन में अब कानून का कोई डर ही नहीं रह गया है।

कुछ ही महीने पहले देश के गृह सचिव आर के सिंह ने यह कुबूल किया था कि अब वक्त आ गया है, ‘कानून और व्यवस्था की बात करना बंद कर, न्याय दिलाए जाने की बात करना शुरू किया जाए।’वास्तव में, तफ्तीश का काम पूरा होने के बाद मुकदमों की तेजी से सुनवाई करने के लिए पर्याप्त जज ही हमारे देश में नहीं हैं।

1987 में विधि आयोग ने इसका खाका तैयार किया था कि किस तरह पांच वर्ष में न्यायाधीश-आबादी अनुपात, एक लाख की आबादी पर 1.05 न्यायाधीश से बढ़ाकर पांच न्यायाधीश के स्तर पर पहुंचाया जाना चाहिए। लेकिन, उसके बाद पच्चीस बरस गुजर चुके हैं और यह अनुपात एक लाख की आबादी पर 1.4 न्यायाधीश से ऊपर नहीं ले जाया जा सका है।

इसे देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय का ताजा हस्तक्षेप भी भरोसा नहीं जगाता है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि महिलाओं की हिफाजत करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएं, जैसे सादा वर्दी में महिला पुलिस अधिकारियों को तैनात करना, सार्वजनिक परिवहन साधनों में क्लोज्ड सर्किट कैमरे लगाना और हैल्प लाइन स्थापित करना आदि।

सचाई यही है कि हमारे देश के सभी राज्यों में और जाहिर है कि देश के स्तर पर भी, आबादी और पुलिस का अनुपात, दुनिया भर में सबसे निचले स्तर पर है। जब तक कानून का पालन कराने वाले बलों की कतारों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी करने तथा उन्हें समुचित प्रशिक्षण मुहैया कराने के लिए कदम नहीं उठाए जाते हैं, हालात सुधरने वाले नहीं हैं।  

द गार्जियन ने महिलाओं के लिए भारत के बदतरीन जगह होने के तथ्य को दर्ज करने के बाद एक सवाल पूछा हैः एक ऐसे देश में, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने पर अपनी पीठ ठोंकता है, आखिर वहां ऐसा कैसे हो सकता है?’ ऐसा इसलिए हो रहा है कि कानून का पालन कराने वाली संस्थाएं तथा हमारी न्यायिक प्रणालियां बहुत ही खस्ता हालत में हैं।


यह जरूरी है कि महिलाओं के खिलाफ ऐसे अमानवीय जुर्म करने वालों को जल्दी से जल्दी सजा दिलाने के लिए, विशेष अदालतें कायम की जाएं। साथ ही, उनकी सजा ऐसी होनी चाहिए, जो दूसरों को ऐसे अपराध करने से रोक सके और संभावित अपराधियों के मन में डर पैदा करने में समर्थ हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह ताजा जघन्यता देश को झकझोर कर तंद्रा से जगाएगी और यह सुनिश्चित करेगी कि भारत अब महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के प्रति शून्य सहिष्णुता की इच्छा दिखाएगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed