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सार्वजनिक संपत्ति, निजी लगान: घटते वन क्षेत्र की एक वजह ये भी

शंकर अय्यर Updated Thu, 10 Oct 2019 05:58 AM IST
अवैध अतिक्रमण
अवैध अतिक्रमण - फोटो : a
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जरा कल्पना कीजिए कि गोवा के आकार की तीन गुनी या त्रिपुरा से बड़े वनक्षेत्र की भूमि पर अवैध रूप से अतिक्रमण कर लिया गया है। कल्पना कीजिए कि हजारों करोड़ रुपये की हवाई अड्डे की जमीन अतिक्रमणकारियों के कब्जे में है। कल्पना कीजिए कि बंगलूरू के क्षेत्रफल से भी ज्यादा भूमि पर अवैध कब्जा कर लिया गया है। ये रिप्लेज बिलीव इट ऑर नॉट (एक अमेरिकी फ्रेंचाइजी-अविश्वसनीय जानकारियों का भंडार) की प्रवृष्टियां नहीं हैं! पिछले महीने सरकार ने सूचना का अधिकार कानून के तहत पूछे गए प्रश्न के जवाब में बताया कि 12,81,397 हेक्टेयर जंगल (12,813 वर्ग किलोमीटर), जो सार्वजनिक संपत्ति है, निजी मुनाफाखोरों के कब्जे में था।
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इस कुख्यात सूची में शीर्ष पर मध्य प्रदेश है, जहां 5.34 लाख हेक्टेयर (5,437 वर्ग किलोमीटर) वन भूमि पर, जो जबलपुर से भी बड़ा क्षेत्र है, कब्जा कर लिया गया। उसके बाद स्थान है असम का, जहां 3,712 वर्ग किलोमीटर वन भूमि (तिनसुकिया जिले के बराबर) पर अतिक्रमण है। राजनीतिक मंशा और प्रशासनिक उदासीनता देखने लायक है-प्रधानमंत्री ने अप्रैल, 2016 और जून, 2019 में अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में पेड़ लगाने की बात कही थी, पंद्रहवें वित्त आयोग की तरफ से वन आच्छादन के लिए राज्यों से भूमि के विशेष आवंटन की मांग की गई है और तथ्य यह है कि कतर से भी बड़े भौगोलिक क्षेत्र पर अतिक्रमणकारियों ने कब्जा कर लिया है। सरकारी संपत्ति का निजी दोहन सिर्फ वन भूमि तक सीमित नहीं है। संसद के मानसून सत्र में 15 जुलाई, 2019 को सरकार ने खुलासा किया कि दिसंबर, 2018 तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 9,622 एकड़ से अधिक रक्षा क्षेत्र की भूमि पर अतिक्रमण था। 2,200 एकड़ से भी अधिक रक्षा भूमि पर अतिक्रमण के साथ उत्तर प्रदेश राज्यों की इस सूची में शीर्ष पर है।

सबसे अधिक भूमि के मालिक रेल मंत्रालय ने संसद में खुलासा किया कि 31 मार्च, 2019 तक रेलवे के विस्तार और सुरक्षा के लिए जरूरी 821 हेक्टेयर से ज्यादा यानी करीब 2,000 एकड़ जमीन अतिक्रमण के अधीन थी। एयर इंडिया से लेकर भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण तक घाटे में चल रहे उद्यमों से जूझते नागरिक उड्डयन मंत्रालय की 979 एकड़ से ज्यादा जमीन अतिक्रमण के अधीन है। इनमें से 308 एकड़ से अधिक जमीन पर अकेले मुंबई में कब्जा है। अतिक्रमित संपत्ति के मूल्य का अंदाजा लगाना हो, तो जरा मुंबई हवाई अड्डे के आसपास की अचल संपत्ति की खरीद-फरोख्त पर गौर कीजिए। इस साल की शुरुआत में एक जापानी कंपनी ने हवाई अड्डे से सटे बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स में एक एकड़ जमीन के लिए 2,400 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी। बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स सौदे के दसवें हिस्से को ही हवाई अड्डे की जमीन का मूल्य मान लें, और अतिक्रमित 308 एकड़ भूमि का मूल्य निकालें, तो जमीन की कीमत पांच अंकों में पहुंच सकती है। अतिक्रमण की इस भयावह कहानी के कई पहलू हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में भारत सरकार ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के स्मारकों की देखभाल करती है। इस ग्रीष्म ऋतु में सरकार ने खुलासा किया कि 321 स्मारकों पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया है। सर्वाधिक अतिक्रमण वाले राज्यों की सूची में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है, जहां 75 स्मारक अतिक्रमण के अधीन हैं, जिनमें से 25 यानी एक तिहाई राज्य की राजधानी लखनऊ में हैं।

व्यवस्थागत निष्क्रियता से अतिक्रमण को बढ़ावा मिलता है। केंद्र सरकार के हर विभाग के पास एक सुविधाजनक विकल्प है कि वह सरकारी संपत्ति /भूमि / वनों के अवैध कब्जे का दोष राज्य सरकारों पर डाल देता है और हर शिकायत या प्रश्न के जवाब में कहता है कि 'अतिक्रमण राज्य का विषय है।' ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारें अपनी देखरेख वाली भूमि की रक्षा के लिए कोई बेहतर काम कर रही हैं। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के तथ्य दिमाग को सुन्न करने वाले हैं। राजस्थान पर जारी 2019 की कैग की रिपोर्ट कहती है, दस तहसीलों में 3,101 उपद्रवियों ने घर, व्यावसायिक, औद्योगिक एवं ईंट भट्ठे के निर्माण के लिए 30.77 लाख वर्ग मीटर सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया है। सबसे बुरी बात थी कि सरकारी भूमि के डेटाबेस को बनाए रखने के लिए कोई केंद्रीकृत प्रणाली नहीं थी।

सिर्फ राजस्थान ही व्यवस्थागत सुस्ती का शिकार नहीं है। 2018 में कैग की रिपोर्ट थी कि कर्नाटक में 1.92 लाख एकड़ सरकारी जमीन (बंगलूरू से बड़ा क्षेत्र) अतिक्रमण के अधीन थी और 2,608 प्राप्त शिकायतों में से 1,856 शिकायतें सत्यापन और बेदखली के लिए लंबित थीं। 2018 की ही महाराष्ट्र की कैग रिपोर्ट में बताया गया कि ठाणे में 30-35 वर्ष पहले एक झील थी, जहां अब झुग्गी बस्ती है, जिनमें 300 से 350 घर हैं और शेष खाली जमीन का इस्तेमाल गाड़ियां खड़ी करने के लिए होता है। ईंट भट्ठों के लिए 1.74 लाख वर्ग मीटर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा किया गया है।

ये उदाहरण समस्या की गंभीरता के प्रतीक हैं। बड़े पैमाने पर अतिक्रमण और दशकों से उसकी मौजूदगी स्पष्ट रूप से राजनीतिक संरक्षण और मंजूरी की पुष्टि करते हैं-चाहे वन भूमि का अतिक्रमण हो या व्यावसायिक दोहन के लिए सरकारी जमीन का। राज्य दर राज्य ईंट भट्ठों के लिए जमीनें हड़पी जा रही हैं, जो जाहिर है, राज्य सरकार के विभागों की सहभागिता के बिना संभव नहीं है। कानून या कानूनी प्रावधान की कोई कमी नहीं है। कमी है, तो जवाबदेही की। हरेक सरकारी विभाग में कहीं न कहीं कोई व्यक्ति सरकारी कब्जा और इस तरह सरकारी संपत्ति का स्वामित्व बरकरार रखने के लिए जिम्मेदार होता है।

दुख की बात है कि कानून के राज का पालन इस बात पर निर्भर करता है कि शासन कौन कर रहा है। निजी मुनाफाखोरी के लिए सरकारी संपत्ति पर अवैध कब्जे का अपराध उस सहज व्यवस्थागत गठजोड़ का प्रतिनिधित्व करता है, जो राजनीतिक भ्रष्टाचार को जन्म देता है। सवाल यह है कि राजनीतिक वर्ग इसके जरिये करदाता नागरिकों को क्या संदेश दे रहा है?

-लेखक आईडीएफसी इंस्टी. के विजिटिंग फेलो हैं।
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