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लोकतंत्र और सैन्य शासन के बीच म्यांमार में प्रदर्शन, सड़कों पर हजारों लोग

Thu, 11 Feb 2021 06:31 AM IST
केएस तोमर के एस तोमर
के एस तोमर Published by: केएस तोमर Updated Thu, 11 Feb 2021 06:31 AM IST
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Protest in Myanmar against military coup fight between democracy and military
म्यामांर में सैन्य शासन के खिलाफ प्रदर्शन - फोटो : पीटीआई

दसियों हजार लोग म्यांमार में सैन्य शासन खत्म करने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं, जो पिछले एक दशक के इतिहास में कभी नहीं देखा गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि जनशक्ति को दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह भी खत्म नहीं कर सकते और आंग सान सू की द्वारा सैन्य तख्तापलट को चुनौती देने के लिए लिखी गई चिट्ठी ने लोगों को बड़े पैमाने पर उद्वेलित किया है, जिससे सैन्य जनरलों को चिंतित होना चाहिए।


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म्यांमार में चुनावी लोकतंत्र के अचानक खत्म होने की घटना ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को हिला दिया और निकट भविष्य में अमेरिका एवं यूरोपीय देशों द्वारा सैन्य शासक को प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका ने म्यांमार के सैन्य शासक को प्रतिबंध की धमकी दी है, लेकिन भारत अब तक अमेरिका के साथ इसमें शामिल नहीं है। म्यांमार में एक बंदरगाह विकसित करने, कलादान परियोजना के समझौते पर हस्ताक्षर करने के अलावा इस संकटग्रस्त देश के साथ अपने लंबे रिश्ते को बरकरार रखने के लिए भारत ने सतर्क रुख अपनाया है।

विश्लेषकों का मानना है कि भारत ने वर्षों से म्यांमार के सैन्य जनरलों के साथ अपना संबंध बनाए रखा है, इसलिए वह वहां के नए सैन्य शासन के खिलाफ कठोर कार्रवाई से खुद को दूर रखेगा। भारत के विदेश सचिव हर्ष शृंगला और सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवाणे पिछले साल म्यांमार के दौरे पर गए थे, जिसका उद्देश्य सैन्य जनरलों के साथ रिश्ते मजबूत करना था, हालांकि वे अन्य नेताओं से भी मिले थे। भारत जानता है कि कुछ पड़ोसी देशों, जैसे संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, आदि में गैर-लोकतांत्रिक सरकारें हैं, इसलिए वह इस मामले में अमेरिका से दूरी बनाए हुए है, जो आने वाले दिनों में म्यांमार पर फिर से प्रतिबंध लगा सकता है।

म्यांमार के वरिष्ठ सैन्य जनरल हाल के महीनों में चीन के प्रति आलोचनात्मक रहे हैं और उन्होंने बीजिंग पर रखाइन प्रांत में अराकान सेना को समर्थन देने का आरोप लगाया है। जबकि सू की का झुकाव चीन की ओर है, यह जनवरी, 2020 में शी जिनपिंग के स्वागत के दौरान साफ दिखाई दिया था, जिसने सैन्य जनरलों को नाराज कर दिया। सेना ने इसे सू की द्वारा अपने लिए ज्यादा राजनीतिक समर्थन हासिल करने की कोशिश के रूप में देखा, जो उसे मंजूर नहीं था, खासकर जब अमेरिका और यूरोपीय संघ मानवाधिकार उल्लंघन एवं रोहिंग्या के नरसंहार के मुद्दे पर सू की से नाराज थे। वर्ष 2017 की गर्मियों में जब जनरल मिन दिल्ली के दौरे पर आए थे, तो भारत ने उनकी प्रशंसा की थी, उस समय भारत और चीन के बीच दोकलाम को लेकर गतिरोध जारी था।

जनरल मिन तब बोधगया के बुद्ध मंदिर भी गए थे। उसके बाद उन्होंने देश के कई सैन्य एवं असैन्य स्थलों का दौरा किया था। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, तत्कालीन रक्षामंत्री अरुण
जेटली और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से भी मिले थे, जो भारत के साथ उनकी निकटता को दर्शाता है। कई देश म्यांमार के लोगों के लिए अधिक लोकतांत्रिक स्वतंत्रता, स्थायी शांति और समावेशी समृद्धि की दिशा में काम करते हैं। लेकिन चीन और भारत ने खुद को इससे दूर रखा है। म्यांमार के मौजूदा संकट पर प्रतिक्रिया देते समय
भारत सतर्क रहा है, हालांकि वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के संरक्षण में विश्वास करता है, जिसे सेना ने विफल कर दिया है। आंग सान सू की का भारत के साथ बहुत पुराना संबंध है, क्योंकि उनकी शिक्षा दिल्ली में ही हुई है, खासकर तब, जब सेना ने सत्ता पर कब्जा कर लिया था और बाद में उन्हें हिरासत में ले लिया था। तब भारत सरकार ने उनकी परोक्ष मदद की थी। इसलिए वह भारत के प्रति ज्यादा झुकाव रखती हैं।

भारत को म्यांमार में लोकतांत्रिक ताकतों के संरक्षण के लिए सैन्य तानाशाही के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की जरूरत है। लेकिन अभी एक सवाल यह पूछा जा रहा है कि क्या भारत म्यांमार के नए सैन्य शासन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबावों में आने के बजाय अपना स्वतंत्र रुख रखेगा!

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