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राजनीति बदलेंगे पेशेवर
रामचंद्र गुहा/जाने-माने लेखक और इतिहासकार
Updated Mon, 31 Mar 2014 01:43 AM IST
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भारत के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने वालों में ज्यादातर वे लोग शामिल थे, जिन्होंने अपनी कामयाब पेशेवर जिंदगी को छोड़कर संघर्ष और बलिदान के अनिश्चित रास्ते को चुना था। मोहनदास गांधी, मोतीलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल अपनी जमी-जमाई वकालत छोड़कर आजादी की लड़ाई में शामिल हुए थे।
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वहीं सुभाष चंद्र बोस और मोरारजी देसाई ने सिविल सेवा की प्रतिष्ठित नौकरी तक की परवाह नहीं की। अगर ये हस्तियां राजनीति में नहीं आई होतीं तो क्या होता? मौलाना आजाद और राममनोहर लोहिया मशहूर शिक्षाविद् होते। जवाहरलाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण शायद कामयाब लेखक होते। महिलाएं भी इस मामले में पीछे नहीं थीं।
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ऐसी कई महिला नेत्रियां थीं, जिन्होंने देश की आजादी के महान लक्ष्य के सामने कभी अपनी व्यावसायिक महत्वाकांक्षाओं को आड़े नहीं आने दिया। कमलादेवी चट्टोपाध्याय थियेटर की प्रतिभावान नेत्री थीं, लेकिन इसे छोड़कर उन्होंने जेल की यातना सही। कांग्रेस के अलावा दूसरे दलों के नेताओं में भी यह प्रवृत्ति दिखी। भीमराव अंबेडकर ने दलितों के उत्थान पर फोकस करने के लिए अपने कानूनी करियर से किनारा किया।
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पूरी तरह राजनीति में आने से पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय में एक कामयाब प्रशासक थे। तमाम कम्युनिस्ट नेता पत्रकारिता या शिक्षा के क्षेत्र का बड़ा नाम हो सकते थे। 1950 के दशक की शुरुआत में वेरियार एल्विन ने अपने एक अप्रकाशित उपन्यास में लिखा था कि कभी जो खाकी ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का प्रतीक मानी जाती थी, वही अब एक औपचारिक वेशभूषा के तौर पर ताकत और सत्ता का चिह्न बनकर उभरी है।
आजादी के बाद ऐसे राजनीतिज्ञों का दौर आया जिनका राजनीति में ही करियर था। ये वह नेता थे (कुछ महिलाएं भी शामिल) जो पार्टी कार्यालय, विधायिका या सचिवालय के सिवाय कहीं करियर के बारे में सोच ही नहीं सकते थे। वकालत छोड़ कर सांसद बने कुछ चुनिंदा नेताओं को अगर छोड़ दें, तो आज का राजनीतिक वर्ग ऐसे लोगों की जमात बन गया है, जो राजनीति को एक व्यवसाय मानते हैं और समाज सेवा की बजाय प्रतिष्ठा और निजी लाभ से प्रेरित होते हैं।
साल दर साल देश के राजनीतिक वर्ग में खुद के हितों का पोषण करने की प्रवृत्ति बढ़ती रही है। शायद इसी वजह से संसद में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जिन्हें सियासत विरासत में मिली। कुछ के लिए तो राजनीति पारिवारिक व्यवसाय जैसी है। वहीं दूसरों के लिए यह एक ऐसा व्यवसाय है, जो एक बार कुर्सी पर बैठने पर ठेकों के मनमाफिक आवंटन के जरिये अकूत संपत्ति कमाने का मौका देता है।
एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के अध्ययन से पता चलता है कि चुनावों के दौरान सांसदों और मंत्रियों की संपत्ति में किस तरह बढ़ोतरी होती जाती है। लोकसभा टिकटों और राज्यसभा सीटों की खरीद-फरोख्त, रियल एस्टेट और खनन माफियाओं की केंद्र और राज्य विधायिकाओं में बढ़ती संख्या सीधे तौर पर पूरे राजनीतिक वर्ग के भ्रष्टाचार की कहानी बयां करते हैं।
व्यापक परिदृश्य तो और भी निराशाजनक है। हालांकि 2014 के चुनावों के लिए जारी की गई उम्मीदवारों की लिस्ट में दूसरे पेशे से आए नेताओं की संख्या में कुछ इजाफा हुआ है। अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पोते और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक सुगाता बोस को ही लीजिए, जिन्हें तृणमूल कांग्रेस ने जाधवपुर दक्षिण सीट से उम्मीदवार बनाया है। बोस ने चुनाव लड़ने के लिए यूनिवर्सिटी से बाकायदा छुट्टी ली है।
इसके अलावा पटेल और राजगोपालाचारी की जीवनी लिखने वाले प्रतिष्ठित लेखक राजमोहन गांधी भी हैं, जो पूर्वी दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार हैं। आप की एक और उम्मीदवार मेधा पाटकर हैं, जिनका समाज सेवा में शानदार रिकॉर्ड रहा है। मेधा ने किसानों, आदिवासियों और विकास के नाम पर हाशिये पर धकेले गये झुग्गीवासियों के अधिकारों के लिए तीन दशकों का लंबा संघर्ष किया है।
कांग्रेस और भाजपा ने भी कई मशहूर पेशेवरों को चुनावी दंगल में उतारा है। विशिष्ट पहचान कार्यक्रम आधार को शुरू करने के लिए सरकार में शामिल होने से पहले नंदन नीलेकणि इंफोसिस जैसी प्रतिष्ठित सॉफ्टवेयर कंपनी के सीईओ के तौर पर शानदार पारी खेल चुके हैं। वह दक्षिण बंगलूरू के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार हैं।
दूसरी ओर भाजपा ने जयपुर (ग्रामीण) से जिस व्यक्ति को टिकट दिया है, उनके अलग-अलग समय पर चुनौती से भरे दो करियर रहे हैं। यह राज्यवर्द्धन सिंह राठौर हैं, जो तकरीबन दो दशकों तक भारतीय सेना के अंग रह चुके हैं। इसके अलावा एशियन, कॉमनवेल्थ, ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप की निशानेबाजी स्पर्धाओं में भी वह कई पदक अपने नाम कर चुके हैं।
मैं यह दावा नहीं करता कि ये सभी उम्मीदवार जीत हासिल करेंगे, लेकिन इनमें से कुछ जरूर जीतेंगे। जो जीतेंगे, वे संसद में होने वाली चर्चाओं में जरूरी गंभीरता और गहराई लाएंगे। इसके अलावा सांसद बनने के बाद वे व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर जनमत को रचनात्मक आकार देने में भी समर्थ होंगे।
अगर नीलेकणि जीतते हैं, तो वह एक कामयाब और तकनीकी उन्मुख उद्यमी का अनुभव अपने साथ संसद में लाएंगे। वहीं राज्यवर्द्धन सेना और खेल का अपना लंबा अनुभव लाएंगे। एक कार्यकर्ता के तौर पर वंचित वर्ग के संघर्ष के नाम अपना जीवन लिखने वाली मेधा पाटकर सामाजिक कल्याण पर होने वाली चर्चाओं को जमीनी हकीकत से जोड़े रख सकती हैं। दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटियों में वर्षों तक अध्यापन के सुगाता बोस के अनुभव से देश की शिक्षा नीति को नए आयाम मिल सकेंगे। जहां तक राजमोहन की बात है, वह आधुनिक भारतीय राजनीतिक इतिहास की गहरी समझ रखने वाले शोधपरक पत्रकार हैं। अंबेडकर, नेहरू और पटेल जैसे नेता जैसी संसद की चाह रखते थे, उसको जितना बेहतर ढंग से राजमोहन समझ सकते हैं, उतना शायद कोई नहीं।
समाज सेवा की भावना से भरे इन पेशेवरों की राजनीति में कामयाबी की उम्मीद रखने की एक वजह और भी है। दरअसल, भारत के राजनीतिक दलों में किसी एक व्यक्ति या परिवार की इच्छा से चलने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कांग्रेस में गांधियों की जो हैसियत है, कमोबेश वही आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल की और भाजपा में नरेंद्र मोदी की है। क्षेत्रीय दलों में तो यह प्रवृत्ति और भी ज्यादा है। ऐसे में, राजनीति से बाहर अपनी कामयाब पहचान रखने वाले पेशेवरों में अपने नेता के शब्दों को वेद वाक्य मानने की आशंका न के बराबर है। जहां दूसरे नेता पार्टी में अपनी जगह बनाने के लिए चापलूसी और साजिशें करेंगे, वहीं ये पेशेवर अपनी पार्टी, संसद और उसके बाहर अच्छे विचारों को फैलाने के लिए तर्क और अनुभव का सहारा लेंगे।