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निजीकरण है समाधान
तवलीन सिंह
Updated Sun, 25 Feb 2018 07:02 PM IST
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तवलीन सिंह
हीरा व्यापारियों द्वारा सरकारी बैंक लूटकर विदेश भाग जाने की घटनाएं सामने आने के बाद किसानों की दर्द भरी कहानियां और भी प्रासंगिक हो गई हैं। पहले से सुनते आए हैं कि किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं का मुख्य कारण कर्ज का बोझ है, लेकिन अब इनकी कहानियां ज्यादा सताती हैं। शर्म आती है कि नीरव मोदी 11 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज लेकर भाग गए हैं। जबकि गरीब किसान एक-डेढ़ लाख रुपये का कर्ज अदा न कर पाने पर जान दे देते हैं।
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काश कि इन दर्द भरी कहानियों के बीच हम यह भी पूछते कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण अभी तक निजीकरण में परिवर्तित क्यों नहीं हुआ। सरकारी बैंक दशकों से धनवानों की सेवा ही करते रहे हैं। इंदिरा गांधी ने देशवासियों को यह आश्वासन देते हुए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था कि सरकारी बैंक पहले गरीबों की सेवा करेंगे और बाद में उद्योगपतियों की। सरकारी बैंकों को सरकार का निर्देश था कि 40 प्रतिशत पैसा कृषि और छोटे उद्योगों के लिए आरक्षित रखा जाएगा। इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए पिछले 40 वर्ष में तकरीबन सारे सरकारी बैंक घाटे में रहे हैं। घाटा कितना है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि एक सर्वेक्षण के मुताबिक, 2016 के शुरुआती तीन महीनों में 20 सरकारी बैंकों का घाटा 16,272 करोड़ रुपये से अधिक था।
प्रधानमंत्री ने कुछ सप्ताह पहले संसद में स्वयं स्वीकार किया कि बैंकों का घाटा सरकार के लिए बहुत बड़ी समस्या है और सारा दोष सोनिया-मनमोहन सरकार का है। यानी उनकी सरकार को यह समस्या विरासत में मिली है। सो जब नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के लापता होने की खबर मिली, हमारे राजनेताओं में इसको लेकर एक अजीब नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई कि बैंकों की खस्ता हालत का दोष किसके सिर थोपा जाए। आज तक किसी एक राजनेता ने देश को यह नहीं बताया है कि अगर बैंकों का इतना बुरा हाल है, तो उनके निजीकरण के बारे में अभी तक चर्चा क्यों नहीं शुरू हुई है। माना कि किसी कांग्रेस प्रधानमंत्री की कभी हिम्मत नहीं हुई इंदिरा गांधी के इतने बड़े निर्णय को गलत बताने की, लेकिन बीस साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में जब भाजपा की सरकार बनी थी, उस समये बैंकों के निजीकरण के बारे में क्यों नहीं सोचा गया?
पिछले करीब चार साल से देश को ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जो बार-बार कह चुका है कि सरकार को बिजनेस में नहीं होना चाहिए, लेकिन न बैंकों के निजीकरण के बारे में अभी तक चर्चा शुरू हुई है और न ही घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों के बारे में। एयर इंडिया का घाटा आज 50 हजार करोड़ रुपयों के करीब है, लेकिन एयर इंडिया को बेचने की अगर बातें हुई हैं, तो इतने चुपके से कि स्पष्ट हो गया है कि इस काम को मोदी सरकार गंभीरता से नहीं ले रही है। सरकारें जब बिजनेस करती हैं, तो इन कारोबारों और उद्योगों में राजनेता अपना पैसा नहीं, जनता का पैसा निवेश करते हैं। सो नीरव मोदी के भागने के बाद सबसे बड़ा सवाल हमारे सामने यही है कि क्या नीरव मोदी किसी निजी बैंक के साथ ऐसा कर सकते थे? किसी हाल में नहीं। सो अगर कुछ अच्छा निकल सकता है नीरव मोदी के इस हादसे के बाद, तो यही कि सरकारी बैंकों के निजीकरण के बारे में सोचना अब जरूरी हो गया है। किसानों की आत्महत्याएं सबूत हैं कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण से इस देश के अति गरीब लोगों को कोई लाभ नहीं मिला है।