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प्रधानमंत्री के दावे और हकीकत

Fri, 16 Aug 2013 08:22 PM IST
सीताराम येचुरी
सीताराम येचुरी Updated Fri, 16 Aug 2013 08:22 PM IST
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Prime minister's claim and reality

बृहस्पतिवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लाल किले के प्राचीर से अपना दसवां भाषण दिया। यह यूपीए-द्वितीय के प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्रता दिवस का उनका आखिरी संबोधन था। वर्ष 2014 के स्वतंत्रता दिवस से पहले ही आम चुनाव हो जाएंगे। इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री का इस बार का संबोधन, सरकार की कथित उपलब्धियों की सूची पेश करना ही साबित हुआ। मानो वह अपनी पार्टी के चुनाव अभियान का खाका पेश कर रहे थे। ऐसा लगता है कि इस बार के चुनाव में उनकी पार्टी सबसे बढ़कर खाद्य सुरक्षा कानून को ही भुनाने की कोशिश करने जा रही है। इस कानून को प्रधानमंत्री ने, ‘सारी दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा प्रयास’ बताया है। पर हमारी जनता को सार्थक खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने के लिए यह विधेयक किसी भी तरह से पर्याप्त नहीं है। यह भी याद दिला दें कि यूपीए-द्वितीय ने सत्ता में आने के बाद पहले 100 दिनों में ही खाद्य सुरक्षा का कानूनी अधिकार दिलाने का वायदा किया था, पर अब तक यह कानून नहीं बन पाया है।

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कुछ ऐसे ही स्वर में प्रधानमंत्री ने स्वतंत्र भारत में दशकीय वृद्धि तथा विकास पैटर्न का एक नया सिद्धांत ही पेश किया है। पिछले एक दशक के संबंध में उनका कहना था, ‘पिछला दशक भी हमारे देश के इतिहास में बहुत बड़े बदलावों का दशक रहा है। देश की आर्थिक समृद्धि जितनी इस दशक में बढ़ी है, उतनी पहले किसी दशक में नहीं बढ़ी। लोकतांत्रिक ताकतों को बढ़ावा मिला है और समाज के बहुत से वर्ग विकास की प्रक्रिया से पहली बार जुड़े हैं। आम आदमी को नए अधिकार मिले हैं, जिनकी बदौलत उसकी आर्थिक और सामाजिक ताकत बढ़ी है।’
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इस हवाई दावे का मुख्य आधार है, सकल घरेलू उत्पाद की ऊंची वृद्धि दर। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इसका कोई जिक्र तक नहीं किया है कि पिछले एक दशक के दौरान इस देश में, दो-दो देश बन गए हैं, जिनके बीच की खाई चौड़ी से चौड़ी ही होती गई है। याद रहे कि खाद्य तथा कृषि संगठन (एफएओ) का अनुमान है कि भारत की 22 फीसदी आबादी कुपोषित है। यूनिसेफ का अनुमान है कि विकासशील दुनिया के कुपोषण के चलते सामान्य से कम वजन के बच्चों में 42 फीसदी भारत में ही रहते हैं। अधिक दिन नहीं हुए, जब प्रधानमंत्री ने खुद इस पर दुख जताया था कि हमारे देश के बच्चों में कुपोषण बहुत ज्यादा है और उन्होंने इस स्थिति को ‘राष्ट्रीय शर्म’ करार दिया था।
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आश्चर्यजनक रूप से प्रधानमंत्री ने कृषि के क्षेत्र में प्रदर्शन को काफी संतोषजनक बताया है। उन्होंने दावा किया कि फसलों के खरीद मूल्यों में पिछले नौ वर्षों में पहले से कहीं अधिक बढ़ोतरी की गई है। गेहूं और धान के खरीद मूल्य दोगुने से भी अधिक किए गए हैं। जबकि राज्यसभा में पैदावार की लागतों के संबंध में पूछे गए एक सवाल के जवाब में, केंद्रीय कृषि मंत्री ने कृषि लागत तथा मूल्य आयोग द्वारा मुहैया कराए गए आंकड़ों के आधार पर, 30 नवंबर, 2012 को संसद को बताया था कि 2010-11 तथा 2011-12 के बीच धान की प्रति क्विंटल उत्पादन लागत 146 रुपये बढ़ी थी, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य 80 रुपये बढ़ा। इसी प्रकार गेहूं के मामले में, 2011-12 तथा 2012-13 के बीच पैदावार की लागत 171 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ी थी, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य में 65 रुपये की ही बढ़ोतरी हुई थी। साफ है कि किसानों को उनकी पैदावार का अच्छा दाम दिलाने का सरकार का दावा झूठा है।

हमारे देश का कृषि क्षेत्र कुल मिलाकर दसवीं तथा ग्यारहवीं, दोनों पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान चार फीसदी की वृद्धि दर के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है। ग्रामीण इलाकों में किस दर्जे की बदहाली है, इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि हताशा में किसानों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाएं लगातार हो रही हैं।

बहरहाल, प्रधानमंत्री के भाषण में सारा जोर इसी पर था कि अगर हम ऊंची आर्थिक वृद्धि दर बनाए रखने में कामयाब हो जाते हैं, तो भारत का समग्रतापूर्ण विकास होगा और हमारी जनता की खुशहाली बहुत बढ़ जाएगी। वह कहते हैं, 'पिछले नौ साल में हमने आर्थिक विकास की जो रफ्तार हासिल की है, उससे हमारे देश की क्षमताओं का पता चलता है। लेकिन, इस वक्त देश के आर्थिक विकास की दर में कमी आई है। हम इस कमी को दूर करने के लिए पूरी मेहनत से काम कर रहे हैं।'

उनकी सरकार के हिसाब से इसका उपचार क्या है? उनके मुताबिक, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई ऐसे क्षेत्रों में निवेश की सीमा बढ़ाई गई है और उसकी प्रक्रिया को आसान बनाया गया है। पर निवेश को आकर्षित करने की ऐसी कोशिशों से तब तक न वृद्धि आएगी और न रोजगार के अवसर पैदा होंगे, जब तक जनता के हाथों में पर्याप्त क्रय शक्ति नहीं होगी और घरेलू मांग को ऊपर उठाकर, इस तरह के निवेश से होने वाले उत्पादन का खरीदा जाना व उपभोग सुनिश्चित नहीं किया जाएगा। मगर बजाय इसके कि घरेलू मांग का विस्तार करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए, यूपीए-द्वितीय की सरकार के तो सारे कदम जनता के हाथों में क्रय शक्ति घटाने वाले ही रहे हैं। सभी जरूरी वस्तुओं की कीमतों में जारी बढ़ोतरी, जनता के हाथों में इस तरह के उपभोग के लिए अतिरिक्त आय में तेजी से कमी का मुख्य कारण है।


असल में आज देश को एक ऐसे वैकल्पिक नीति पथ की जरूरत है, जिसके सहारे देश और जनता की अंतर्निहित शक्तियों का सहारा लेकर बेहतर भारत का निर्माण किया जा सके।

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