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अमेरिका से दोस्ती की कीमत
price of friendship with america
Updated Fri, 14 Sep 2012 12:52 PM IST
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पुष्पेश पंत, कॉलम, आलेख
अमेरिकी रक्षा मंत्री की भारत यात्रा ने देश की विदेश नीति में रुचि रखने वालों को कई संवेदनशील मुद्दों पर तत्काल सोचने के लिए विवश कर दिया है। क्या वास्तव में अमेरिका की एशिया नीति दिशा बदल रही है? क्या अंततः पाकिस्तान की फौजी तानाशाही से अमेरिका का मोहभंग हो गया है और वह भारत को अपना दीर्घकालीन साथी बनाने की जमीन तैयार कर रहा है? क्या वह भारत के जरिये चीन को संतुलित करने का प्रयास कर रहा है? आदि। मजेदार बात यह है कि जब अमेरिकी मंत्री भारत की नौ दिन की यात्रा पर थे, तभी रूसी राष्ट्रपति पुतिन चीन का दौरा कर रहे थे!
अमेरिका-भारत की जुगलबंदी की हवा शुरू होने के पहले ही निकलती नजर आ रही है। मीडिया में जिस तरह का विश्लेषण पढ़ने-देखने को मिला वह और भी दिलचस्प है। कहा जा रहा है कि आर्थिक मंदी की चपेट में फंसे अमेरिका को करीब लाने का इससे बेहतर मौका हमें नहीं मिल सकता; जाने क्यों रक्षा मंत्री एंटनी इतनी ढील कर रहे हैं। सरकार में तथा उसके पिट्ठू पत्रकारों में अमेरिका परस्तों की कमी नहीं। पर हमारा मानना है कि जोरशोर से इस दोस्ती के सामरिक महत्व को रेखांकित करते रहने से जमीनी हकीकत बदल नहीं जाती।
अमेरिका तथा भारत के राष्ट्रीय हितों का टकराव बना हुआ है। चीन के साथ अमेरिका के आर्थिक रिश्ते हमसे कहीं अधिक सघन हैं। सामरिक दृष्टि से भी जापान, ताईवान, दक्षिणी कोरिया के मद्देनजर अमेरिका के लिए चीन को रुष्ट करना आसान नहीं। उसकी नजर में चीन का बाजार, चीन में सस्ते उत्पादन की क्षमता सब कुछ भारत से अधिक लाभप्रद हैं। चीन न केवल आणविक शक्ति है, वह सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य भी है। यह सोचना बहुत दूर की कौड़ी लाना है कि भारत आक्रामक चीन पर अंकुश लगा सकता है। कम से कम गिरते मनोबल वाली इस साझा सरकार के लिए तो यह असंभव ही है। हमारी लालसा तो यह है कि अमेरिका के दामन से चिपकने के बाद शायद चीन सीमा के अतिक्रमण वाली चिकोटियां काटना बंद कर दे।
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पुतिन की चीन यात्रा पश्चिम को जता रही है कि भले ही साम्यवाद के दिन लद गए हों, पूरब आज भी पश्चिम से जुदा है, जिसकी अपनी समस्याएं और भौगोलिक हकीकतें हैं, जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। लगता है कि भारत के जरिये अमेरिका चीन के साथ अपने लेन-देन तथा राजनयिक परामर्श को अपने पक्ष में ढालना चाहता है। भारत को इस दिखावे से क्या हासिल होगा, कह पाना आसान नहीं।
यही बात पाकिस्तान-अफगानिस्तान तथा ईरान के बारे में भी लागू होती है। अरसे से अमेरिका भारत को समझाने में जुटा है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद वहां बने रहना तथा अपनी उदीयमान शक्ति वाली भूमिका के अनुरूप जिम्मेदारी निबाहना उसके लिए कितना महत्वपूर्ण है। किसी को इस घड़ी यह सोचने की फुरसत नहीं कि इस मौजूदगी की क्या कीमत हमें चुकानी पड़ेगी? दरअसल भारत के भयादोहन के लिए वैसी ही मानसिकता तैयार की जा रही है, जैसी शीत युद्ध के दौरान 'डौमिनो सिद्धांत' के जरिये अमेरिका ने की थी।
कहा जा रहा है कि अगर अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा हो गया, तो फिर पाकिस्तान के सरहदी इलाके में और उसके बाद बाकी पाकिस्तान में इसलामी कट्टरपंथी का सैलाब फैलते देर नहीं लगेगी। इस तर्क में बेवजह फंसने से पहले ठंडे दिमाग से इसकी पड़ताल जरूरी है कि अफगानिस्तान में हमारी सक्रियता की क्या प्रतिक्रिया पाकिस्तान में होगी। इस ‘शत्रुतापूर्ण’ पहल का क्या तोड़ वह सोच सकते हैं? हम पाकिस्तान के साथ परस्पर विश्वास बढ़ाने वाले राजनय की बात करते हैं, इसलिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि क्या हम अब तक के किए-कराए पर पानी फेरने को तैयार हैं।
यह बात अमेरिका बखूबी जानता है कि यदि भारत दक्षिण एशिया में प्रमुखता हासिल कर लेता है, तब सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को ही होगा। यदि यह उपमहाद्वीप शांत-स्थिर रहता है, तब हथियार बिक्री वाली मौत की सौदागिरी चौपट हो जाएगी। इतना ही नहीं, तब चीन और रूस के साथ ही नहीं, मध्य एशिया तथा दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की नजर में भी भारत का कद बढ़ जाएगा। देर-सबेर आर्थिक मंदी से उबरकर यूरोपीय समुदाय भी अमेरिका का प्रतिद्वंद्वी बन सकता है। हमें यह बात समझ में नहीं आती कि दक्षिण एशिया में सहकार-सहयोग की बात दरकिनार कर कैसे अमेरिका चीन या अफगानिस्तान-ईरान जैसे स्थानों में राजनय के समायोजन की बातें कर सकता है।
यह सच है कि अमेरिका महाशक्ति देश है और उसकी अनदेखी कर हम (या कोई भी देश) अपनी विदेश नीति का नियोजन नहीं कर सकते। पर यह भी उतना ही सच है कि भारत किसी छोटे, पुराने सैनिक संधिमित्र की तरह अमेरिका का पिछलगुवा भी नहीं बन सकता। बदले रूस तथा चीन के साथ बदले भारत के रिश्ते अपनी जरूरत के मुताबिक, ऐतिहासिक अनुभव तथा भविष्य की संभावना के अनुसार खुद हमें तय करने चाहिए। अमेरिका के साथ हमारी घनिष्ठता इन्हें पटरी से उतार नहीं सकती। निर्विवाद है कि शीत युद्ध के बाद, एकध्रुवीय विश्व में भूमंडलीकरण के इस दौर में गुटनिरपेक्षता की हठ पालना नादानी है, पर स्वाधीन विदेश नीति की जरूरत भारत जैसे देश के लिए हमेशा बनी रहेगी। चुनौतियां कितनी भी विकट क्यों न हों, विकल्प हमें खुद ही ढूंढ़ने होंगे।
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अमेरिकी रक्षा मंत्री की भारत यात्रा ने देश की विदेश नीति में रुचि रखने वालों को कई संवेदनशील मुद्दों पर तत्काल सोचने के लिए विवश कर दिया है। क्या वास्तव में अमेरिका की एशिया नीति दिशा बदल रही है? क्या अंततः पाकिस्तान की फौजी तानाशाही से अमेरिका का मोहभंग हो गया है और वह भारत को अपना दीर्घकालीन साथी बनाने की जमीन तैयार कर रहा है? क्या वह भारत के जरिये चीन को संतुलित करने का प्रयास कर रहा है? आदि। मजेदार बात यह है कि जब अमेरिकी मंत्री भारत की नौ दिन की यात्रा पर थे, तभी रूसी राष्ट्रपति पुतिन चीन का दौरा कर रहे थे!
अमेरिका-भारत की जुगलबंदी की हवा शुरू होने के पहले ही निकलती नजर आ रही है। मीडिया में जिस तरह का विश्लेषण पढ़ने-देखने को मिला वह और भी दिलचस्प है। कहा जा रहा है कि आर्थिक मंदी की चपेट में फंसे अमेरिका को करीब लाने का इससे बेहतर मौका हमें नहीं मिल सकता; जाने क्यों रक्षा मंत्री एंटनी इतनी ढील कर रहे हैं। सरकार में तथा उसके पिट्ठू पत्रकारों में अमेरिका परस्तों की कमी नहीं। पर हमारा मानना है कि जोरशोर से इस दोस्ती के सामरिक महत्व को रेखांकित करते रहने से जमीनी हकीकत बदल नहीं जाती।
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अमेरिका तथा भारत के राष्ट्रीय हितों का टकराव बना हुआ है। चीन के साथ अमेरिका के आर्थिक रिश्ते हमसे कहीं अधिक सघन हैं। सामरिक दृष्टि से भी जापान, ताईवान, दक्षिणी कोरिया के मद्देनजर अमेरिका के लिए चीन को रुष्ट करना आसान नहीं। उसकी नजर में चीन का बाजार, चीन में सस्ते उत्पादन की क्षमता सब कुछ भारत से अधिक लाभप्रद हैं। चीन न केवल आणविक शक्ति है, वह सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य भी है। यह सोचना बहुत दूर की कौड़ी लाना है कि भारत आक्रामक चीन पर अंकुश लगा सकता है। कम से कम गिरते मनोबल वाली इस साझा सरकार के लिए तो यह असंभव ही है। हमारी लालसा तो यह है कि अमेरिका के दामन से चिपकने के बाद शायद चीन सीमा के अतिक्रमण वाली चिकोटियां काटना बंद कर दे।
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पुतिन की चीन यात्रा पश्चिम को जता रही है कि भले ही साम्यवाद के दिन लद गए हों, पूरब आज भी पश्चिम से जुदा है, जिसकी अपनी समस्याएं और भौगोलिक हकीकतें हैं, जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। लगता है कि भारत के जरिये अमेरिका चीन के साथ अपने लेन-देन तथा राजनयिक परामर्श को अपने पक्ष में ढालना चाहता है। भारत को इस दिखावे से क्या हासिल होगा, कह पाना आसान नहीं।
यही बात पाकिस्तान-अफगानिस्तान तथा ईरान के बारे में भी लागू होती है। अरसे से अमेरिका भारत को समझाने में जुटा है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद वहां बने रहना तथा अपनी उदीयमान शक्ति वाली भूमिका के अनुरूप जिम्मेदारी निबाहना उसके लिए कितना महत्वपूर्ण है। किसी को इस घड़ी यह सोचने की फुरसत नहीं कि इस मौजूदगी की क्या कीमत हमें चुकानी पड़ेगी? दरअसल भारत के भयादोहन के लिए वैसी ही मानसिकता तैयार की जा रही है, जैसी शीत युद्ध के दौरान 'डौमिनो सिद्धांत' के जरिये अमेरिका ने की थी।
कहा जा रहा है कि अगर अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा हो गया, तो फिर पाकिस्तान के सरहदी इलाके में और उसके बाद बाकी पाकिस्तान में इसलामी कट्टरपंथी का सैलाब फैलते देर नहीं लगेगी। इस तर्क में बेवजह फंसने से पहले ठंडे दिमाग से इसकी पड़ताल जरूरी है कि अफगानिस्तान में हमारी सक्रियता की क्या प्रतिक्रिया पाकिस्तान में होगी। इस ‘शत्रुतापूर्ण’ पहल का क्या तोड़ वह सोच सकते हैं? हम पाकिस्तान के साथ परस्पर विश्वास बढ़ाने वाले राजनय की बात करते हैं, इसलिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि क्या हम अब तक के किए-कराए पर पानी फेरने को तैयार हैं।
यह बात अमेरिका बखूबी जानता है कि यदि भारत दक्षिण एशिया में प्रमुखता हासिल कर लेता है, तब सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को ही होगा। यदि यह उपमहाद्वीप शांत-स्थिर रहता है, तब हथियार बिक्री वाली मौत की सौदागिरी चौपट हो जाएगी। इतना ही नहीं, तब चीन और रूस के साथ ही नहीं, मध्य एशिया तथा दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की नजर में भी भारत का कद बढ़ जाएगा। देर-सबेर आर्थिक मंदी से उबरकर यूरोपीय समुदाय भी अमेरिका का प्रतिद्वंद्वी बन सकता है। हमें यह बात समझ में नहीं आती कि दक्षिण एशिया में सहकार-सहयोग की बात दरकिनार कर कैसे अमेरिका चीन या अफगानिस्तान-ईरान जैसे स्थानों में राजनय के समायोजन की बातें कर सकता है।
यह सच है कि अमेरिका महाशक्ति देश है और उसकी अनदेखी कर हम (या कोई भी देश) अपनी विदेश नीति का नियोजन नहीं कर सकते। पर यह भी उतना ही सच है कि भारत किसी छोटे, पुराने सैनिक संधिमित्र की तरह अमेरिका का पिछलगुवा भी नहीं बन सकता। बदले रूस तथा चीन के साथ बदले भारत के रिश्ते अपनी जरूरत के मुताबिक, ऐतिहासिक अनुभव तथा भविष्य की संभावना के अनुसार खुद हमें तय करने चाहिए। अमेरिका के साथ हमारी घनिष्ठता इन्हें पटरी से उतार नहीं सकती। निर्विवाद है कि शीत युद्ध के बाद, एकध्रुवीय विश्व में भूमंडलीकरण के इस दौर में गुटनिरपेक्षता की हठ पालना नादानी है, पर स्वाधीन विदेश नीति की जरूरत भारत जैसे देश के लिए हमेशा बनी रहेगी। चुनौतियां कितनी भी विकट क्यों न हों, विकल्प हमें खुद ही ढूंढ़ने होंगे।