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कैशलेस अर्थव्यवस्था की कीमत

Tue, 10 Jan 2017 07:58 PM IST
मधुरेन्द्र सिन्हा
मधुरेन्द्र सिन्हा Updated Tue, 10 Jan 2017 07:58 PM IST
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price of Cashless economy
मधुरेन्द्र सिन्हा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की घोषणा के बाद सरकारी हलकों में यह माना जा रहा था कि कम से कम तीन लाख करोड़ रुपये मौद्रिक प्रणाली में वापस नहीं लौटेंगे। इससे काले धन पर अंकुश लगेगा और अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। काले धन के खिलाफ जंग में इसे सबसे बड़ा कदम माना जा रहा था। पर जैसा कि कहा गया, करीब 97 प्रतिशत पुराने नोट वापस बैंकों में पहुंच गए, जिससे साफ हो गया कि काले धन के खिलाफ यह मुहिम कारगर साबित नहीं हुई। 15.4 खरब रुपये के 500 तथा 1,000 रुपये के नोटों में से 14.97 खरब रुपये के नोट बैंकों में वापस आ गए। यह दुखद है, क्योंकि इस फैसले से लोगों को काफी तकलीफ हुई। लाखों घंटों की मानवश्रम की बर्बादी हुई और लाखों मजदूर बेरोजगार हो गए। गांवों में फसलों की कटाई पर असर पड़ा और अनाज-सब्जियों की बिक्री को भारी धक्का लगा। बड़े पैमाने पर मजदूरों के अपनेे गांव लौटने की खबर है, जिसके दूरगामी असर होंगे। हजारों इकाइयां फिलहाल बंद हैं। अब ये हालात के सामान्य होने का इंतजार कर रही हैं। रिजर्व बैंक ने खुद ही अपने आकलन में कहा है कि जीडीपी दर में इससे कमी आएगी। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि दो तिमाही के बाद अर्थव्यवस्था में अच्छी तेजी आएगी। लेकिन अभी जो हालात हैं, वे संतोषजनक नहीं हैं।

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यह सवाल बार-बार पूछा जाएगा कि इतनी तकलीफ उठाकर हमें या देश को क्या मिला? यह भी पूछा जाएगा कि देश यह जोखिम उठाने लायक था भी या नहीं? और शायद इसलिए सरकारी तंत्र ने अब कैशलेस इकोनॉमी का नारा दिया है। कहा जा रहा है कि जब कैशलेस व्यवस्था हो जाएगी, तो काले धन पर अंकुश लगेगा। इसके लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जा रहा है। पेटीएम जैसे पेमेंट बैंकों को बढ़ावा दिया जा रहा है और क्रेडिट व डेबिट कार्ड के इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया जा रहा है। सबसे बड़ा अभियान तो डिजिटल के तहत है, जिसमें स्मार्टफोन के जरिये पैसे ट्रांसफर किए जा सकते हैं। इसे गेम चेंजर भी कहा जा रहा है और इससे तमाम सेवाएं एक साथ एक प्लेटफॉर्म पर मिल जाएंगी। कैशलेस इकोनॉमी इसी का एक हिस्सा है। लेकिन इसने कुछ बेहद बुनियादी सवाल उठाए हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या यह सुविधा मुफ्त में उपलब्ध है?
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इसका जवाब है नहीं। इस तरह की सुविधा लेने के लिए काफी जेब ढीली करनी पड़ती है। सबसे पहले तो एक स्मार्टफोन चाहिए और फिर जरूरत के हिसाब से डाटा। इन दोनों पर खर्च आता है और डाटा के लिए हर महीने पैसे देने पड़ते हैं। अनुमान है कि इस साल तक भारत में कुल 24 करोड़ स्मार्टफोन हो जाएंगे। बेशक इस मामले में हम दुनिया में दूसरे नंबर पर होंगे, लेकिन कुल आबादी को देखते हुए यह अब भी कम है। यानी पूरी कैशलेस व्यवस्था के लिए बड़े पैमाने पर स्मार्टफोन की जरूरत है। यह खर्च बड़ा है। सबसे सस्ता स्मार्टफोन भी कम से कम 3,000 रुपये में आता है। डाटा की लागत अलग। यानी कैशलेस इकोनॉमी के लिए हर किसी को खर्च करना होगा। डिजिटल दुनिया की यही समस्या है कि यहां कुछ भी मुफ्त में नहीं है। देखने में यह निर्दोष और पारदर्शी है, लेकिन इसकी कीमत है। यहां पर कैशलेस इकोनॉमी या पारदर्शिता की कीमत जनता क्यों चुकाए? प्रधानमंत्री मोदी ने विमुद्रीकरण का कदम उठाकर बड़ा जोखिम लिया है। अगर इसके वांछित परिणाम नहीं निकले, तो आगे चलकर काले धन पर चोट करने की किसी की हिम्मत नहीं होगी।

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