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इस नफरत का नुकसान ही होगा

तवलीन सिंह Updated Mon, 11 Feb 2013 08:52 AM IST
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यह इत्तफाक नहीं था कि जिस समय दिल्ली में नरेंद्र मोदी एक संपन्न, समृद्ध भारत का सपना पेश कर रहे थे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के सामने, प्रवीण तोगड़िया आंध्र प्रदेश में मुसलमानों से अपनी नफरत जाहिर कर रहे थे।
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अकबर ओवैसी के हाल में दिए गए भाषण का जवाब देते हुए विश्व हिंदू परिषद के नेता ने कहा कि पुलिस वाले जब भी दूर रहे हैं किसी दंगा-फसाद से, तो नेली, मेरठ, मलियाना जैसी घटनाएं हुई हैं, जहां लाशों के ढेर लग गए हैं, जिनमें एक भी हिंदू की नहीं रही है। यह जवाब था ओवैसी के उस वक्तव्य का, जिसमें उन्होंने कहा था कि पुलिस वाले न होते, तो हिंदुओं को मुसलमान खत्म कर देते।


नफरत थी ओवैसी की बातों में इस देश के लिए, हिंदुओं के लिए, लेकिन नफरत के इस घिनौने मुकाबले में तोगड़िया कहीं आगे निकल गए और खूब नुकसान कर गए भारतीय जनता पार्टी की उस छवि का, जो मोदी बदलने की कोशिश में लगे हुए हैं।

तोगड़िया कई दिनों से अदृश्य रहे हैं, तो उनके इस तरह अचानक प्रकट होने का कारण मालूम करने के लिए मैंने अपने एक भाजपाई दोस्त को फोन लगाया। उसने इन शब्दों में बात समझाई, तोगड़िया नफरत करते हैं मोदी से, क्योंकि गुजरात में जितना भी थोड़ा-बहुत हिंदुत्व का असर था, उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद पूरी तरह समाप्त कर दिया है, इसलिए तोगड़िया कोशिश कर रहे हैं मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए। सोच-समझकर दिया है उन्होंने ऐसा भाषण।

गुजरात के मुख्यमंत्री के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता कठिन है, बावजूद इसके कि हाल में प्रकाशित हुए इंडिया टुडे के सर्वेक्षण के मुताबिक, इस दौड़ में वह राहुल गांधी से आगे हैं। सबसे बड़ी कठिनाई है उनके चेहरे पर लगा 2002 के दंगों का दाग, जो अभी तक मिटा नहीं है। इसलिए जब भी तोगड़िया जैसे लोग खुलकर बोलते हैं, तब यादें ताजा हो जाती हैं 2002 की और मोदी के भविष्य पर उनका अतीत छा जाता है।

इस अतीत के काले साये को हटा सकेंगे क्या मोदी? दिल्ली की राजनीतिक गलियों में जब भी मैंने यह सवाल किया है, तो जवाब मिला है-कभी नहीं। मोदी की समस्या है कि उनकी अपनी पार्टी के लोग भी दुश्मन हैं। यह जानते हुए भी कि बिना मोदी के भाजपा के पास मतदाताओं के सामने रखने के लिए कुछ भी नया नहीं है, वे मोदी के खिलाफ प्रचार करने में लगे रहते हैं।

मोदी ने जो पिछले सप्ताह भाषण दिया दिल्ली में, उसके खिलाफ ट्वीटर पर बोले कई जाने-माने टीवी पत्रकार। रद्दी भाषण था, कुछ भी नया नहीं कहा, इत्यादि-इत्यादि। ये वही लोग थे, जिन्होंने राहुल के जयपुर में दिए भाषण की इतनी तारीफ की, जैसे इतना अच्छा भाषण कभी किसी राजनेता ने पहले नहीं दिया। सच तो यह है कि राहुल ने अपने भाषण में देश की गंभीर समस्याओं का जिक्र कम और अपने और अपने परिवार की समस्याओं की बातें ज्यादा कीं।

मोदी राजनीतिक रूप से विपरीत हैं राहुल के, सो जब भी भाषण देते हैं, देश को संपन्न बनाने के तरीकों की बात करते हैं। मेरा मानना है कि पंडित नेहरू के बाद मोदी पहले राजनेता हैं, जिन्होंने देश के सामने एक नया आर्थिक सपना रखा है और उसे हकीकत में बदलने का साधन भी। नेहरू का सपना समाजवादी था, जिसमें देशवासियों को समझाया गया कि जब तक गरीबी नहीं हटाई जाती, किसी को अमीर होने का अधिकार नहीं होगा। न गरीबी हटी, न देश संपन्न हुआ।

मोदी के सपने का लक्ष्य है भारत में संपन्नता लाने का और इस संपन्नता में निवेश करने चाहे कोई भी सामान्य आए, उसका स्वागत है। सुंदर सपना है यह, लेकिन जब तक तोगड़िया जैसे लोग यादें ताजा करते रहेंगे नरेंद्र मोदी के अतीत की, तब तक उनको मौका नहीं मिलेगा अपने सपने को साकार करने का।

भाजपा अगर वास्तव में मोदी के साथ है, तो राजनाथ सिंह को स्पष्ट करना होगा कि तोगड़िया जैसे लोगों के लिए अब भाजपा में कोई जगह नहीं। लेकिन क्या यह संभव है? दुनिया जानती है कि विश्व हिंदू परिषद एक अहम महकमा है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बिल्कुल वैसे, जैसे संघ का राजनीतिक महकमा है भारतीय जनता पार्टी। सो दिल्ली दूर अस्त अभी नरेंद्र भाई, बहुत दूर अस्त।

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