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भाजपा में सत्ता संघर्ष
संजय बारु
Updated Sun, 23 Mar 2014 06:27 PM IST
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राजनीति में केवल विजेता और पराजित ही होते हैं। यहां रनर्स अप के लिए कोई जगह नहीं। ऐसा लगता है कि राजनीति में इतनी लंबी अवधि गुजारने के बाद भी भाजपा के सबसे पुराने नेता को; उन्हें सबसे बड़े नेता नहीं कहेंगे, क्योंकि यह विशेषण अब भी अटल बिहारी वाजपेयी के साथ जुड़ा है, सियासत का यह साधारण नियम मालूम नहीं है।
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भारतीय राजनीति पर सरसरी निगाह डालने से दिख जाएगा कि किसी न किसी समय कोई एक नेता पार्टी पर वर्चस्व स्थापित कर लेता है। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के निर्विवाद नेता थे। उनसे जिनकी भी असहमति रही, उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी। आजादी के बाद गांधी जी जब तक जीवित रहे, उनके और जवाहर लाल नेहरू के बीच तनाव रहा। नेहरू ने बतौर प्रधानमंत्री अपना वर्चस्व स्थापित किया और कई मुद्दों पर विनम्रता के साथ गांधी के विचारों से दूरी बना ली।
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यह सुनने में अच्छा नहीं लगेगा, पर गांधी के निधन से सबसे बड़ा राजनीतिक फायदा नेहरू को हुआ। फिर उन्होंने बहुत तरीके से विरोधियों को ठिकाने लगाना शुरू किया। गांधी जी के रहते ही उन्होंने खुद को सरदार वल्लभभाई पटेल से बड़ा बना लिया था। गांधी की मृत्यु के बाद चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, आचार्य कृपलानी और दूसरे नेताओं को किनारे कर वह पार्टी और सरकार के निर्विवाद नेता बन गए।
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इंदिरा गांधी ने भी ऐसा ही किया। कमजोर जमीन से राजनीति की शुरुआत कर यह 'गूंगी गुड़िया' 'दुर्गा' बन गईं। उन्होंने पार्टी में टूट की स्थिति पैदा की, वरिष्ठ राजनेताओं की एक पूरी पीढ़ी को बाहर निकाला, और पार्टी व सरकार में अपनी सर्वोच्चता स्थापित की। राजीव गांधी को विरासत में यही ढांचा मिला, पर पार्टी व सरकार के प्रबंधन में उनकी विफलता ने कांग्रेस में फिर विभाजन की स्थिति पैदा की। प्रधानमंत्री बनने के बाद पी वी नरसिंह राव ने भी पार्टी पर नियंत्रण स्थापित किया। प्रधानमंत्री बनने के करीब दस महीने के भीतर एआईसीसी की तिरुपति बैठक में वह न सिर्फ पार्टी अध्यक्ष बन गए, बल्कि कांग्रेस विभाजित हुई और अर्जुन सिंह, शीला दीक्षित, नारायण दत्त तिवारी, नटवर सिंह, पी चिदंबरम जैसों ने पार्टी छोड़ी।
भाजपा के भीतर बहुत लोग सोचते हैं कि पार्टी के उत्थान में सर्वाधिक योगदान आडवाणी जी का था, जबकि केंद्र की सत्ता में आने पर वाजपेयी जी प्रधानमंत्री बन बैठे। उसके बाद उन्होंने खुद को ताकतवर बनाना शुरू किया। कुछ ही सप्ताह में परमाणु परीक्षण कर उन्होंने अपनी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय छवि बनाई। फिर आईबी, रॉ और सीबीआई का नियंत्रण अपने पास लेकर गृह मंत्री के पर कतर दिए। पूर्व कैबिनेट सचिव टी आर प्रसाद ने एक मजेदार वाकया सुनाया था। जब आडवाणी जी उप प्रधानमंत्री बने, तब प्रसाद को उन्होंने यह जानने का काम सौंपा कि उप प्रधानमंत्री की अतिरिक्त शक्तियां क्या हैं। प्रसाद ने पुरानी फाइलें ढूंढने के बाद पाया कि उप प्रधानमंत्री के पास दूसरे वरिष्ठ मंत्रियों से अलग कोई अतिरिक्त शक्ति नहीं होती। उन्होंने आडवाणी जी को बताया कि एकमात्र बदलाव उनके नेमप्लेट में ही हो सकता है!
नेहरू जी, इंदिरा जी, नरसिंह राव जी और अटल जी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी पार्टियों पर वर्चस्व कायम किया। लेकिन सोनिया गांधी और नरेंद्र मोदी का मामला अलग है। सोनिया जी ने 1996 में कांग्रेस की पराजय के बाद पार्टी पर नियंत्रण बनाना शुरू किया। 1998 तक वह सीताराम केसरी को हटाकर पार्टी अध्यक्ष बनने की स्थिति में आ गई थीं। फिर उन्होंने विरोधियों को ठिकाने लगाना शुरू किया, जो उनके नेतृत्व के खिलाफ थे। उन्होंने न सिर्फ नरसिंह राव जी को किनारे किया, बल्कि शरद पवार, पूर्णो संगमा और हर उस नेता को पार्टी छोड़ने को विवश किया, जो उनके प्रधानमंत्री बनने के अधिकार पर सवाल उठा रहे थे। जहां सोनिया गांधी के पास खुद को पार्टी का निर्विवाद नेता साबित करने के लिए 1998 से 2004 तक छह साल थे, वहीं नरेंद्र मोदी ने एक साल से भी कम अवधि में खुद को इस स्थिति में पहुंचा दिया। इस दौरान वह भाजपा और उसकी चुनावी तैयारी के केंद्र में आए तथा भावी प्रधानमंत्री के रूप में खुद को स्थापित करने में सफल हुए।
राजनीति का मतलब सत्ता से और उसे हासिल करने से है। नेहरू जी, इंदिरा जी, राव जी, अटल जी और सोनिया जी की तरह मोदी जी ने भी खुद को पार्टी का सर्वोच्च नेता स्थापित करते हुए अपने आलोचकों को किनारे किया है। आडवाणी और उनके समर्थकों के प्रति उनका रवैया यही बताता है।
एक नेता के हाथ में अबाध शक्ति दे देने के मामले में कोई पार्टी (माकपा भी) पीछे नहीं है। तमाम क्षेत्रीय पार्टियां एक नेता या उसके परिवार के इशारे पर चलती हैं। नेहरू जी के समय से कांग्रेस में एक आदमी का वर्चस्व है। वामपंथी पार्टियां और भाजपा 'सामूहिक नेतृत्व' का दावा करती हैं, पर हरकिशन सिंह सुरजीत, ज्योति बसु, बुद्धदेव भट्टाचार्य, वी एस अच्युतानंदन और सीताराम येचुरी को किनारे कर प्रकाश करात ने माकपा का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया। भाजपा पर भी अटल जी और बाद में आडवाणी जी ने वर्चस्व स्थापित किया। इसलिए नरेंद्र मोदी आज जो कुछ कर रहे हैं, वह नया नहीं है। वह जानते हैं कि अगर वह पार्टी और चुनाव प्रचार का नेतृत्व अपने हाथ में नहीं लेंगे, तो आगामी सरकार का नेतृत्व नहीं कर पाएंगे।
(लेखक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार और द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और बिजनेस स्टैंडर्ड के पूर्व प्रधान संपादक हैं)